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Blog: केपटाउन दुनिया का पहला जलविहीन शहर घोषित, अगले साल तक 1.20 अरब लोगों के सामने पीने का पानी का संकट

भारत के वैज्ञानिकों ने समुद्र के खारे पानी को पीने योग्य बनाने की स्वदेशी तकनीक विकसित कर ली है। इस संयंत्र को लक्ष्यद्वीप में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया है। संयंत्र की क्षमता हर दिन एक लाख लीटर पीने योग्य पानी बनाने की है।
Written by: निरंकार सिंह
नई दिल्ली | Updated: May 15, 2024 07:56 IST
blog  केपटाउन दुनिया का पहला जलविहीन शहर घोषित  अगले साल तक 1 20 अरब लोगों के सामने पीने का पानी का संकट
Delhi Water Crisis: यह तस्वीर 01 जून 2018 की है, जब नई दिल्ली के चाणक्यपुरी (संजय कैम्प) में पानी की कमी के चलते टैंकर से जलापूर्ति की गई। (Express photo by Abhinav Saha)
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भारत सहित दुनिया के कई इलाकों में पेयजल का भयानक संकट पैदा हो गया है। दक्षिण अफ्रीका की राजधानी केपटाउन को दुनिया का पहला जलविहीन शहर घोषित किया गया है। कुछ समय पहले संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी थी कि 2025 तक दुनिया के करीब 1.20 अरब लोगों को स्वच्छ पेयजल मिलने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। अब यह संकट हमारे सामने है। तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ जिलों में पेयजल का सदा संकट रहता है। शिमला और तमिलनाडु के चेन्नई और दक्षिण पूर्व में स्थित रामनाथपुरम जिला भूजल स्रोतों की किल्लत के कारण चर्चा में रहता है। मगर बीते साल से यहां बीस हजार लीटर पेयजल प्रतिदिन संशोधित किया जा रहा है। इसके लिए ‘सोलर थर्मल आस्मोसिस वाटर डिस्टलाइजेशन सिस्टम एफओ’ की स्थापना की गई है। इस तकनीक को आइआइटी मद्रास और इंपीरियल के जीडीएमजी ने संयुक्त रूप से विकसित किया है।

भारतीय वैज्ञानिकों ने खारे पानी को पीने योग्य बनाने की तकनीक विकसित की

इस तकनीक को भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग ने भी सहायता प्रदान की है। भारत के वैज्ञानिकों ने समुद्र के खारे पानी को पीने योग्य बनाने की स्वदेशी तकनीक विकसित कर ली है। इस संयंत्र को लक्षद्वीप में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया है। संयंत्र की क्षमता हर दिन एक लाख लीटर पीने योग्य पानी बनाने की है। देश के तटीय इलाकों के साथ-साथ समुद्र के किनारे स्थित क्षेत्रों में पानी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, लेकिन यह पीने योग्य नहीं है, क्योंकि समुद्र का पानी अक्सर खारा और अन्य खनिजों से भरपूर होता है। हमारे समाने चुनौती यह है कि इस खारे पानी को बड़े पैमाने पर पीने योग्य कैसे बनाएं। इजराइल दुनिया के उन देशों में से एक है, जिन्होंने समुद्र के खारे पानी को पीने योग्य बनाने में महारत हासिल की है।

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एलटीटीडी तकनीक को लक्षद्वीप के लिए उपयुक्त पाया गया है

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमआइएस) के राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआइओटी) की मदद से आइआइटी मद्रास के वैज्ञानिकों ने समुद्र के पानी को पीने योग्य पानी में बदलने के साधन खोजने के लिए शोध किए हैं, जो पीने, खाना पकाने और अन्य व्यक्तिगत उपयोग के लिए उपयुक्त हो सकता है। समुद्र के खारे पानी को एलटीटीडी तकनीक के जरिए पीने लायक बनाया जाता है। इस तकनीक में प्राकृतिक तरीके से समुद्र के पानी को गर्म कर खारेपन को अलग किया जाता है। यह ऐसी प्रक्रिया है, जो खारे पानी से खनिज घटकों को हटा देती है। एलटीटीडी तकनीक को लक्षद्वीप के लिए उपयुक्त पाया गया है, जहां समुद्र की सतह के पानी और गहरे समुद्र के पानी के बीच लगभग पंद्रह डिग्री सेल्सियस का जरूरी तापमान का अंतर है। जो लक्षद्वीप के तटों के आसपास के इलाकों में पाया जाता है।

इजराइल ने यह तकनीक भारत को दी थी। सन 2018 में जब इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू भारत यात्रा पर आए थे, उन्होंने गुजरात में मोबाइल वाटर डिसेलिनेशन जीप उपहार के तौर पर भारत को दिया था। यह जीप खारे पानी को मीठा बनाती है। एक दिन में यह मोबाइल संयंत्र (जीप) बीस हजार लीटर समुद्र के खारे पानी को साफ कर सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक इसमें अस्सी हजार लीटर से ज्यादा काले, मटमैले और गंदे पानी को पीने लायक बनाने की क्षमता है।

महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में पानी की बड़ी समस्या

मानव जनित जलवायु परिवर्तन के कारण विश्व के लगभग सभी बड़े शहरों में जलापूर्ति के प्राकृतिक स्रोत, जैसे नदियां, झीलें, झरने, तालाब आदि प्रभावित हुए हैं और सभी को शुद्ध पेयजल पहुंचाना एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। ऐसे में कई देश समुद्री पानी को पीने योग्य बनाने पर काम कर रहे हैं। वैसे तो पानी का संकट महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में सदैव रहता है। पर तमिलनाडु के चेन्नई में समस्या इतनी विकट हो चुकी है कि समुद्र का पानी ‘डिसेलिनेशन’ कर पेयजल के रूप में लोगों तक पहुंचाया जा रहा है। वहां के समुद्र तट पर दो विलवणीकरण यानी डिसेलिनेशन संयंत्र काम कर रहे हैं और दोनों की क्षमता 100 एमएलडी है। ऐसे दो और संयंत्रों (150 एमएलडी और 400 एमएलडी क्षमता वाले) पर काम चल रहा है, जो अगले तीन वर्षों में 550 एमएलडी समुद्री पानी का डिसेलिनेशन करने में सक्षम होंगे।

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इन संयंत्रों में दो तरह की तकनीकों का प्रयोग होता है- पारंपरिक वैक्यूम डिस्टिलेशन और रिवर्स आस्मोसिस। चेन्नई के दोनों संयंत्र आरओ तकनीक पर काम कर रहे हैं। इस प्रकार के संयंत्रों से समुद्री पानी को स्वच्छ बनाने की प्रक्रिया में ऊर्जा की अधिक खपत होती है। वैक्यूम डिस्टिलेशन तकनीक में एक घनमीटर समुद्री जल को शुद्ध करने के लिए तीन किलोवाट ऊर्जा की खपत प्रति घंटे होती है तो आरओ तकनीक में यह खपत दो किलोवाट होती है। इन विधियों से खारे पानी को मीठे पानी में बदलने के लिए एक तो काफी मात्रा में ऊर्जा खर्च होती है। बावजूद इसके पानी में से नमक की मात्रा पूरी तरह निकल नहीं पाती। इस अतिरिक्त नमक को हटाने के लिए दोबारा वही प्रक्रिया दोहरानी पड़ती है। इस कारण समय और ऊर्जा दोनों ही अधिक खर्च होते हैं। आरओ पानी को शुद्ध करने वाली एक ऐसी तकनीक है, जिसमें दबाव डालकर पानी साफ किया जाता है।

इस तकनीक का इस्तेमाल उन इलाकों में किया जाता है जहां पानी में टीडीएस 500 मिग्रा प्रति लीटर से अधिक होता है, यानी पानी खारा होता है। नलकूप के पानी या समुद्र तटीय इलाकों में यह तकनीक उपयोगी है। आरओ के पानी में कोई भी अशुद्धि नहीं होती। बैक्टीरिया और विषाणु भी दूर हो जाते हैं क्लोरीन और आर्सेनिक जैसी अशुद्धियां भी दूर हो जाती हैं। इस प्रक्रिया में बिजली की खपत अधिक होती है। यह नल के पानी के सामान्य से अधिक दबाव में काम करता है। आरओ से बाहर निकलने वाले पानी के रूप में औसतन 30-40 फीसद पानी बर्बाद होता है। इस खर्च को कम करने के लिए राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिक संस्थान ने डिसेलिनेशन प्रक्रिया के लिए कम तापमान वाली थर्मल विलवणीकरण किया है। इस प्रक्रिया के तहत दो अलग-अलग जल स्रोतों के बीच तापमान के उतार-चढ़ाव से पहले गर्म पानी को कम दाब पर वाष्पीकृत किया जाता है, ताकि मीठा पानी प्राप्त किया जा सके।

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत देश में कुछ एलटीटीडी की स्थापना की है, जो कवारल्ली, मिलीकाय, अगत्ती, लक्षद्वीप में स्थापित हैं। इनकी प्रौद्योगिकी पूरी तरह से घरेलू और पर्यावरण के अनुकूल है। प्रत्येक एलटीटीडी संयंत्र की क्षमता प्रतिदिन एक लाख लीटर समुद्री जल शुद्ध करने की है। इस तकनीक के द्वारा खारे पानी से एक लीटर मीठा पानी बनाने में उन्नीस पैसे का खर्च आता है।

दक्षिण अमेरिका, आस्ट्रेलिया, इजराइल, सऊदी अरब, यूएई जैसे देश अपनी कुल पानी की मांग का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री जल का डिसेलिनेशन करके पूरा करते हैं। फिलहाल दुनिया भर में इसके लगभग पंद्रह हजार संयंत्र काम कर रहे हैं। सऊदी अरब की राजधानी रियाद में इसके लिए 320 किमी लंबी पाइपलाइन बिछाई गई है। भारत के अंडमान, गुजरात, तमिलनाडु, लक्षद्वीप और आंध्र प्रदेश में छोटे-बड़े लगभग 175 संयंत्र चल रहे हैं। भारत में पहला संयंत्र अंडमान में लगाया गया था। मगर इन उपलब्धियों के बावजूद यह सवाल अपनी जगह है कि आखिर हम अपने उपलब्ध जल-संसाधन को संरक्षित रखने और उसके संतुलित उपभोग के बारे में कब गंभीर होंगे।

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