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जेलों में 'जाति‍वाद' पर सुनवाई कर रहे थे सीजेआई, यूपी सरकार का जवाब पढ़ने लगे तो...

द वायर की पत्रकार सुकन्या शांता की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि कई राज्यों की जेलों में जाति के आधार पर भेदभाव किया जा रहा है।
Written by: स्पेशल डेस्क
नई दिल्ली | Updated: July 10, 2024 18:41 IST
जेलों में  जाति‍वाद  पर सुनवाई कर रहे थे सीजेआई  यूपी सरकार का जवाब पढ़ने लगे तो
सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़।
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सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को जेलों में भेदभाव के मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ को आखिर यह क्यों कहना पड़ा कि…मैं इस हिस्से को नहीं पढ़ूंगा। सीजेआई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच एक पत्रकार के द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में कहा गया था कि कई राज्यों की जेलों में जाति के आधार पर भेदभाव किया जा रहा है।

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मामले में याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुई वकील दिशा वाडेकर ने अदालत से कहा कि हम अदालत के सामने अपनी तीन बातें रख रहे हैं। पहली यह कि जेल मैनुअल में भेदभाव करने वाले प्रावधान हैं, काम का जाति के आधार पर बंटवारा किया गया है और अधिसूचित जनजातियों के खिलाफ भेदभाव करने वाले प्रावधान हैं।

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वाडेकर ने कहा कि जेल के मैनुअल में अपर्याप्त प्रावधान हैं…दूसरा पहलू भेदभावपूर्ण तौर-तरीकों का है और हमने जेल में बंद लोगों के मामले में इसके सबूत भी दिए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील एस. मुरलीधर ने कहा कि केंद्र सरकार ने फरवरी, 2024 में राज्यों को सलाह दी थी लेकिन इसमें सब कुछ शामिल नहीं है।

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सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़। (Source-PTI)

जेलों में नहीं है कोई भेदभाव: यूपी

सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए वकील ने अदालत से अनुरोध किया कि अदालत उनका जवाब देखे। राज्य की जेलों में जाति के आधार पर किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं है और काम का बंटवारा किसी भी कैदी की फिजिकल और मेंटल फिटनेस के आधार पर किया गया है।

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सीजेआई ने उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दिए गए जवाब को पढ़ते हुए कहा, …मेहतर वर्ग से आपका क्या मतलब है? क्या आपका कहने का यह मतलब है कि वे ऐसा करने के आदी हो चुके हैं।

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सीजेआई ने कहा,

...जेल में जो कोई भी कैदी है..., मैं इस हिस्से को नहीं पढ़ूंगा। सीजेआई ने कहा कि हम इस मामले में जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण की भूमिका तय करेंगे और वे लगातार अदालतों का दौरा करेंगे।

क्या है यह पूरा मामला?

वेब पोर्टल द वायर ने भारत की जेलों में जाति आधारित अलगाव और श्रम कानूनों को लेकर एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट छापी थी। इसके बाद इस मामले में द वायर की रिपोर्टर सुकन्या शांता की ओर से अदालत में जनहित याचिका दायर की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस साल जनवरी में इस मामले में सुनवाई की थी और 11 राज्यों, केंद्रीय गृह मंत्रालय और वेल्लोर में स्थित जेल और सुधार प्रशासन अकादमी को भी नोटिस जारी कर चार हफ्ते में उनका जवाब मांगा था।

Justice BR Gavai। Justice K.V. Viswanathan
जस्टिस बीआर गवई. और
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन। (Source-https://www.sci.gov.in/)

द वायर ने पांच हिस्सों में की गई अपनी रिपोर्ट में बताया था कि भारत में हर साल 5 लाख लोगों को जेल में डाल दिया जाता है और सही मायने में जो लोग पीड़ित हैं जैसे- लोअर कास्ट, आदिवासी, महिलाएं बच्चे और ट्रांसजेंडर के साथ यह व्यवस्था मुश्किल से ही न्याय करती है।

रिपोर्ट में कहा गया था कि बहुत सारे लोगों को छोटे-छोटे अपराधों के लिए जेल में डाल दिया जाता है और चूंकि उनका पक्ष मजबूत नहीं होता है तो वे लंबे समय तक जेलों में पड़े रहने के लिए मजबूर हो जाते हैं और समाज में कभी भी इस बात पर चर्चा नहीं होती।

द वायर ने अपनी रिपोर्ट में जेलों के भीतर के हालात, चिकित्सा सुविधा और कानूनी सपोर्ट की कमी को बताया था।

गृह मंत्रालय ने दिया था निर्देश

इस साल फरवरी में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के जेल प्रशासन से कहा था कि वे अपने जेल के नियमों में इस बात को सुनिश्चित करें कि किसी भी तरह के भेदभावपूर्ण प्रावधान न हों जिससे कैदियों को उनके जाति और धर्म के आधार पर बांटा जाए।

गृह मंत्रालय ने कहा था कि जेल मैन्युअल के इस तरह के मामले उसके संज्ञान में आए हैं और यह भारत के संविधान के पूरी तरह खिलाफ हैं।

बाल विवाह के मामले में सुनवाई

अदालत में बुधवार को ही बाल विवाह के मामले में भी सुनवाई हुई। इस मामले में एक एनजीओ की ओर से अदालत में याचिका दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस मामले में जागरूकता फैलाने के लिए जितने भी कार्यक्रम या भाषण होते हैं, उनसे जमीनी स्तर पर कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं होता। सुनवाई के दौरान जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि एफआईआर दर्ज करना एक पहलू है लेकिन सामाजिक स्तर पर क्या किया जा सकता है?

सीजेआई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया। अदालत ने याचिकाकर्ता- एनजीओ और यूनियन के वकीलों से कुछ ऐसे ठोस सुझाव देने को कहा, जिन्हें सरकारों के सामने रखा जा सके।

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