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Blog: खतरनाक हो रही हैं मच्छर से पैदा होने वाली बीमारियां, चिकनगुनिया ने बढ़ाई डॉक्टरों की चिंता

जलवायु परिवर्तन की वजह से मच्छरों के लिए अनुकूल वातावरण मिल रहा है, जिससे उनके प्रसार में वृद्धि हो रही है। पढ़ें रंजना मिश्रा की रिपोर्ट।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: March 25, 2024 04:06 IST
blog  खतरनाक हो रही हैं मच्छर से पैदा होने वाली बीमारियां  चिकनगुनिया ने बढ़ाई डॉक्टरों की चिंता
चिकनगुनिया, डेंगू और जीका विषाणु एडीज मच्छरों के काटने से फैलते हैं। (Photo Source: Tashi Tobgyal)
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चिकनगुनिया के लिए अब तक कोई प्रभावशाली उपचार या टीका नहीं था। हालांकि, मच्छरों के काटने से बचाव के उपाय करके चिकनगुनिया के जोखिम को कम किया जाता रहा है। यह तेजी से फैलने वाली बीमारी है और अब तक दुनिया भर के सौ से अधिक देशों में फैल चुकी है। पिछले पंद्रह वर्षों में चिकनगुनिया के मामलों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। 2008 से अब तक चिकनगुनिया के कम से कम पचास लाख मामले सामने आए हैं।

जलवायु परिवर्तन की वजह से मच्छरों के लिए अनुकूल वातावरण मिल रहा

जलवायु परिवर्तन की वजह से मच्छरों के लिए अनुकूल वातावरण मिल रहा है, जिससे उनके प्रसार में वृद्धि हो रही है। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय यात्रा में बढ़ोतरी होने से चिकनगुनिया के वायरस के एक देश से दूसरे देश में पहुंचने का खतरा भी बढ़ गया है। यह चिकित्सकों के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है।

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चिकनगुनिया का गलत निदान होने से मरीजों को सही उपचार नहीं मिल पाता

चिकनगुनिया, डेंगू और जीका विषाणु एडीज मच्छरों के काटने से फैलते हैं। तीनों बीमारियों के लक्षण इतने समान होते हैं कि डाक्टरों के लिए इनमें अंतर करना मुश्किल हो जाता है। इस वजह से चिकनगुनिया का गलत निदान भी हो सकता है। इसके कई कारण हो सकते हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख कारण हैं- रोगी के लक्षणों का सही ढंग से वर्णन न करना, डाक्टर द्वारा सही परीक्षण न करना, रोगी के यात्रा इतिहास या अन्य जोखिम कारकों की अनदेखी करना। चिकनगुनिया का गलत निदान होने से मरीजों को सही उपचार नहीं मिल पाता।

बचाव के उपायों के साथ-साथ वैक्सीन विकसित करना बहुत जरूरी है

चिकनगुनिया का प्रसार रोकने के लिए मच्छरों के काटने से बचाव के उपायों के साथ-साथ इसका टीका यानी वैक्सीन विकसित करना भी अत्यंत आवश्यक माना जाता रहा है। इसी क्रम में 9 नवंबर, 2023 को अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने चिकनगुनिया के लिए दुनिया की पहले टीके को मंजूरी दे दी। यह टीका अठारह वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों में चिकनगुनिया के खिलाफ 98 फीसद प्रभावी है। इसका नाम है, ‘इक्सचिक’। यह एक जीवित, कमजोर चिकनगुनिया विषाणु से बना है और इसकी एकल खुराक को इंजेक्शन के माध्यम से मांसपेशियों में दिया जाएगा।

इक्सचिक को अठारह वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों के लिए अनुमोदित किया गया है। इसे त्वरित प्रभाव से अनुमोदित किया गया। त्वरित अनुमोदन का उपयोग ऐसी दवाओं या टीकों के लिए किया जाता है, जो गंभीर बीमारियों के इलाज या रोकथाम के लिए आवश्यक हैं और जिनके बारे में पर्याप्त सबूत हैं कि वे प्रभावी और सुरक्षित हैं। चिकनगुनिया पर काबू पाने के लिए यह टीका एक महत्त्वपूर्ण खोज है। इससे चिकनगुनिया के प्रसार को नियंत्रित करने तथा उससे पैदा होने वाली जटिलताओं को रोकने में मदद मिल सकती है। हालांकि इस टीके को अब भी बड़े पैमाने पर उपयोग के लिए अनुमोदित नहीं किया गया है, पर आशा है कि यह जल्दी ही उपलब्ध हो जाएगी।

