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बेटी की मौत के बाद भी बच्चों में मिठाई बांट रहे थे ज़ाकिर हुसैन, बाद में रोते हुए बिताई कई रातें, भावुक करने वाली है पूरी कहानी

जाकिर हुसैन खान का जन्म 8 फरवरी, 1897 को भारत के हैदराबाद में हुआ था। वह एक अर्थशास्त्री, शिक्षाविद और राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने 13 मई, 1967 से 3 मई, 1969 को अपनी मृत्यु तक भारत के तीसरे राष्ट्रपति के रूप में काम किया।
Written by: स्पेशल डेस्क | Edited By: Ankit Raj
नई दिल्ली | Updated: February 08, 2024 15:54 IST
बेटी की मौत के बाद भी बच्चों में मिठाई बांट रहे थे ज़ाकिर हुसैन  बाद में रोते हुए बिताई कई रातें  भावुक करने वाली है पूरी कहानी
राष्ट्रपति के रूप में ज़ाकिर हुसैन का कार्यकाल 13 मई 1967 से 3 मई 1969 तक था (Express Archive)
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गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षाविद डॉ. ज़ाकिर हुसैन भारत के तीसरे राष्ट्रपति थे। उन्होंने जर्मनी के बर्लिन विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पीएचडी की थी। लेकिन बच्चों के प्रति उनके प्यार ने उनके करियर की गाड़ी को अर्थशास्त्र से अध्ययन-अध्यापन की ओर मोड़ दिया।

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बच्चों की भलाई और खुशी में उनकी अटूट रुचि का उदाहरण ज़ाकिर हुसैन के जीवनी लेखक राजमोहन गांधी NCERT के 'Zakir Husain Second Memorial Lecture - 2009' में देते हैं, जिसका संपादन पद्मिनी स्वामीनाथन ने किया है।

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बेटी के निधन की सूचना मिलने के बाद भी बच्चों में बांटते रहे मिठाई

यह साल  1933 की बात है। तब जाकिर हुसैन ‘जामिया मिल्लिया इस्लामिया’ के वाइस चांसलर हुआ करते थे। राजमोहन गांधी बताते हैं, एक दिन जब ज़ाकिर हुसैन प्राइमरी स्कूल में परीक्षा पास करने वाले लड़कों को मिठाइयां बांट रहे थे, तभी एक चपरासी ने आकर उनके कान में फुसफुसाया कि उनकी तीन साल की बेटी रेहाना बहुत बीमार है। ज़ाकिर हुसैन मिठाइयां देते रहे।

थोड़ी देर बाद चपरासी फिर आया और उसके कान में बताया कि रेहाना का निधन हो गया। ज़ाकिर हुसैन पीला पड़ गया लेकिन वह जो किया उसे करना बंद नहीं किया। यानी मिठाई बांटते रहे। तभी कैम्पस की घंटी बजाई गई और सभी को पता चला कि डॉ. ज़ाकिर हुसैन की लड़की की मृत्यु हो गई है।

बाद में जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने तुरंत स्कूल क्यों नहीं छोड़ा, तो ज़ाकिर हुसैन ने जवाब दिया कि बच्चे बहुत खुशी महसूस कर रहे थे, उन्हें इसमें बाधा डालना पसंद नहीं आया। बाद में उनकी पत्नी ने मोहम्मद मुजीब (ज़ाकिर हुसैन के दोस्त) को बताया कि उस घटना के बाद कई दिनों तक ज़ाकिर हुसैन का तकिया हर सुबह गीला रहता था।

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स्कूली शिक्षा के लिए तैयार किया सिलेबस

साल 1937 में स्कूलों के लिए गांधीवादी पाठ्यक्रम बनाने के लिए एक राष्ट्रीय आयोग बनाई गई थी। हात्मा गांधी के निमन्त्रण डॉ. ज़ाकिर हुसैन ने प्राथमिक शिक्षा के बने उस राष्ट्रीय आयोग की अध्यक्षता की थी। उन्होंने पाठ्यक्रम को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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डॉ. ज़ाकिर हुसैन ने 1930 के दशक के मध्य तक देश के कई शैक्षिक सुधार आंदोलन में एक सक्रिय भूमिका निभाई थी। कई अन्य राष्ट्रवादियों की तरह ज़ाकिर हुसैन केवल एक महान बुद्धिजीवी नहीं थे, बल्कि एक अथक संस्था-निर्माता थे। उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की गौरवपूर्ण अध्यक्षता की।

