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प्लास्टिक भक्षक जीवाणु का जन्म पर्यावरण के लिए संजीवनी

सैन डिएगो स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक हानसोल किम ने पालीयूरीथेन प्लास्टिक में एक बैक्टीरिया मिलाया है। यह बैक्टीरिया प्लास्टिक खा जाता है। नतीजतन, प्लास्टिक खुद ही खत्म हो जाता है।
Written by: प्रमोद भार्गव | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | May 23, 2024 09:32 IST
प्लास्टिक भक्षक जीवाणु का जन्म पर्यावरण के लिए संजीवनी
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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आज प्लस्टिक कचरा दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है। इस समस्या के निदान के अनेक उपाय तलाश गए हैं, लेकिन अभी तक संपूर्ण रूप से कोई उपाय कारगर नहीं हुआ है। इसी कड़ी में वैज्ञानिकों ने एक ऐसा प्लास्टिक विकसित किया है, जो स्वयं समाप्त हो जाएगा। इससे प्रदूषण कम होने की उम्मीद है। सैन डिएगो स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक हानसोल किम ने पालीयूरीथेन प्लास्टिक में एक बैक्टीरिया मिलाया है। यह बैक्टीरिया प्लास्टिक खा जाता है।

नतीजतन, प्लास्टिक खुद ही खत्म हो जाता है। इस प्लास्टिक की विशेष बात यह है कि इसमें मिलाया गया बैक्टीरिया तब तक निष्क्रिय रहता है, जब तक कि इसका उपयोग होता रहता है। जब यह कूड़ा-करकट में फेंक दिया जाता है, तब कूड़े में मौजूद तत्त्वों के संपर्क में आकर सक्रिय हो जाता और प्लास्टिक खाने लगता है।

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इस प्लास्टिक में मिलाए गए बैक्टीरिया का नाम है, ‘बैसिलस सबटिलिस’। यह बैक्टीरिया खाने में एक प्रोबायोटिक के रूप में इस्तेमाल होता है। मगर कुदरती रूप में यह प्लास्टिक में नहीं मिलाया जा सकता है। इसे जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से तैयार करना पड़ता है, ताकि वह प्लास्टिक बनाने के लिए जरूरी अधिकतम तापमान को सहन कर सके। यह नए तरह का प्लास्टिक अभी प्रयोगशाला में ही परखा जा रहा है।

मैनचेस्टर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के एक समूह ने 2021 में इस बैक्टीरिया को प्लास्टिक निर्माण प्रक्रिया का तापमान सहन करने लायक विकसित करने में सफलता पाई थी। इसके बावजूद अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि इसके बजाय प्लास्टिक का इस्तेमाल घटाने पर जोर देना चाहिए। एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक प्लास्टिक का उपयोग तीन गुना बढ़ जाने की उम्मीद है। इसलिए प्लास्टिक को पुनर्चक्रित करने पर भी जोर देने की जरूरत है।

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मानव जीवन शैली का अनिवार्य हिस्सा बन गया प्लास्टिक पर्यावरणीय संकट के साथ मनुष्य के जीवन के लिए भी बड़ा खतरा बनकर उभरा है। इनमें खासकर पेयजल और शीतल पेय के अलावा दैनिक उपयोग में लाई जाने वाली वे प्लास्टिक की थैलियां शामिल हैं, जिनके आसान विकल्प उपलब्ध हैं। इसके अलावा कान साफ करने की सलाई, भोजन करने की थाली, ग्लास, चाकू, कांटे और चम्मच, झंडे, गुब्बारे और आईसक्रीम की छड़ी और रैपर भी हैं। पर्यावरण ही नहीं, मनुष्य और पशुधन के जीवन के लिए भी प्लास्टिक बड़ा संकट बनकर उभरा है। नवीनतम शोधों से पता चला है कि प्लास्टिक प्रदूषण इंसानों और पशु-पक्षियों के लिए ही नहीं, सरीसृपों के लिए भी जानलेवा साबित हो रहा है।

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प्लास्टिक खानपान की चीजों के साथ पेट में पहुंच रहा है। अमेरिका के यार्क मेडिकल कालेज के शोध समूह ने यह हैरान करने वाला खुलासा किया है कि अब प्लास्टिक के कण मनुष्य के पेट में ही नहीं, फेफड़ों तक पहुंच गए हैं। सांस के जरिए माइक्रोप्लास्टिक के बारह प्रकार के कण फेफड़ों तक पहुंचे हैं। इससे पता चलता है कि हवा किस कदर प्रदूषित हो चुकी है।

