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राम मंदिर का निर्माण ही है सांस्कृतिक संप्रभुता की पुनर्स्थापना

राम बहुआयामी पक्षों के समन्वय हैं। उनके सांस्कृतिक पक्ष के साथ अल्पसंख्यकों की जीवन मूल्यों का समन्वय ही भारत की धर्मनिरपेक्षता में विद्यमान विरोधाभास को समाप्त कर सकता है। राम मंदिर के लिए संघर्ष भारत के राष्ट्रवाद को यूरोपीय वैचारिक दलदल से निकालकर ठोस हिंदू सभ्यताई बुनियाद पर खड़ा करता है।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: December 31, 2023 13:24 IST
राम मंदिर का निर्माण ही है सांस्कृतिक संप्रभुता की पुनर्स्थापना
भगवान श्रीराम। फोटो- (इंडियन एक्‍सप्रेस)।
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राकेश सिंहा

भारतीय सभ्यता के इतिहास में 22 जनवरी, 2024 विशिष्ट दिन के रूप में सदैव अंकित रहेगा। इस दिन अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन का एक से अधिक अभिप्राय है। आस्था यदि मानवीय संवेदना और उत्कृष्टता के बुनियाद पर खड़ी हो तो कभी मरती नहीं है। तभी तो इस्लामिक शासक बाबर द्वारा मंदिर के विध्वंस का प्रतिकार कभी कमजोर नहीं पड़ा।

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एकरूपतावाद को बहुरूपतावाद ने इस मंदिर निर्माण के द्वारा परास्त किया है। दूसरों की आस्था के प्रति घृणा और हिंसक दृष्टि रखना ही आध्यात्मिक बहुलवाद में निषेध है। बाबर ने यही किया था। दुनिया के अनेक भागों में इस तरह की विडंबना देखने को मिलती है। पर ठोस वैचारिक जवाब हिंदुओं ने संघर्ष के द्वारा दिया है। संघर्ष तर्क पर आधारित था जो पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित ही नहीं होता रहा बल्कि समृद्ध और सबल बनता गया।

दूसरा महत्त्वपूर्ण अभिप्राय सांस्कृतिक संप्रभुता की पुनर्स्थापना है। एक राष्ट्र जो सभ्यता का प्रतिनिधित्व करता है, वह खंडित सांस्कृतिक चेतना के साथ जीवित नहीं रह सकता है। राम मंदिर का विरोध उसी खंडित चेतना पर आधारित था। इसने भारत के मन को, आत्मविश्वास को और पहचान को कमजोर एवं धूमिल करने का प्रयास किया है।

पीढ़ियों के मन में आरोपित किया गया कि बख्तियार खिलजी द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय को जलाया जाना या काशी, मथुरा, अयोध्या के मंदिरों पर प्रहार आदि को ‘गंगा यमुनी’ संस्कृति हेतु विस्मृत करना ही धर्मनिरपेक्षता है। हिंदुओं ने इसे अस्वीकृत कर दिया। राम मंदिर का निर्माण आध्यात्मिक लोकतंत्र का संदेश है। आध्यात्म में प्रतिद्वंद्विता या प्रतिस्पर्धा का स्थान नहीं है। यह उदारता और संवेदना की खोज का प्रवाह है, जिसमें नई धाराओं का प्रस्फुटन स्वाभाविक है। अखंडित हिंदू चेतना इसी का नाम है।

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आश्चर्य है कि भारत में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर विरोध के तर्क गढ़े गए। अच्छा ही हुआ। इसने हिंदुओं की सामूहिक चेतना को झकझोरने का काम किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इसमें अहम भूमिका निभाई है। इसने सूक्ष्म स्तर पर सौ वर्षों से लगातार काम कर हिंदू सुदृढ़ीकरण का कार्य किया है, जिसका परिणाम सर्वत्र दिखाई पड़ रहा है। संघ एक राष्ट्रीय और सभ्यताई दोनों चरित्र प्रतिविंबित करता है। सभ्यता और संस्कृति के जिन आयामों को स्वतंत्रता के बाद भारतीय राज्य ने उपेक्षा की या दमन किया, संघ ने उन्हें सुरक्षित रखने और वर्तमान के साथ जोड़े रखने में अथक प्रयास किया है। संघ सांस्कृतिक संप्रभुता का प्रवक्ता और प्रहरी है।

