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जल भंडारण के स्तर को बनाए रखने के लिए समुचित प्रयास करने की जरूरत

भारत में ही नहीं, भारत के बाहर भी लोग इस बात को शिद्दत से महससू करने लगे हैं कि अगर पानी के सदुपयोग की परंपरा विकसित नहीं की गई, तो आने वाले दिन बहुत कठिन होंगे।
Written by: जनसत्ता | Edited By: Bishwa Nath Jha
Updated: March 23, 2024 09:28 IST
जल भंडारण के स्तर को बनाए रखने के लिए समुचित प्रयास करने की जरूरत
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो -सोशल मीडिया)।
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अतुल कनक

इस वर्ष मार्च के दूसरे सप्ताह में ही बंगलुरु से जल संकट की डराने वाली खबरें आने लगीं। आमतौर पर प्रचंड गर्मी के दिनों में देश के कई हिस्से भीषण पेयजल संकट का सामना करते हैं। खासकर, ऐसे गांव और कस्बे, जिन तक विकास का उजाला अब भी पूरी तरह नहीं पहुंच सका है।

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मगर तकनीकी संस्थानों और अपनी सौंदर्यपूर्ण बसावट के लिए पहचाने जाने वाले बंगलुरु शहर में अगर गर्मी की आहट के ठीक पहले नागरिकों को जल की उपलब्धता के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, तो यह बताता है कि हम अगर अब भी जल प्रबंधन के प्रति सचेत और संवेदनशील नहीं हुए, तो सारी दुनिया के लिए आने वाला समय कितना कठिन हो सकता है।

बंगलुरु में स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी गई है। वाहनों को साफ करने और बागबानी में पेयजल के इस्तेमाल पर जुर्माने का प्रावधान किया गया है। आभिजात्य कही जाने वाली बस्तियों में भी जलापूर्ति के समय में कटौती कर दी गई है। लोग पानी का टैंकर मंगाकर काम चला रहे थे, लेकिन कुछ दिनों पहले तक छह सौ रुपए में उपलब्ध हो जाने वाला पानी का टैंकर अब डेढ़ हजार से लेकर दो हजार रुपए तक में मुश्किल से मिल रहा है।

खबर तो यह भी है कि प्रशासन ने टैंकर माफिया पर लगाम लगाने और बस्तियों में जलापूर्ति सुनिश्चित कराने के लिए टैंकरों को अधिग्रहित कर लिया है। इन टैंकरों के पास लंबी कतार देखी जा सकती है। जो लोग पानी के लिए महंगे टैंकर का खर्च वहन कर सकते हैं, वे तो फिलहाल आराम में हैं, लेकिन जेब के लिए महंगा पानी खरीदना एक विलासिता है।

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हालत यह है कि कई कंपनियों ने कर्मचारियों को ‘वर्क फ्राम होम’ यानी घर से काम करने की सुविधा देनी शुरू कर दी है, ताकि वे अपने कर्मचारियों के लिए जल की व्यवस्था करने की मशक्कत से बच सकें। बहुत सारे परिवार इस किल्लत के रहने तक शहर छोड़ कर जा चुके हैं या जाने की तैयारी में हैं। पानी जीवन की बुनियादी आवश्यकता है। आखिर एक सभ्य और संभ्रांत समाज के लोग पानी की सहज उपलब्धता के अभाव में सुखपूर्वक रहने की कल्पना कैसे कर सकते हैं?

बंगलुरु की इस समस्या का मूल कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में वहां भूजल का अनियंत्रित दोहन किया गया और बरसात के पानी के संरक्षण की दिशा में सार्थक प्रयास नहीं किए गए। हालांकि बंगलुरु को कावेरी का पानी भी उपलब्ध कराया जाता है, लेकिन अपने ही प्रांगण के जलाशयों की अनदेखी करके और जमीन में छिपे बेशकीमती पानी का अंधाधुंध दोहन करके कोई समाज कब तक सुखी रह सकता है।

लोग बताते हैं कि जिन बस्तियों में पहले 250 फुट नीचे पानी मिल जाता था, वहां अब 1800 फुट खुदाई करने पर भी कुछ हासिल नहीं होता। सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध में देश के अधिकांश हिस्सों में नागरिकों को जल उपलब्ध कराने के लिए नलकूप खुदवाए गए। मगर इस सुविधा के उत्साह में इस बात को बिल्कुल अनदेखा कर दिया गया कि धरती में जल भंडारण के स्तर को बनाए रखने के लिए समुचित प्रयास किए जाएं।

