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सुधीश पचौरी का कॉलम बाखबर: आने-जाने का स्पर्धा राग

इन दिनों कई चैनलों पर यही ‘स्पर्धा राग’ बजता रहता है कि इनकी जा रही है, हमारी आ रही है... कि हमारी आ रही है, इनकी जा रही है..! ऐसा ‘गाल बजावन’ हो रहा है कि सभी सभी से जीत रहे हैं। सबकी सरकार भी बन चुकी है।
Written by: सुधीश पचौरी | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 26, 2024 09:20 IST
सुधीश पचौरी का कॉलम बाखबर  आने जाने का स्पर्धा राग
स्वाति मालीवाल। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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मुझे थप्पड़ मारे पेट में लात मारी..!’‘झूठ! कहां मारे… कब मारे..? वीडियो में कहां दिखा? पिटी होती तो क्या ऐसे चल पातीं..?’ ‘लेकिन एक नेता तो माना था कि ‘बदतमीजी’ हुई है..!’‘अरे उनको तब तक इतना ही मालूम था, इसलिए ऐसा बोला!’फिर एक विनम्र बयान कि इस मामले के दो पाठ हैं। एक इनका एक उनका। इस तरह, ‘पीड़ित’ के मुकाबले अपने को पीड़ित बना दो और ‘पीड़ित’ की ‘पीड़ा’ संदिग्ध कर दो।

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आत्मरक्षा का इन दिनों यही अचूक नुस्खा है। फिर एक दिन ‘मुख्य आरोपी’ पुलिस के साथ जाते हुए, फिर पुलिस द्वारा ‘फोन की फारमेटिंग’ ठीक कराने के लिए मुंबई ले जाते हुए, फिर पुलिस का घर से सीडी आदि बरामद करते हुए, लेकिन अब तक सब शून्य! फिर आरोपी की हिरासत की मियाद खत्म और नए फैसले का इंतजार करते हुए।

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फिर एक दिन पुलिस द्वारा मुख्यमंत्री के बुजुर्ग माता-पिता से पूछताछ करने के लिए आने की खबर और फिर एक प्रतिवादी बयान कि प्रधानमंत्री ने बूढ़े माता-पिता तक को नहीं बख्शा! फिर कुछ रहमदिल एंकरों का रोना-धोना कि एक महिला सांसद पीटी गई, उसके कपड़े फाड़े गए, मेडिकल रपट में चोटें मानी गईं, फिर भी विपक्षी गठबंधन में ‘चुप्पी!’ बहस में जवाब आया कि क्या प्रधानमंत्री मणिपुर गए? महिला पहलवानों द्वारा आरोपित ब्रजभूषण के बेटे को टिकट तक दिया और हमसे कहते हो कि उसे पीटा! एक कहिन कि ये ‘पीड़ित को शर्मिंदा करना’ है तो जवाब आया कि असली पीड़ित तो हम हैं!

इस चक्कर में एक रिपोर्टर तक ‘पिटा’। जिसका ‘पिटा’ उस चैनल ने बताया कि ‘पिटा’, बाकी ने आंख मूंद ली और इस तरह ‘पिटा’ ‘पिटा’ हुआ ही रहा। एक एंकर कहिन कि घर के अंदर मारपीट की यह अकथ कहानी एक जून तक चलनी है। फिर एक दिन एक रैली में मोदी जी कहिन कि चार जून को अपनी सरकार आ रही है तो तुरंत जवाब आया कि चार जून को मोदी की सरकार जा रही है और हमारी आ रही है। इन दिनों कई चैनलों पर यही ‘स्पर्धा राग’ बजता रहता है कि इनकी जा रही है, हमारी आ रही है… कि हमारी आ रही है, इनकी जा रही है..!

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ऐसा ‘गाल बजावन’ हो रहा है कि सभी सभी से जीत रहे हैं। सबकी सरकार भी बन चुकी है। एक विज्ञापन तो बिना सरकार बने, अभी से हर महिला को एक लाख देने लगा है और इलाज के लिए पच्चीस लाख दे रहा है। चार जून को जीतें न जीतें, लेकिन कल्पित जीत का सुख तो ले ही लें। गजब की पतंगबाजी है। हर कोई पेंच लड़ा रहा है और कटे न कटे, ‘वोक्काटा वोक्काटा’ चिल्ला रहा है।

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इसी बीच एक भाजपा नेता ने सवाल के जवाब में ऐसी बात करने वालों को कहा- ‘शेख चिल्ली’ और लगा कि सर्वत्र ‘शेख चिल्लियों का जनतंत्र’ है। ‘सेफोलोजिस्टों’ में भी जीत-हार की होड़ है। एक कहता है कि भाजपा को 268 सीटें मिलेंगी, तो दूसरा कहता कि 300 मिलेंगी। तीसरा इतराकर बोलता है कि हम तो एक जून को ही बताएंगे कि कौन जीत रहा है। तभी मिठाई खाएंगे और नाचेंगे भी! ऐसी ‘अटकल पच्चू’ अब बोर करने लगी हैं। फिर एक दिन एक दल को मिली ‘विदेशी फंडिग’ की खबर ‘ब्रेक’ हुई तो भी कुछ न हुआ और वही अनुमानित जवाब आया कि यह सब भाजपा का षड्यंत्र है, क्योंकि यह सरकार जा रही है..!

इसके बाद कोलकाता हाई कोर्ट द्वारा बंगाल सरकार द्वारा 2010 के बाद दिए गए ओबीसी प्रमाणपत्रों को रद्द करने की खबर ने ‘कोलकाता हिलेला’ कर दिया। जवाब में फिर एक बार मुख्यमंत्री ने दहाड़ा कि इस फैसले को ‘मानबो ना, मानबो ना’। सच, अपने कई नेता बड़े ही हिम्मती हैं कि अदालत तक के फैसलों को नहीं मानते। लेकिन फैसले से भाजपा गद्गद कि जो वह कह रही थी, वही अब कोर्ट भी कह रहा है कि ‘ओबीसी कोटे’ में ‘मुसलिमों को कोटा’ देना ओबीसी के ‘कोटे’ को ‘कम’ करना है और कि धार्मिक आधार पर ऐसे कोटा देना एकदम ‘असंवैधानिक’ है। इस पर भी कुछ उदार हृदय एंकर लगे रहे कि भई, मुसलिमों ने किसी का क्या बिगाड़ा है!

फिर एक दिन एक करोड़पति के बेटे ने दो युवकों को अपनी कार से रौंद डाला और मजा ये कि अदालत ने किशोर को एक निबंध लिखवाकर छोड़ दिया। इस पर मुंबईकरों का गुस्सा फूटता रहा। फिर एक मंत्री जी समेत पुलिस को ‘अपराध’ का एक बार फिर संज्ञान लेना पडा। इसी बीच ‘व्यवस्था के भेदभाव’ को देख एक नेता का दिल दहल उठा कि एक मुख्यमंत्री बाहर और एक अंदर… कुछ एंकर लग गए कि ये कैसा भेदवादी नजरिया है? फिर दो समझाने आए। एक कहिन कि ‘मोदी ग्रेट’ तो दूसरा आधे मन से कि मोदी ग्रेट, लेकिन समस्या और भी ग्रेट! फिर एक एंकर चहका कि बाजार की संवेदनशीलता शीर्ष पर।

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