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इक्सचिक टीके की सुरक्षा का मूल्यांकन करने के लिए उत्तरी अमेरिका में दो नैदानिक अध्ययन किए गए। ये अध्ययन साढ़े तीन हजार और एक हजार लोगों के दो समूहों पर किए गए। एक अध्ययन में अठारह वर्ष और उससे अधिक उम्र के लगभग साढ़े तीन हजार प्रतिभागियों को इस टीके की खुराक मिली थी, जबकि अन्य अध्ययन में लगभग एक हजार प्रतिभागियों को ‘प्लेसिबो’ दिया गया था। प्लेसिबो एक ऐसा उपचार है, जो वास्तव में कोई उपचार नहीं है। यह एक खाली कैप्सूल, इंजेक्शन या एक गोली हो सकती है। इसमें कोई सक्रिय दवा नहीं होती। प्लेसिबो का इस्तेमाल अक्सर दवाओं या उपचारों की प्रभावशीलता का परीक्षण करने के लिए किया जाता है। प्लेसिबो का मनोवैज्ञानिक प्रभाव होता है, जिसे प्लेसिबो प्रभाव कहा जाता है। इसका अर्थ है कि जब लोग सोचते हैं कि उन्हें एक प्रभावी उपचार मिल रहा है तो वे वास्तव में बेहतर महसूस करने लगते हैं।

प्लेसिबो प्रभाव का उपयोग कई तरह से किया जा सकता है। इसे दवाओं या उपचारों की प्रभावशीलता का परीक्षण करने, दर्द या अन्य लक्षणों को कम करने के लिए भी उपयोग किया जा सकता है। जब किसी भी टीके का नैदानिक अध्ययन किया जाता है तो समूह के कुछ लोगों पर वास्तविक उपचार प्रक्रिया को अपनाया जाता है और कुछ लोगों को वास्तविक उपचार की तरह दिखने वाला नकली उपचार दिया जाता है। दरअसल, उस व्यक्ति पर किए गए उपचार के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को समझने तथा किसी नई दवा या टीके के वास्तविक प्रभाव को जांचने के लिए ऐसे नकली उपचार का सहारा लिया जाता है, जिसे प्लेसिबो कहा जाता है। इस अध्ययन में जिन प्रतिभागियों को इक्सचिक का टीका दिया गया था, उनमें सिरदर्द, थकान, मांसपेशियों में दर्द, जोड़ों में दर्द, बुखार और मतली जैसे सामान्य दुष्प्रभाव देखे गए।

इसके अलावा लगभग 1.6 फीसद टीका लेने वालों में चिकनगुनिया जैसी गंभीर प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं भी देखी गईं। कुछ लोगों में ये प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं कम से कम तीस दिनों तक रहीं। इस टीके की प्रभावशीलता की जांच करने के लिए भी अमेरिका में एक नैदानिक अध्ययन किया गया। इस अध्ययन में टीका लेने वाले 266 प्रतिभागियों की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया की तुलना 96 ऐसे प्रतिभागियों की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया से की गई, जिन्हें प्लेसिबो दिया गया था। इस अध्ययन के प्रतिभागियों में प्रतिपिंड (एंटीबाडी) के स्तर का मूल्यांकन गैर-मानव ‘प्राइमेट्स’ में सुरक्षात्मक दिखाए गए स्तर पर आधारित था।

इन गैर-मानव प्राइमेट्स को टीका लगाए गए लोगों से रक्त प्रदान किया गया था। इस अध्ययन में लगभग सभी टीका प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों ने इस प्रतिपिंड (एंटीबाडी) स्तर को हासिल किया था। प्रतिपिंड (एंटीबाडी) अंग्रेजी वाई आकार के अणुओं का एक प्रकार का प्रोटीन होता है, जो प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा बनाया जाता है। ये शरीर को हानिकारक पदार्थों जैसे बैक्टीरिया और विषाणुओं से बचाने में मदद करते हैं। टीका शरीर में एंटीबाडी उत्पन्न करने में बहुत प्रभावी होता है।

कुछ टीके जीवित, लेकिन निष्क्रिय रोगजनक से बने होते हैं। ये रोगजनक शरीर में प्रवेश करते और प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय करते हैं। इसके अलावा कुछ टीके रोगजनकों के हिस्सों से बने होते हैं। ये भी शरीर में प्रवेश करके प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय करते हैं। इस प्रकार टीका संक्रमण से बचाने में मदद और गंभीर बीमारी या मृत्यु के जोखिम को कम कर सकता है। इक्सचिक टीके पर अमेरिका में किए गए इन नैदानिक अध्ययनों का डेटा मेडिकल जर्नल ‘लैंसेट’ में प्रकाशित किया गया है। चिकनगुनिया की रोकथाम में यह टीका एक महत्त्वपूर्ण प्रगति है। उम्मीद है कि इससे उन देशों को बहुत राहत मिलेगी, जहां चिकनगुनिया बहुत तेजी से फैल रहा है।

ब्राजील, पैराग्वे, पश्चिमी अफ्रीका के कुछ हिस्सों और भारत में चिकनगुनिया का अधिक प्रकोप है। ‘वेक्टर’ जनित बीमारियों के राष्ट्रीय डेटा के अनुसार, भारत में सितंबर 2023 तक चिकनगुनिया के 93,455 संदिग्ध मामले सामने आए। ऐसे टीके की जरूरत महसूस की जा रही थी, इसलिए भारत जैसे देशों के संदर्भ में इस टीके का विशेष महत्त्व है।

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