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देश की पहली मिडगेट सबमरीन Arowana बनकर तैयार, खुफिया मिशन को दे सकती है अंजाम

इसमें सिर्फ इतना इंतजाम होता है कि कमांडो बैठकर जाए और मिशन को अंजाम देकर वापस आ जाए।
Written by: न्यूज डेस्क
नई दिल्ली | Updated: May 16, 2024 17:20 IST
देश की पहली मिडगेट सबमरीन arowana बनकर तैयार  खुफिया मिशन को दे सकती है अंजाम
प्रतीकात्मक तस्वीर। (इमेज- पीटीआई)
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Midget Submarine: मिडगेट पनडुब्बी बनकर तैयार हो चुकी है। इसका निर्माण मझगांव डॉक शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा किया गया है। इसको एरोवाना नाम दिया गया है। एमडीएल ने केवल इसे बनाया ही नहीं है बल्कि पूरी डिजाइनिंग भी की है। सबमरिन को प्रूफ ऑफ कान्सेप्ट के तौर पर बनाया गया है। ताकि दुनिया को इस बात का पता लग सके कि भारत किसी से भी कम नहीं हैं और ऐसी सबमरीन को खुद भी बना सकता है।

इस सबमरीन का फायदा केवल जांच-पड़ताल में ही नहीं किया जाएगा बल्कि समुद्र के अंदर सीक्रेट ऑपरेशन के लिए भी किया जाएगा। इसके जरिए कम कमांडो के साथ किसी भी तरह का सैन्य अभियान या सीक्रेट मिशन आसानी से किया जा सकता है।

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क्या है एरोवाना की खासियत

अब हम बात करेंगे कि एरोवाना गहरे और छिछले पानी दोनों में गोता लगा सकती है। यह नेटवर्किंग के जरिये नेवी के साथ मिलकर आसानी से दुश्मन को चकमा दे सकती है। इतना ही नहीं, इससे बड़े मिशन को भी अंजाम दिया जा सकता है। जानकारी के अनुसार इसकी लंबाई 12 मीटर है और इसकी स्पीड 2 नॉट है। इसमें फिलहाल अभी स्पीड की ही कमी है। बैटरी लिथियम और आयरन से बनी हुई है।

मिडगेट सबमरीन क्या होती है?

मिडगेट सबमरीन को आमतौर पर छोटी पनडुब्बी कह सकते हैं। इसका वजन 150 टन के अंदर ही है। इस सबमरीन में लोगों की बैठने की क्षमता भी कामी कम है। इसमें एक बार में ज्यादा से ज्यादा 9 ही लोग बैठ सकते हैं। अगर मिलिट्री मिशन को अंजाम देने के लिए कहा जाए तो छह या उससे ज्यादा लोक बैठकर अंजाम दे सकते हैं। इसके अंदर ज्यादा लंबे समय तक नहीं बैठा जा सकता है। यह एक छोटी पनडुब्बी है। इसमें सिर्फ इतना इंतजाम होता है कि कमांडो बैठकर जाए और मिशन को अंजाम देकर वापस आ जाए।

सबमरीन में कैसे हथियार होते हैं?

मिडगेट सबमरीन में हथियारों के लिए खास इंतजाम होते हैं। इनमें टॉरपीडो जैसे कई हथियार होते हैं। इसके अलावा कई बार इसमें गोताखोरों के लिए स्वीमर डिलिवरी व्हिकल भी होते हैं। मिडगेट सबमरीन का इस्तेमाल केवल सैन्य अभियान के लिए ही नहीं होता है। बल्कि इसको व्यापारिक तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है। इसके जरिये साइंटिफिक रिसर्च भी की जा रही है। अब तो इनका इस्तेमाल समुद्र के अंदर पर्यटन के लिए भी किया जा रहा है।

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