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Blog: 2050 तक चौगुना हो सकता है समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण, कचरे का भंडार बनते समंदर

विश्व आर्थिक मंच द्वारा किए गए एक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण 2050 तक चौगुना हो सकता है, जबकि माइक्रोप्लास्टिक सन 2100 तक पचास गुना बढ़ सकता है। पढ़ें मनीष कुमार चौधरी की रिपोर्ट।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: April 02, 2024 14:06 IST
blog  2050 तक चौगुना हो सकता है समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण  कचरे का भंडार बनते समंदर
एशिया में प्रति व्यक्ति सालाना प्लास्टिक का इस्तेमाल बीस किलोग्राम है। यह सारा प्लास्टिक कचरा धीरे-धीरे समुद्रों में दफ्न कर दिया जाता है, जिसकी वजह से आज समुद्र कचरे का ढेर बन गया है।
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समंदर ने हमें बहुत कुछ दिया है, लेकिन हम उसे कचरे के सिवाय कुछ नहीं दे रहे। ‘इंटरनेशनल यूनियन फार कंजर्वेशन आफ नेचर’ की एक रपट के मुताबिक, हर साल लगभग तीस करोड़ टन प्लास्टिक का निर्माण होता है। इसमें से लगभग 1.4 करोड़ टन प्लास्टिक कचरे के रूप में हर साल समंदर में डाल दिया जाता है। समुद्र की गहराई का उपयोग बड़ी मात्रा में परमाणु सामग्री दफ्न करने के लिए भी किया गया। पहले और दूसरे विश्वयुद्ध के बाद के वर्षों में, ब्रिटिश, अमेरिकी, सोवियत, आस्ट्रेलियाई और कनाडाई सरकारों ने सैकड़ों-हजारों टन अप्रचलित रासायनिक हथियारों को ड्रमों में भर कर या टुकड़ों में बांट कर पानी की गहराई में दफ्न कर दिया।

कचरे को ‘समुद्र तल पर धीमी गति से चल रहा चेर्नोबिल’

हालांकि सार्वजनिक आक्रोश के कारण इस प्रथा को 1972 में समाप्त कर दिया गया था। मगर वर्ष 2019 के एक अध्ययन में आर्कटिक महासागर के तल पर कम से कम अठारह हजार रेडियोधर्मी वस्तुएं बिखरी हुई पाई गईं, उनमें से कई सोवियत संघ द्वारा फेंकी गई थीं। जब ये वस्तुएं अपना जहर पानी में छोड़ना शुरू कर देंगी, तब क्या होगा! कई पर्यावरणविदों ने इस स्थिति को ‘समुद्र तल पर धीमी गति से चल रहा चेर्नोबिल’ कहा है।

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सोवियत संघ ने समुद्र तल पर अधिक परमाणु कचरा फेंका था

हालांकि सोवियत संघ ने किसी भी अन्य देश की तुलना में समुद्र तल पर अधिक परमाणु कचरा फेंका था, लेकिन इस मामले में वह अकेला नहीं था। 1948 और 1982 के बीच, ब्रिटिश सरकार ने लगभग सत्तर हजार टन परमाणु कचरा समुद्र की गहराई में भेज दिया। कम मात्रा में ही सही, अमेरिका, स्विट्जरलैंड, जापान और नीदरलैंड ने रेडियोधर्मी सामग्री के निपटान के लिए समुद्र का उपयोग किया है। अब जबकि अंतरराष्ट्रीय संधियां समुद्र में रेडियोधर्मी सामग्री के निपटान पर रोक लगाती हैं, ब्रिटिश सरकार कुंब्रिया के समुद्र तल के नीचे सौ टन से अधिक प्लूटोनियम सहित साढ़े सात लाख घन मीटर परमाणु कचरे के निपटान की योजना तलाश रही है।

ब्रिटिश अधिकारियों का कुतर्क है कि इस प्रकार का भूवैज्ञानिक निपटान सैकड़ों-हजारों वर्षों तक कचरे को स्थिर और सुरक्षित रखने का एक तरीका प्रदान करता है। समुद्र में परमाणु कचरे का निपटान लापरवाही और लालच की एक बहुत बड़ी कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है। प्लास्टिक और अन्य वस्तुओं के रूप में भी मानव अपशिष्ट गहरे समुद्र में हर जगह दफ्न है। कचरे का यह ज्वार समुद्र के सबसे गहरे और दूरस्थ हिस्सों तक पहुंच गया है।

समुद्र की गहराई में माइक्रोप्लास्टिक का बढ़ता संचय खतरा

सबसे अधिक परेशान करने वाली बात समुद्र की गहराई में माइक्रोप्लास्टिक का बढ़ता संचय है। कुछ माइक्रोप्लास्टिक बड़ी प्लास्टिक वस्तुओं के पानी में टूटने का परिणाम होते हैं। समुद्र की ऊपरी परतों में माइक्रोप्लास्टिक ने खाद्य शृंखला पर आक्रमण किया है। जैसे-जैसे माइक्रोप्लास्टिक परतों को पार करता हुआ ऊपर की ओर बढ़ता है, उच्च और उच्चतर सांद्रता में एकत्रित होता जाता है। व्हेल और पक्षी बड़ी मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक का उपभोग कर रहे हैं, जिससे उन्हें कुपोषण हो रहा है और उन जीवों के कई अंगों को नुकसान पहुंच रहा है, क्योंकि माइक्रोप्लास्टिक उनके ऊतकों में एकत्र हो जाते हैं।