इसके पहले वैज्ञानिक सांस के माध्यम से फेफड़ों तक प्लास्टिक कणों का पहुंचना असंभव मानते थे। उनका मानना था कि सांस नली इतनी पतली होती है कि नाक के जरिए केवल हवा-पानी ही शरीर में जा सकते हैं। हालांकि शवों के फेफड़ों में ये कण पहले ही मिल चुके हैं, लेकिन जीवित व्यक्तियों में प्लास्टिक कण होने का खुलासा ‘साइंस आफ द टोटल एनवायरमेंट’ (अप्रैल 2022) जर्नल में छपे शोध-पत्र से ही हुआ है। शोध-पत्र में बताया गया है कि जीवित लोगों के फेफड़ों में माइक्रोप्लास्टिक दर्शाने वाला यह पहला तथ्यात्मक अध्ययन है।

इस अध्ययन के लिए दर्जनों जीवित इंसानों के ऊतक यार्कशायर के कैसलहिल अस्पताल से लिए गए थे। फेफड़ों से मिले प्लास्टिक कण 5 मिलीमीटर तक के थे। अब वैज्ञानिक मानव के स्वास्थ्य पर इन कणों के पड़ने वाले असर की जांच कर रहे हैं। हम एक वर्ष में पचास हजार माइक्रोप्लास्टिक के कण खा जाते हैं। माइक्रोप्लास्टिक यानी प्लास्टिक के छोटे-छोटे टुकड़े।

इस समय पूरी दुनिया में ये अकेले ऐसे कण हैं, जो धरती, आकाश और पानी में, सब जगह मौजूद हैं। इनके अनेक रूप हैं। सिंथेटिक कपड़ों से निकले टुकड़े, कान साफ करने की सलाइयों के टुकड़े, कार के टायरों और रोजमर्रा काम आने वाली वस्तुओं से निकले टुकड़े। ‘पर्यावरण विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी’ पत्रिका में प्रकाशित शोध के मुताबिक, किसी इंसान के शरीर में प्लास्टिक के कितने कण जाएंगे, यह इस बात पर निर्भर है कि वह किस वातावरण में रहता है और क्या खाता है।

कनाडा के वैज्ञानिकों ने शोध के दौरान माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी के बारे में सैकड़ों आंकड़ों का विश्लेषण किया और इसकी तुलना अमेरिकी नागरिकों के खानपान की शैली से की। निष्कर्ष में पाया कि एक वयस्क इंसान एक वर्ष में माइक्रोप्लास्टिक के करीब बावन हजार कण ग्रहण कर लेता है। ये भोजन-पानी के अलावा सांस के जरिए भी शरीर में चले जाते हैं।

केवल सांस के जरिए 1.21 लाख माइक्रोप्लास्टिक के कण शरीर में जा सकते हैं। यानी हर दिन करीब 320 टुकड़े पेट में जाने-अनजाने पहुंच जाते हैं। प्लास्टिक के ये सूक्ष्म कण मनुष्य में पार्किंसन रोग का खतरा बढ़ा रहे हैं। मस्तिष्क में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले एक विशेष प्रोटीन के नैनोप्लास्टिक के संपर्क में आने पर ऐसा बदलाव संभव है, जो पार्किंसन और डिमेंशिया रोग के कारण बन जाते हैं।

एक अनुमान के मुताबिक प्रति वर्ष 31.1 करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन किया जाता है। यही वजह है कि समूचा ब्रह्मांड प्लास्टिक कचरे की चपेट में है। जब भी हम प्लास्टिक के खतरनाक पहलुओं के बारे में सोचते हैं, तो अपनी उन गायों की ओर जरूर देखते हैं, जो कचरे में मुंह मारकर पेट भरती हैं। पेट में पालीथिन जमा हो जाने के कारण मरने वाले पशुओं की मौत की खबरें भी आए दिन आती रहती हैं। यह समस्या भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की है। यह बात अलग है कि हमारे यहां ज्यादा और खुलेआम दिखाई देती है।

एक तो इसलिए कि स्वच्छता अभियान कई रूपों में चलाए जाने के बावजूद प्लास्टिक की थैलियों में भरा कचरा शहर, कस्बों और गांव की बस्तियों के नुक्कड़ों पर जमा मिल जाता है। यही बचा-खुचा कचरा नालियों से होता हुआ नदी, नालों, तालाबों से बहकर समुद्र में पहुंच जाता है। ‘एडवांसेज’ नामक शोध-पत्रिका में छपे अध्ययन में बताया है कि आर्कटिक समुद्र के बढ़ते जल में इस समय 100 से 1200 टन के बीच प्लास्टिक हो सकता है।

वैसे जेआर जाम बैक का दावा है कि समुद्र की तलहटी में 5 खरब प्लास्टिक के टुकड़े जमा हैं। यही वजह है कि समुद्री जल में ही नहीं मछलियों के उदर में भी ये टुकड़े पाए जाने लगे हैं। यही टुकड़े मांसाहार और पेयजल के जरिए मनुष्य के पेट में चले जाते हैं। गोया, प्लास्टिक से निजात पाने संबंधी उपाय जरूरी हैं।

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