इन संस्थानों के कुलपति के रूप में उन्होंने कई वर्षों तक धन-संग्रहकर्ता, लेखाकार, सचिव, संपादक और शिक्षक के रूप में कार्य किया। विश्वविद्यालयों में भी उन्होंने 'करके सीखने' के सिद्धांत को लागू करने का प्रयास किया। उनके अंदर का सच्चा शिक्षाविद स्कूली शिक्षा और विश्वविद्यालयों के बीच अंतर नहीं होने देता था। ज़ाकिर हुसैन ने हमेशा शिक्षा को समग्रता के रूप में देखा।

जर्मन यहूदी महिला को बनाया जामिया की  ‘खातून ए अव्वल’

औपनिवेशिक काल में राष्ट्रीय आंदोलन से निकले  ‘जामिया मिल्लिया इस्लामिया’ की स्थापना में ज़ाकिर हुसैन की महत्वपूर्ण भूमिका थी। जर्मनी में पढ़ाई के दौरान ज़ाकिर हुसैन की मुलाकात  एक यहूदी लड़की गेर्डा फिलिप्सबोर्न से हुई थी। गेर्डा फिलिप्सबोर्न का बच्चों की सेवा और शिक्षा में खूब मन लगता था।

बर्लिन में एक भारतीय दंपती के घर ज़ाकिर हुसैन और मोहम्मद मुजीब की दोस्ती गेर्डा फिलिप्सबोर्न से हुई थी। ज़ाकिर हुसैन और मोहम्मद मुजीब अक्सर इस बात की चर्चा करते कि वह भारत लौटकर क्या-क्या करेंगे। उस बातचीत में शिक्षा के क्षेत्र में काम करने की योजना भी शामिल होती थी। ये सब सुनकर गेर्डा फिलिप्सबोर्न की भी इच्छा होती थी कि वह भारत जाकर काम करें। वह महात्मा गांधी से पहले ही प्रभावित थीं।

भारत आने के बाद ज़ाकिर हुसैन साल 1932 में ज़ामिया के वाइस चांसलर बन गए। उधर जर्मनी में एडॉल्फ हिटलर का उभार हो रहा था। यहूदियों पर अत्याचार बढ़ रहा था। हिटलर के चांसलर बनने से कुछ महीने गेर्डा फिलिप्सबोर्न जर्मनी से भागकर भारत आ गईं। उन्होंने बॉम्बे पहुंचकर जाकिर हुसैन से संपर्क किया। डॉ. हुसैन ने उन्हें दिल्ली लाए और वह 1 जनवरी, 1933 को जामिया में शामिल हुईं। इसके बाद वह अपने जीवन के अंतिम दिन, 14 अप्रैल, 1943 तक संस्थान की सेवा करती रहीं।

इस बीच बहुत कुछ ऐसा हुआ, जो बेहद दिलचस्प था- गेर्डा फिलिप्सबोर्न का जेल जाना, उनका कैंसर से जूझना, बच्चों के लिए पैसा और खिलौने जुटाना, बीमार बच्चों का इलाज करते-करते खुद बीमार हो जाना, मरते दम तक बच्चों की चिंता करना, आदि।

जामिया के लिए उनके समर्पण ने उन्हें जामिया की आपा बना दिया। इसके अलावा जामिया ने उन्हें ‘खातून ए अव्वल’ यानी ‘जामिया की प्रथम महिला’ की भी उपाधि दी। आज जामिया में गेर्डा फिलिप्सबोर्न के नाम पर एक डे केयर सेंटर और एक हॉस्टल है। विस्तार से पढ़ने के लिए फोटो पर क्लिक करें:

Jamia ki aapa
जामिया की आपा

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