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Blog: उपेक्षा की शिकार बुजुर्ग आबादी, सामाजिक मूल्यों की गिरावट के साथ वरिष्ठ नागरिकों के भविष्य की चुनौतियां

हावी होती उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण साठ फीसद बुजुर्ग पारिवारिक प्रताड़ना सहने को मजबूर हैं। तीस फीसद बुजुर्ग अत्यधिक प्रताड़ना के बाद पारिवारिक हिंसा की शिकायत दर्ज कराने कानून की चौखट तक पहुंचते हैं। पढ़ें विनोद के शाह।
Written by: जनसत्ता
नई दिल्ली | Updated: April 04, 2024 14:31 IST
blog  उपेक्षा की शिकार बुजुर्ग आबादी  सामाजिक मूल्यों की गिरावट के साथ वरिष्ठ नागरिकों के भविष्य की चुनौतियां
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सभी संयुक्त परिवार में सम्मानित रहे बुजुर्ग, बदलते जीवन मूल्यों और आर्थिक उपार्जन में निर्बलता के कारण उपेक्षित और एकाकी जीवन गुजराने को मजबूर हैं। यह समस्या देश के करीब अस्सी फीसद बुजुर्गों की है। नीति आयोग की ‘भारत में वरिष्ठ नागरिक देखभाल- प्रतिमान परिकल्पना’ शीषर्क से प्रकाशित रपट में कहा गया है कि सन 2050 में भारत का हर चौथा व्यक्ति बुजुर्ग होगा। सामाजिक मूल्यों में हो रहे क्षरण की चुनौती के साथ देश में बुजुर्गों के लिए एक ससम्मान सुरक्षित भविष्य को तलाशना देश और सरकार दोनों की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी है। बाजार बुजुर्ग आबादी की देखभाल के लिए ‘स्टार्टअप’ के माध्यम से युवाओं को रोजगार देने की भविष्यवाणी कर रहा है। यह देश में सामाजिक मूल्यों की गिरावट के साथ बुजुर्गों के भविष्य की चुनौतियों का संकेत है। आर्थिक आवश्यकताओं के लिए देश के 48 फीसद बुजुर्ग पूरी तरह संतानों पर निर्भर हैं। उनके पास आय के संसाधन नहीं हैं। मात्र 34 फीसद बुजुर्ग आबादी को सेवानिवृत्ति पेंशन मिलती है।

एक सामाजिक आकलन यह भी है कि तृतीय और चर्तुथ श्रेणी से सेवानिवृत्त अस्सी फीसद बुजुर्गों को मिलने वाली पेंशन राशि उनकी संतानें परिवार खर्चे के लिए छीन लेती हैं। हावी होती उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण साठ फीसद बुजुर्ग पारिवारिक प्रताड़ना सहने को मजबूर हैं। तीस फीसद बुजुर्ग अत्यधिक प्रताड़ना के बाद पारिवारिक हिंसा की शिकायत दर्ज कराने कानून की चौखट तक पहुंचते हैं। मारपीट, चोट पहुंचाना, मानसिक उत्पीड़न और आर्थिक तंगी के चलते परिवार या निकटतम व्यति द्वारा हिंसा इसमें शामिल है। मगर भारतीय न्याय व्यवस्था में भी इन अपराधों को सामान्य अपराध के रूप में ही देखा-सुना जाता है।

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ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले पचहत्तर फीसद बुजुर्ग पारिवारिक हिंसा के शिकार हैं। उन्हें कानूनी संरक्षण भी नहीं मिल पाता है। पारिवारिक सदस्य दो जून की रोटी के लिए उनसे मजदूरों की तरह काम लेते हैं। एक से अधिक बच्चे होने की स्थिति में बुजुर्ग मां-बाप का ही बंटवारा तक कर लेते हैं। दो जून की रोटी देने के लिए एक के हिस्से में मां आती है, तो दूसरे के हिस्से में पिता! इस तरह बुजुर्गों को दो जून रोटी तो उपलब्ध हो जाती है, लेकिन बरसों साथ रहने वाले बुजुर्ग दंपति अलगाव की जिंदगी जीने को मजबूर होते हैं। राज्य सरकारें ग्रामीण बुजुर्ग पुरुषों को पुनर्वास योजना के नाम पर ग्रामीण भजन मंडली बनाने, मात्र गाने-बजाने वाले वाद्ययंत्र उपलब्ध कराती हैं। मगर जहां जरूरत आर्थिक पुनर्वास के साथ विश्राम की अधिक है, वहां भजन मंडली योजना सिर्फ ग्राम पंचायतों को भ्रष्टाचार की खुराक उपलब्ध कराने का संसाधन बन गई है।

सरकार बुजुर्ग व्यक्तियों के बेहतर जीवन प्रबंधन के लिए देश की कुल जीडीपी का मात्र 0.73 फीसद हिस्सा खर्च कर पा रही है, जिसमें से 0.03 फीसद राशि से सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय बुर्जग पेंशन योजना संचालित करता है। उसमें राज्यों से मिलने वाले अंशदान से ही प्रति व्यक्ति पेंशन राशि का निर्धारण होता है। देश के अलग-अलग राज्यों में प्रति व्यक्ति पेंशन राशि 600 से 1200 रुपए तक मासिक है, जो तेजी से बढ़ती महंगाई के दौर में बुजुर्गों की मात्र दस दिन की खाना-खुराक के लिए भी पर्याप्त नहीं है।

