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Blog: दूध का कारोबार और भारतीय अर्थव्यवस्था, डेयरी उत्पादन में तेजी से बढ़ रहा रोजगार की संभावनाएं

कुछ समय पहले आई पशुपालन और डेयरी मंत्रालय की रपट के अनुसार भारत दूध उत्पादन में दुनिया में पहले पायदान पर है। विश्व के कुल दूध उत्पादन में भारत चौबीस फीसद का योगदान देता है।
Written by: प्रमोद भार्गव
नई दिल्ली | Updated: February 13, 2024 09:37 IST
blog  दूध का कारोबार और भारतीय अर्थव्यवस्था  डेयरी उत्पादन में तेजी से बढ़ रहा रोजगार की संभावनाएं
देश में छियानबे हजार सहकारी संस्थाएं दूध उत्पादन से जुड़ी हैं।
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संसद में अंतरिम बजट प्रस्तुत करते हुए वित्तमंत्री ने देश में दुग्ध और डेयरी उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया। भारत का दूध उत्पादन 2022-23 में चार फीसद बढ़कर 23.058 करोड़ टन हो गया है। बावजूद इसके, इसकी निरंतर बढ़त बनाए रखने के लिए प्रभावी उपाय करने जरूरी हैं, क्योंकि दूध और उसके सह-उत्पाद से ग्रामीण क्षेत्रों में न केवल बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित होता, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी काफी बल मिलता है। कुछ समय पहले आई पशुपालन और डेयरी मंत्रालय की रपट के अनुसार भारत दूध उत्पादन में दुनिया में पहले पायदान पर है। विश्व के कुल दूध उत्पादन में भारत चौबीस फीसद का योगदान देता है।

सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में दुग्ध क्रांति के बाद बढ़ा उत्पादन

वैसे तो भारत में दूध पशुपालक उत्पादित करते हैं। उनका यह परंपरागत धंधा है, जिसे वे ज्ञान परंपरा से जानते-सीखते हैं। पर सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में हुई श्वेत या दुग्ध क्रांति के बाद दुग्ध उत्पादन पर जोर बढ़ गया। 1946 में उन्होंने मोरारजी देसाई और त्रिभुवन दास पटेल की सहायता से भारत की पहली दुग्ध सहकारी संस्था की स्थापना की, जिसे बाद में जिला सहकारी दुग्ध उत्पादन संघ के नाम से जाना गया। ढाई सौ लीटर प्रतिदिन दूध का कारोबार करने वाली इसी संस्था को आज ‘अमूल’ के नाम से जाना जाता है। देश में दूध का सत्तर फीसद कारोबार असंगठित ढांचा संभाल रहा है। इसमें ज्यादातर लोग अशिक्षित हैं। मगर पारंपरिक ज्ञान से वे बड़ी मात्रा में दुग्ध उत्पादन में सफल हैं।

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देश में दूध का तीस फीसद कारोबार डेयरियों के माध्यम से होता है

दूध का तीस फीसद कारोबार संगठित ढांचा, मसलन डेयरियों के माध्यम से होता है। देश में छियानबे हजार सहकारी संस्थाएं दूध उत्पादन से जुड़ी हैं। चौदह राज्यों की अपनी सहकारी दुग्ध संस्थाएं हैं। देश में कुल कृषि खाद्य उत्पाद और दूध उत्पादन से जुड़ी प्रसंस्करण सुविधाएं महज दो फीसद हैं। मगर वह दूध ही है, जिसका सबसे ज्यादा प्रसंस्करण करके दही, मट्ठा, घी, मक्खन, मावा, पनीर आदि बनाए जाते हैं। इस कारोबार से आठ करोड़ से भी ज्यादा लोगों की आजीविका जुड़ी है। इसमें ग्रामीण महिलाओं की अहम भूमिका रहती है।

वर्ष 2013-14 के दौरान देश में 1463 लाख टन दूध उत्पादन हुआ था, जो 2022-23 में बढ़ कर 2306 लाख टन हो गया है। भारत में प्रति वर्ष दूध उत्पादन 5.9 फीसद से ज्यादा की दर से बढ़ रहा है, जबकि दुनिया में दूध की औसत वृद्धि प्रति वर्ष मात्र दो फीसद है। करीब डेढ़ सौ देशों में भारत के सह-दुग्ध उत्पादों की मांग है। पिछले वर्ष पैंसठ लाख टन दुग्ध उत्पाद का निर्यात हुआ था। केंद्रीय पशुपालन एवं डेयरी राज्यमंत्री का कहना है कि देश की अर्थव्यस्था में डेयरी क्षेत्र का योगदान पांच फीसद है और यह लगभग आठ करोड़ लोगों के रोजगार का बारहमासी मजबूत साधन है।