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समुद्री जैव विविधता के लिए भी खतरा है समुद्री कचरा

विश्व आर्थिक मंच द्वारा किए गए एक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण 2050 तक चौगुना हो सकता है, जबकि माइक्रोप्लास्टिक सन 2100 तक पचास गुना बढ़ सकता है। यह समुद्री जैव विविधता के लिए खतरा तो है ही, कुछ प्रजातियों को विलुप्ति के कगार पर पहुंचा सकता है। भारत में लगभग 6.5 करोड़ टन ठोस अपशिष्ट पैदा होता है, जिसमें से लगभग 6.2 करोड़ टन नगरीय ठोस अपशिष्ट होता है। इसका लगभग 75 से 80 फीसद ही नगर निकायों द्वारा संग्रहित किया जाता है। शेष अपशिष्ट नदियों के माध्यम से अंतत: समुद्र में पहुंच कर समुद्री मलबे का हिस्सा बन जाता है।

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भारत की प्रमुख नदियों और सहायक नदियों द्वारा लगभग पंद्रह से बीस फीसद प्लास्टिक अपशिष्ट को बहाकर समुद्र तक लाया जाता है। अगर इसी प्रकार से वैश्विक स्तर पर यह क्रम चलता रहा तो 2050 तक समुद्र में मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक कचरे की मात्रा होगी। ‘वर्ल्डवाच इंस्टीट्यूट’ की एक रपट के मुताबिक, अमेरिका और यूरोप में प्रति व्यक्ति वर्ष में करीब सौ किलो प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है। इसमें ज्यादातर प्लास्टिक का इस्तेमाल पैकेजिंग के लिए किया जाता है, जो एक बार इस्तेमाल होने के बाद फेंक दिया जाता है।

एशिया में प्रति व्यक्ति सालाना प्लास्टिक का इस्तेमाल बीस किलोग्राम है। यह सारा प्लास्टिक कचरा धीरे-धीरे समुद्रों में दफ्न कर दिया जाता है, जिसकी वजह से आज समुद्र कचरे का ढेर बन गया है। दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक का सिर्फ एक तिहाई हिस्सा पुनर्चक्रित हो पाता है। प्लास्टिक के साथ समस्या यह है कि वह जल्दी से नहीं गलता, कई सौ वर्ष तक जमीन या समंदर में वैसे का वैसा पड़ा रहता और धीरे-धीरे माइक्रोप्लास्टिक के जरिए अपने आसपास के हिस्से को प्रदूषित करता रहता है। अध्ययनों से पता चलता है कि हर साल समुद्र में दफ्न होने वाले 1.1 करोड़ टन से अधिक प्लास्टिक का 99.8 फीसद हिस्सा गहरे पानी में रहता है।

बड़ी प्लास्टिक वस्तुएं आसानी से डूब जाती हैं, लेकिन माइक्रोप्लास्टिक कहीं अधिक घुमावदार रास्ते अपनाते हैं। कुछ समुद्री बर्फ के साथ नीचे की ओर बहते हैं, कुछ मछलियों और अन्य जानवरों के मल में निकल जाते हैं। कुछ तो शैवाल के टुकड़ों में जमा हो जाते हैं। यह प्रक्रिया हर साल चार लाख टन से अधिक प्लास्टिक को गहरे समुद्र में ले जा सकती है। 2019 में चीनी वैज्ञानिकों ने मारियाना ट्रेंच के तल पर रहने वाले उभयचरों के शरीर में 1940 और 1950 के दशक में परमाणु बमों के विस्फोट से रेडियोधर्मी कार्बन-14 की खोज की।

1946 से 1993 तक, तेरह देशों ने मुख्य रूप से चिकित्सा, अनुसंधान और परमाणु उद्योगों से निकले लगभग दो लाख टन परमाणु/ रेडियोधर्मी कचरे के निपटान के लिए समुद्रों का उपयोग किया। अपशिष्ट पदार्थों में विभिन्न कंटेनरों में रखे गए तरल और ठोस पदार्थ, रिएक्टर जहाज, खर्च किए गए या क्षतिग्रस्त परमाणु ईंधन शामिल थे। वर्ष 1993 से अंतरराष्ट्रीय संधियों द्वारा महासागर निपटान पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

भले समुद्र में निपटान के मामले में अब तक केवल निम्न स्तर का रेडियोधर्मी कचरा ही डाला गया है, लेकिन समुद्र तल पर फैले सैकड़ों-हजारों टन परमाणु कचरे के धीमे क्षय की तरह, समुद्री जीवों के शरीर में प्रवेश कर गई मानव उद्योगों की जहरीली विरासतें याद दिलाती हैं कि गहराई भूलने की जगह नहीं है कि जहां कुछ भी डाल दो और भूल जाओ। गहरा महासागर पृथ्वी पर सबसे बड़ा वातावरण है, जो समुद्री जीवमंडल का 95 फीसद हिस्सा बनाता है। गहरे समुद्र को मानव गतिविधि से किसी भी तरह अलग मानना अब संभव नहीं है। इसे कचरा निपटान स्थल मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी।

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