भारत में अकेले बुजुर्ग आबादी प्रतिवर्ष सत्तर हजार करोड़ रुपए की राशि अपनी स्वास्थ्य सेवाओं और दवाओं पर खर्च करती है। इलाज के लिए उन्हें एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल और कई शहरों में भी भटकना पड़ता है। एक सामाजिक सर्वेक्षण के अनुसार सेवानिवृत्त बर्जुगों की बीस फीसद पेंशन राशि प्रतिमाह उनकी स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों पर खर्च होती है। जबकि देश की 53 फीसद बुजुर्ग आबादी अपनी बचत जमा राशि नियमित स्वास्थ्य खर्चों पर व्यय करने को मजबूर होती है। ग्रामीण बुजुर्ग आबादी का 45 फीसद हिस्सा नजदीक प्राथमिक चिकित्सा सेवा न होने के कारण गांव से दस से पचास किमी दूरी तय करता है। सरकारी स्तर पर चलने वाली वरिष्ठ नागरिक योजनाएं बीपीएल श्रेणी के बुजुर्गों की मात्र औपचारिक खनापूर्ति करती हैं।

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देश के उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में जीवित बुजुर्गों को शासकीय कागजों में मृत घोषित किया जा चुका है। ऐसे सैकड़ों बुजुर्ग अपने जीवित होने का प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए तहसीलों और अदालतों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। यात्रा के दौरान भी बुजुर्ग अक्सर उत्पीड़न का शिकार होते हैं। मुंबई हवाई अड्डे पर पहिएदार कुर्सी न मिलने के कारण एक बुजुर्ग की मौत हो गई। रेलवे में ऐसे असंख्य प्रकरण हैं, जब यात्रा के दौरान प्राथमिक चिकित्सा या यात्रा सुविधा न मिलने से उन्हें अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा। भारतीय रेल ने तो अब बुजुर्ग यात्रियों को मिलने वाली रेल किराया रियायत भी बंद कर दी है। बुजुर्गों के साथ होने वाली दुर्घटनाओं में मुआवजे का निर्धारण करते समय बुजुर्ग की आर्थिक उपयोगिता का आकलन कर क्षतिपूर्ति का निर्धारण किया जाता है।

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राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रपट के मुताबिक 2022 में देश में हुई धोखाधड़ी, लूट, जालसाजी की घटनाओं में 23.9 फीसद बुजुर्ग शिकार हुए थे। पारिवारिक कारणों और आर्थिक तंगी से परेशान होकर वर्ष 2022 में 1518 बुजुर्गों ने आत्महत्या कर ली थी। रपट के अनुसार पिछले एक वर्ष में बुजुर्गों के साथ अपराधों में 11.25 फीसद की बढ़ोतरी हुई है। साठ वर्ष से नब्बे वर्ष तक उम्र वाली बुजुर्ग महिलाएं शारीरिक शोषण और बलात्कार जैसे अपराधों का शिकार हुई हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक साठ वर्ष से अधिक उम्र की सोलह फीसद भारतीय महिलाओं के साथ सार्वजनिक स्थानों पर घृणित दुर्व्यवहार होता है।

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष यानी यूएनएफपीए की ‘इंडिया एजिंग’ रपट 2023 के अनुसार 2046 तक भारत की बजुर्ग आबादी देश के बच्चों की आबादी के बराबर हो जाएगी। देश में पंद्रह वर्ष से कम उम्र के बच्चों की जनसंख्या में तेजी से गिरावट दर्ज हो रही है। यह परिवार में और अधिक तनाव, फासला पैदा करने और बुजुर्गों के एकाकीपन में वृद्धि करने वाला साबित होगा। सामाजिक मूल्यों में गिरावट देश में बुजुर्गों के भविष्य को लेकर बड़ी चिंता पैदा करती है।

अर्थशास्त्र इसमें यह कह कर एक बड़े निवेश की संभावनाएं टटोल रहा है कि इससे युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने वाला सेवा उद्योग क्षेत्र बढ़ेगा। बुजुर्गों की मदद के बहाने रोजगार स्थापना के लगभग डेढ़ सौ से अधिक स्टार्टअप इस सेवा क्षेत्र में आ चुके हैं। देश में वर्ष 2023 में बुजुर्ग सेवा क्षेत्र के नाम पर रोजगार स्थापित करने के लिए लगभग 210 करोड़ रुपए का निवेश हुआ है। भारत में विकसित होती वृद्धाश्रम संस्कृति और बुजुर्गों का एकाकीपन, युवाओं का रोजगार की तलाश में घर छोड़ कर चले जाना और पारिवारिक क्लेश इस उद्योग को अवसर उपलब्ध कराते हैं। मगर देश में विकसित हो रहा वृद्धाश्रम बाजार, देश की वसुधैव कुटुंबकम् की संस्कृति पर आघात करता है।

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