दूध की इस बड़ी अर्थव्यस्था में समृद्धि का रास्ता राष्ट्रीय गोकुल मिशन के अस्तित्व में आने के बाद खुला है। इस योजना की शुरुआत दिसंबर 2014 में हुई थी। लक्ष्य था, वैज्ञानिक तरीके से देसी गो-जातीय प्रजातियों का विकास और संवर्धन। फलस्वरूप, राज्यों में गायों और भैंसों के परंपरागत प्रजनन तरीके से अलग किसानों के दरवाजे पर कृत्रिम गर्भाधान जैसी सेवाएं उपलब्ध कराईं। इसके पहले देश में दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के नजरिए से वर्ण-संकर पद्धति पर जोर दिया जाता था, इससे वृद्धि तो हुई, लेकिन गति अत्यंत धीमी रही।

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दूध की बढ़ती खपत के चलते दुनिया के देशों की निगाहें भी इस व्यापार को हड़पने पर लगी हैं। दूध का कारोबार करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी फ्रांस की ‘लैक्टेल’ है। इसने हैदराबाद की सबसे बड़ी ‘तिरूमाला डेयरी’ को 1750 करोड़ रुपए में खरीद लिया है। इसे चार किसानों ने मिलकर बनाया था। भारत की तेल कंपनी आयल इंडिया भी इसमें प्रवेश कर रही है। क्योंकि दूध का यह कारोबार विश्वस्तर पर करीब सोलह फीसद की दर से हर वर्ष बढ़ रहा है। अमेरिका भी अपने देश में बने सह-उत्पाद भारत में खपाने की जुगत में है। हालांकि उसे सफलता नहीं मिली है। अमेरिका अपना चीज भारत में बेचना चाहता है। मगर भारत के शाकाहारियों को उसका चीज स्वीकार्य नहीं है। अमेरिका में गायों को मांसयुक्त चारा खिलाया जाता है, ताकि वे ज्यादा दूध दें। लिहाजा, अमेरिका को चीज बेचने की इजाजत नहीं मिल पा रही है। मगर इससे इतना तो तय है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों की निगाहें हमारे देसी दूध के कारोबार को हड़पने में लगी हैं।

इतना व्यापक और महत्त्वपूर्ण व्यवसाय होने के बावजूद इसकी गुणवत्ता पर निगरानी के लिए कोई नियामक तंत्र देश में नहीं है। इसलिए दूध की मिलावट में इंसानी लालच बड़ी समस्या बना हुआ है। हालांकि दूध में मिलावट का पता लगाने के लिए भारत में ही निर्मित एक नए यंत्र का निर्माण हुआ है। इसे वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद और केंद्रीय इलेक्ट्रानिक्स इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान ने मिलकर बनाया है। यह तकनीक कोई दूसरा देश अब तक विकसित नहीं कर पाया है। मिलावट की मामूली मात्रा को भी यह यंत्र पकड़ने में सक्षम है। साथ ही, महज 40-45 सेकंड में दूध के नमूने की जांच हो जाती है। इस यंत्र से दूध के नमूने को जांचने का खर्च केवल पांच-दस पैसे आता है। इस नाते यह तकनीक बेहद सस्ती है। मगर इसकी अभी तक कोई सार्थक उपयोगिता सामने नहीं आई है।

हालांकि केवल दूध के नमूने की जांच भर से शुद्ध दूध की गारंटी संभव नहीं है। वह इसलिए कि मवेशियों को जो चारा खिलाया जाता है, उसमें भी दूध की मात्रा बढ़ाने के लिए रासायनिक तत्त्व मिलाए जाते हैं। यही नहीं, दुधारू मवेशी दूध ज्यादा दें, इसके लिए आक्सीटासिन इंजेक्शन लगाए जाते हैं। इनसे दूध का उत्पादन तो बढ़ता है, लेकिन अशुद्धता भी बढ़ती है। दूध में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने के लिए कंपनियों में जो डिब्बाबंद चारा बनाया जाता है, उसमें मेलामाइन रसायन का उपयोग किया जाता है, जो नाइट्रोजन को बढ़ाता है। जाहिर है, दूध की शुद्धता के लिए कारखानों में किए जा रहे इन उत्पादों पर भी प्रतिबंध लगाना जरूरी है, क्योंकि दूध के नमूने की जांच में वह दूध भी अशुद्ध पाया गया है, जिसमें ऊपर से कोई मिलावट नहीं की जाती है।

यह अशुद्धता चारे में मिलाए गए रसायनों द्वारा सामने आई है। मसलन, दूध की कमी की पूर्ति सिंथेटिक दूध बनाकर और पानी मिलाकर की जाती है। यूरिया से भी दूध बनाया जा रहा है। दूध की लगातार बढ़ रही मांग के कारण मिलावटी दूध का कारोबार गांव-गांव फैलता जा रहा है। बहरहाल, मिलावटी दूध के दुष्परिणाम जो भी हों, इस असली-नकली दूध का कारोबार आठ करोड़ लोगों को रोजगार देने के साथ, देश की अर्थव्यवस्था में भी बड़ा योगदान दे रहा है।

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