बहस, संवाद और प्रतिरोध का लंबा समय सांस्कृतिक चेतना को परिभाषित करने में चला है। यह क्रम सीखने और सुधरने का अवसर देता है। पर कुछ लोगों की फितरत होती है, न सीखेंगे और न ही सुधरेंगे। वे तोते की तरह वही रटते रहेंगे, जिसे उनके वैचारिक पूर्वज सीखा गए। इसलिए मार्क्सवादी सीताराम येचुरी या समाजवादी अखिलेश यादव अथवा ममता और राहुल गांधी का राम मंदिर उद्घाटन का बहिष्कार न सीखने और न सुधरने की श्रेणी की घटना है।

इनके वैचारिक पूर्वजों ने ज्योतिबा फूले और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा शिवाजी महोत्सव शुरू किए जाने के प्रति असहमति जताई थी। छत्रपति शिवाजी ने 1674 में रायगढ़ को राजधानी बनाई। तिलक ने 1895 में शिवाजी महोत्सव का उद्घाटन किया।स्वतंत्रता के बाद एक निर्णायक अवसर आया जब देश के वैचारिक-राजनीतिक कुलिनों के बीच एक प्रकार से सांस्कृतिक जनमत संग्रह हो गया। अवसर था सोमनाथ मंदिर के पुननिर्माण का। कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे। उनके उपन्यास ‘सोमनाथ’ ने हिंदू मन के आलस्य को तोड़ने का काम किया। अभियान शुरू हुआ। लेखन वर्ष 1937 में हुआ, लेकिन ‘जनमत संग्रह’ 1951 में हुआ। तब राष्ट्रपति डा राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू अलग-अलग सिरे पर थे।

राजेंद्र प्रसाद पुननिर्माण को सांस्कृतिक अभ्युदय मानते थे तो नेहरू ने किन शब्दों में इसे खारिज किया वह गौरतलब है। उन्होंने इस कार्य को भारत के सांप्रदायिक मस्तिष्क की खुराफात बताया। उन्होंने एक अगस्त 1951 को मुख्यमंत्रियों को लिखे गए पत्र में उन्हें इसके पुननिर्माण पर टिप्पणी करते हुए लिखा था कि ‘भारत का सांप्रदायिक मस्तिष्क जिन चीज का प्रतिनिधित्व करता है उसे पश्चिम नापसंद करता है।’

राजेंद्र प्रसाद ने 11 मई 1951 को इसका उद्घाटन किया। नेहरू भारत की लोकप्रिय और सामूहिक चेतना से कट गए, परंतु वैचारिक पराश्रित या अंधापन में सिमटना या पराजय दिखाई नहीं पड़ती है। यूरोप भारत के एक वर्ग विशेष की सोच को प्रभावित ही नहीं बल्कि नियंत्रित करता रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गुलामी से मुक्ति का आग्रह इसी विचार को परास्त करने का है।

भारत का समकालीन विपक्ष यूरोप की वैचारिक विलासिता में डूबा हुआ है। वह भारत के लोग किस बुनियाद और स्वभाव के हैं वह इस पर स्वयं विचार करने के लिए तैयार नहीं है। संभवत: पीढ़ी के अंत के साथ ही छद्म धर्मनिरपेक्षता का अंत होगा।भारत के अल्पसंख्यक समाज को रचनात्मक बदलाव से इसी ताकत ने रोकने का काम किया है। राम बहुआयामी पक्षों के समन्वय है। उनके सांस्कृतिक पक्ष के साथ अल्पसंख्यकों की जीवन मूल्यों का समन्वय ही भारत की धर्मनिरपेक्षता में विद्यमान विरोधाभास को समाप्त कर सकता है। राम मंदिर के लिए संघर्ष भारत के राष्ट्रवाद को यूरोपीय वैचारिक दलदल से निकालकर ठोस हिंदू सभ्यताई बुनियाद पर खड़ा करता है।

जो आदत से हिंदू अस्मिता और हिंदू श्रेष्ठता को पचाने के लिए तैयार नहीं है उन्हें राम मंदिर का उद्घाटन सांप्रदायिक मस्तिष्क का असर नजर आएगा। मोदी ने हिंदुओं के मन में अपने विरासत और आध्यात्म के प्रति सोए मन को जाग्रत किया है। राम मंदिर के उद्घाटन के प्रति उत्साह की तस्वीर भारतीय मन में राम का स्थायी भाव होने जैसा है, जिसे डा राम मनोहर लोहिया ने ‘राम कृष्ण शिव’ लेख में अभिव्यक्त किया था। जो बहिष्कार कर रहे हैं, वे भारतीय समाज के मूल, वर्तमान और भविष्य- तीनों से अन्याय कर रहे हैं। भारत अपना इतिहास इस विरोध के परिवेश में लिख रहा है।

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