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दुनिया भर के देशों में जलवायु परिवर्तन के कारण सकल घरेलू उत्पाद में गिरावट

एक अध्ययन के मुताबिक बढ़ते जलवायु परिवर्तन के चलते भारत समेत दुनिया भर में कारपोरेट ऋण आने वाले कुछ वर्षों में बढ़ जाएगा और संप्रभु क्रेडिट रेटिंग में गिरावट देखने को मिलेगी।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: April 26, 2024 09:08 IST
दुनिया भर के देशों में जलवायु परिवर्तन के कारण सकल घरेलू उत्पाद में गिरावट
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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अजय प्रताप तिवारी

जलवायु परिवर्तन विश्व समुदाय के समक्ष एक गंभीर संकट के रूप में उभरा है। ऐसा भी नहीं कि जलवायु परिवर्तन की समस्या आचनक पैदा हुई है। आज भले विकसित और विकासशील देश जलवायु परिवर्तन के लिए एक-दूसरे को उत्तरदायी ठहराते हों, लेकिन यह समस्या वैश्विक है। इस विकट समस्या से विकासशील, गरीब और कमजोर देश सबसे ज्यादा पीड़ित हैं, क्योंकि इनके पास इससे निजात पाने की पर्याप्त क्षमता और संसाधन का आभाव है।

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जलवायु परिवर्तन ने आर्थिक संकट, गरीबी, भुखमरी और बेरोजरी जैसी गंभीर समस्याओं को जन्म दिया है। इससे पैदा हुए आर्थिक संकट को लेकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं समय-समय पर रिपोर्टें प्रकाशित करती रही हैं। हाल में ‘नेचर’ पत्रिका में प्रकाशित शोध में कहा गया है कि 2060 तक वैश्विक स्तर पर 3.75 लाख करोड़ डालर का नुकसान हो सकता है, जो वैश्विक स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद के लिए एक चिंता का विषय है।

दुनिया भर के देशों में जलवायु परिवर्तन के कारण सकल घरेलू उत्पाद में गिरावट दर्ज की जा रही है। भारत भी इसका खमियाजा भुगत रहा है। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में प्रकाशित रिपोर्ट ‘लास एंड डैमेज टुडे: हाउ क्लाइमेट चेंज इम्पैक्टिंग आउटपुट एंड कैपिटल’ में खुलासा हुआ है कि 2022 में जलवायु परिवर्तन के कारण भारत के सकल घरेलू उत्पाद में आठ फीसद का नुकसान हुआ।

अमेरिका के डेलावेयर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मानव जनित जलवायु परिवर्तन के चलते पिछले वर्ष वैश्विक आर्थिक उत्पादन में लगभग 6.3 फीसद की कमी दर्ज की गई। इससे पिछले तीस वर्षों में अल्पविकासशील और विकासशील देशों के कुल सकल घरेलू उत्पाद में 21 खरब डालर का नुकसान हुआ है। केवल 2022 में जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक स्तर के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 1.8 फीसद का नुकसान हुआ। यह आंकड़ा दिनोदिन बढ़ रहा है।

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एशिया-प्रशांत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में 2050 तक कुल सकल घरेलू उत्पाद में 2.6 फीसद नुकसान का कारण जलवायु परिवर्तन होगा। पिछले कुछ वर्षों में दक्षिण पूर्व एशिया और दक्षिण अफ्रीका के देश विशेष रूप से प्रभावित हुए हैं, इन क्षेत्रों के देशों को क्रमश: 14.1 फीसद और 11.2 फीसद का कुल सकल घरेलू उत्पाद का नुकसान हुआ।

भारत के कई छोटे-बड़े राज्य जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे हैं। ‘क्रास डिपेंडेंसी इनिशिएटिव’ द्वारा जारी ‘ग्रास डोमेस्टिक क्लाइमेट रिस्क’ नामक रपट में 2050 में दुनिया के सबसे ज्यादा प्रभावित 2600 शहरों को चिह्नित किया गया, जिसमें भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार, असम, राजस्थान, महाराष्ट्र जैसे नौ राज्य शामिल हैं। इन राज्यों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है। अर्थव्यवस्था का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जो जलवायु परिवर्तन की चपेट में न हो। सबसे ज्यादा प्रभावित कृषि क्षेत्र, पर्यटन उद्योग, डेरी उद्योग, मत्स्य, लघु उद्योग और कुटीर उद्योग हैं।

अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने वाले निवेशकों पर भी जलवायु परिवर्तन का सीधा असर पड़ रहा है। एक अध्ययन के मुताबिक बढ़ते जलवायु परिवर्तन के चलते भारत समेत दुनिया भर में कारपोरेट ऋण आने वाले कुछ वर्षों में बढ़ जाएगा और संप्रभु क्रेडिट रेटिंग में गिरावट देखने को मिलेगी। जर्मनी के जलवायु परिवर्तन से जुड़े वैज्ञानिकों ने ‘पाट्सडैम इंस्टीट्यूट फार क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च’ के नवीन अध्ययन से पता चला है कि आने छब्बीस वर्षों में वैश्विक स्तर पर लोगों की कुल कमाई का उन्नीस फीसद घट जाएगी।

भारत में भी इसका असर देखने को मिलेगा। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में कमाई करने वालों की कुल कमाई लगभग 19 से 25 फीसद घट सकती है। दुनिया के सभी देशों को अगले 26 वर्षों में अमेरिका, रूस, जर्मनी, फ्रांस जैसे सक्षम और समृद्ध देशों को भारी आर्थिक खमियाजा भुगतना पड़ सकता है। इससे भारत भी अछूता नहीं रहेगा। वैश्विक स्तर पर आर्थिक असमानता भी बढ़ सकती है। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में महंगाई तेजी से बढ़ेगी। जलवायु परिवर्तन से बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी जैसी गंभीर समस्याएं शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से बढ़ेंगी।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार आने वाले कुछ वर्षों में विश्व में लगभग आठ करोड़ नौकरियां घट जाएंगी। केवल भारत में तीन करोड़ चार लाख नौकरियां घटने की संभावना है। विश्व बैंक की ताजा रपट से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन से दुनिया भर में गरीबी बढ़ेगी। आने वाले पंद्रह वर्षों में दस करोड़ से अधिक लोग गरीब हो जाएंगे। भारत के संदर्भ में विश्व बैंक ने कहा है कि अगले 15 वर्षों में 4.5 करोड़ भारतीय अत्यधिक निर्धनता की श्रेणी में जा सकते हैं।

अत्यधिक निर्धनता बढ़ने से देश की आर्थिक प्रगति बाधित हो सकती है। जलवायु परिवर्तन से खाद्यान्न उत्पादन घट रहा है। 2019 के एक अध्ययन के मुताबिक खराब मौसम के कारण भारत की वार्षिक फसल का नुकसान भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.25 फीसद था। जलवायु परिवर्तन की वजह से वैश्विक स्तर पर कुल कृषि उत्पादन पर प्रतिवर्ष लगभग 4-9 फीसद तक का नुकसान होता है, जिससे कुल सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 1.5 फीसद की प्रतिवर्ष हानि होती है।

घटती खाद्यान्न उत्पादन क्षमता से खाद्यान्न की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि होगी, जो भुखमरी का कारण बन सकती है। संयुक्त राष्ट्र की रपट में कहा गया कि वर्ष 2019 के मुकाबले भूख का सामना कर रहे लोगों की संख्या में 16.1 करोड़ की वृद्धि हुई। यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2020 में 81.1 करोड़ लोग भूख का सामना कर रहे थे। ‘आक्सफैम’ के अनुसार, जलवायु परिवर्तन की विभिन्न घटनाओं के चलते पिछले कुछ वर्षों में दो करोड़ लोगों को विस्थापित होना पड़ा।

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक वर्ष 2000 से अब तक सूखा, बाढ़ और जंगल में आग लगने से 12.3 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई है तथा 4.2 अरब लोग प्रभावित रहे। अगर जलवायु परिवर्तन ऐसे ही बरकरार रहा, तो आने वाले कुछ वर्षों में दुनिया गरीबी, आय की असमानता, खाद्यान्न संकट और भुखमरी से जूझती नजर आएगी। गरीबी, आय में असमानता और खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि की वजह से दुनिया की करीब तीन अरब आबादी पोषक आहार की पहुंच से दूर रहेगी, जिससे दुनिया में कुपोषण जैसी समस्याओं को बढ़ावा मिलेगा।

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दुनिया के सभी देशों को एकजुट होना पड़ेगा। भविष्य में जलवायु परिवर्तन को कम करने हेतु उन्नत तकनीक, पर्याप्त वित्तीय संसाधन की जरूरत होगी। विकसित देशों को गरीब देशों की सहायता करनी चाहिए, अन्यथा गरीब देश जलवायु परिवर्तन की घटनाओं से निपटने और आर्थिक विकास की प्रक्रिया से बाधित रह जाएंगे।

यह सच है कि जलवायु परिवर्तन के लिए विकसित राष्ट्र ही जिम्मेदार हैं। भारत को केंद्र ,राज्य और जिला स्तर पर आपदा बजट का अपनी वार्षिक बजट में विशेष प्रावधान करना और हरित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना चाहिए। अगर समय रहते जलवायु परिवर्तन पर लगाम न लगाई गई, तो यह अर्थव्यवस्था को दीमक की तरह खा जाएगा।

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