पुराने समय में अधिकांश बस्तियों में पानी के प्रवाह वाले रास्ते पर तालाब, कुएं, झील, कुंड या बावड़ियों का निर्माण कराया जाता था। ये जलीय संरचनाएं बरसात के पानी को अपने अस्तित्व में थाम लेती थीं। इससे न केवल इनके आसपास रहने वाले लोगों को अपनी जरूरत भर का पानी मिलता था, बल्कि इनमें संग्रहित जल भूगर्भीय जल स्तर को बनाए रखने में भी मदद करता था।

लेकिन पिछले कुछ दशकों में विकास की ऐसी अंधी होड़ मची कि न केवल बड़े शहरों, बल्कि छोटे कस्बों में भी प्राचीन कुंडों, बावड़ियों, कुओं और तालाबों को पाटकर उन पर निर्माण कर दिए गए। हमने बरसात के पानी को बचाने के प्रयास नहीं किए। प्रकृति के वरदान को अनदेखा किया।

यह स्थिति केवल बंगलुरु की नहीं है। समुचित नगर नियोजन और जल संरक्षण के प्रति संवेदशीलता के अभाव में हर विकसित होते शहर को आज या कल ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ सकता है। कुछ समय पहले शिमला और चेन्नई जैसे शहरों ने भीषण जल संकट का सामना किया है।

शिमला में तो स्थानीय नागरिकों को पर्यटकों से भी गुहार लगानी पड़ी थी कि कुछ समय के लिए वे शिमला आने का कार्यक्रम रद्द करें, क्योंकि पर्यटकों को दी जाने वाली सुविधाओं में होटल बहुत पानी खर्च करते हैं और इसका असर आम आदमी को उपलब्ध होने वाले जल की मात्रा पर पड़ता है।

भारत में ही नहीं, भारत के बाहर भी लोग इस बात को शिद्दत से महससू करने लगे हैं कि अगर पानी के सदुपयोग की परंपरा विकसित नहीं की गई, तो आने वाले दिन बहुत कठिन होंगे। बहुत पुरानी बात नहीं है, जब केपटाउन जैसे शहर में प्रशासन को पानी की ‘राशनिंग’ करनी पड़ी थी। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार सन 2030 तक भारत के कई शहरों को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। इन शहरों की सूची में जयपुर, दिल्ली, गांधीनगर, गुरुग्राम, इंदौर, अमृतसर, लुधियाना, हैदराबाद, बंगलुरु, चेन्नई और गाजियाबाद का नाम भी शामिल है।

रहीम ने कहा था, ‘बिन पानी सब सून’। अगर पानी न हुआ तो सब कुछ शून्य हो जाएगा। पानी जीवन की जरूरत है। इसीलिए भारतीय वांग्मय में पानी को बहुत पवित्र माना गया है। जो भी वस्तु पवित्र होती है, उसका अपव्यय नहीं किया जाता। दुर्भाग्य से पानी के संबंध में हम इस चेतना का संरक्षण नहीं कर सके। प्राचीनकाल में व्यक्ति के जीवन की शुरुआत जलस्रोतों के आराधन से होती है।

हर शुभ अनुष्ठान में जल की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी। लेकिन जबसे पानी नलों के जरिए घरों तक पहुंचने लगा, यानी लोगों को जल के लिए विशेष श्रम या प्रयास की आवश्यकता नहीं रही, तबसे लोगों ने पानी को बहुत ‘सस्ता’ मान लिया। पृथ्वी के दो तिहाई भाग पर पानी है, लेकिन उसमें से दो फीसद हिस्सा ही पीने योग्य है।

दुविधा यह भी है कि पानी का रासायनिक फार्मूला मालूम होने के बाद भी हम आक्सीजन और हाइड्रोजन को मिलाकर सहजता से जल की एक बूंद तैयार नहीं कर सकते। स्वच्छ जल के लिए जीवन आज भी प्रकृति पर निर्भर है। इसलिए आवश्यक है कि हम पानी की महत्ता के प्रति संवेदनशील रहें।

बरसात के जल को संरक्षित करने के प्रति सजग रहें, ताकि भूजल के स्तर को बचाया जा सके। इसके साथ ही दुनिया को पृथ्वी पर उपलब्ध शुद्ध जल के सदुपयोग के प्रति भी प्रतिबद्ध रहना होगा, वरना दुनिया में कहीं भी और कभी भी ऐसे संकट सिर उठा सकते हैं, जैसे संकट का सामना इन दिनों बंगलुरु की आम जनता को करना पड़ रहा है।

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