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Somnath Chatterjee: पार्टी की कृपा ब‍िना नहीं रह सकते लोकसभा स्‍पीकर, बीच कार्यकाल में सीपीएम ने सोमनाथ चटर्जी से मांग ल‍िया था इस्‍तीफा

संसदीय लोकतंत्र में अध्यक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वे सदन के मुखिया होते हैं और सदन की गरिमा और शक्ति का प्रतीक हैं।
Written by: Pawan Upreti
Updated: June 26, 2024 14:28 IST
पूर्व लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी। (Source-PTI)
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राजस्‍थान के कोटा से भाजपा सांसद ओम ब‍िरला 26 जून, 2024 को अठारहवीं लोकसभा के अध्‍यक्ष न‍िर्वाच‍ित हो गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्‍हें बधाई देते हुए कहा क‍ि बलराम जाखड़ के बाद आप पहले लोकसभा अध्‍यक्ष हैं जो पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद लगातार दूसरी बार स्‍पीकर का पद सुशोभ‍ित कर रहे हैं।

सपा अध्‍यक्ष और कन्‍नौज से चुन कर लोकसभा पहुंचे अख‍िलेश यादव ने ब‍िरला को बधाई देते हुए उनसे न‍िष्‍पक्षता की उम्‍मीद करते हुए कहा- हम सब यही मानते हैं क‍ि आप हर सांसद और हर दल को बराबरी का मौका और सम्‍मान देंगे।

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कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी ने भी यही कहा क‍ि उम्‍मीद है क‍ि आप व‍िपक्ष की आवाज को सदन में दबने नहीं देंगे।

असल में लोकसभा में अध्‍यक्ष की न‍िष्‍पक्षता ही संव‍िधान की सुरक्षा की गारंटी होती है और स्‍पीकर का न‍िष्‍पक्ष होने के साथ-साथ द‍िखना भी जरूरी है। इस ल‍िहाज से संव‍िधान में लोकसभा स्‍पीकर को काफी अध‍िकार द‍िए गए हैं, ताक‍ि उन्‍हें न‍िष्‍पक्ष होकर कार्यवाही चलाने में सुव‍िधा हो। लेक‍िन, उनके पद पर बने रहने की गारंटी उनकी पार्टी की कृपा या मर्जी से जुड़ी है। क्‍या यह बात लोकसभा अध्‍यक्ष की न‍िष्‍पक्षता पर असर डालती है? यह सवाल काफी पुराना है।

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1952 में जब लोकसभा के पहले स्पीकर, जी वी मावलंकर अपना पद संभालने के मौके पर वक्‍तव्‍य दे रहे थे तभी उन्‍होंने ब्र‍िट‍िश परंपरा का हवाला देते हुए कहा था क‍ि स्पीकर से यह उम्मीद करना कि वह पूरी तरह से राजनीति से अलग रहें, बिना इसी तरह की परंपरा के, शायद विरोधाभासी उम्‍मीद रखने के बराबर होगा।

ब्र‍िटेन में ऐसी परंपरा है क‍ि सांसद के एक बार स्पीकर बनने के बाद जब तक वह स्पीकर बने रहना चाहते हैं, तब तक किसी भी पार्टी द्वारा उनके चुनाव का विरोध नहीं किया जाता है। न निर्वाचन क्षेत्र में और न ही सदन में।

24 जून को शपथ के ल‍िए सदन के अंदर जाने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए संसद भवन पर‍िसर में करीब 15 म‍िनट लंबा वक्‍तव्‍य द‍िया। (फोटो सोर्स: पीटीआई)

इस्तीफा न देने पर किया निष्कासित

सोमनाथ चटर्जी का उदाहरण हमारे सामने है। वह जब लोकसभा अध्‍यक्ष हुआ करते थे तो कार्यकाल खत्‍म होने से पहले उनकी पार्टी (माकपा) ने उनसे इस्‍तीफा देने के ल‍िए कह द‍िया। उन्‍होंने इस्‍तीफा नहीं द‍िया तो पार्टी ने उन्‍हें निष्कासित कर द‍िया था।

जब मनमोहन सिंह की सरकार ने न्यूक्लियर डील पर आगे बढ़ने का फैसला किया तो सीपीएम के नेतृत्व के मजबूत धड़े ने सरकार से समर्थन वापस लेने का फैसला कर लिया। इस फैसले के पीछे उनका यह कहना था कि सीपीएम के समर्थन वापस लेने से मनमोहन सिंह सरकार अल्पमत में आ जाएगी और इस्तीफा देने के लिए मजबूर हो जाएगी और इस वजह से वह अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील करने से पीछे हट जाएगी।

संसद की परंपरा के मुताबिक, इसके बाद 22 जुलाई, 2008 को विश्वास प्रस्ताव पर मतदान हुआ और तमाम तरह की अनिश्चितताओं के बीच सरकार नहीं गिरी क्योंकि समाजवादी पार्टी ने मनमोहन सिंह की सरकार को समर्थन दे दिया था।

इस तरह सरकार को गिराने की सीपीएम की कोशिश धरी की धरी रह गई। सीपीएम ने विश्वास प्रस्ताव के दौरान बीजेपी के साथ मिलकर सरकार के खिलाफ वोट दिया था।

18वीं लोकसभा में कामकाज हुआ शुरू। (Source-PTI)

उस समय लोकसभा के अध्यक्ष रहे सोमनाथ चटर्जी ने बाद में कीपिंग द फेथ, मेमॉयर्स ऑफ़ ए पार्लियामेंटेरियन नाम से ल‍िखी क‍िताब में इस वाकये का ज‍िक्र करते हुए ल‍िखा क‍ि इस वजह से उनके सीपीएम के साथ रिश्ते खराब हो गए थे।

चटर्जी लिखते हैं कि 20 जुलाई, 2008 को पार्टी ने उन्हें इस बात का निर्देश दिया कि वे स्पीकर के पद से इस्तीफा दे दें और विश्वास प्रस्ताव के खिलाफ वोटिंग करें। हालांकि जब विश्वास प्रस्ताव का नतीजा आया तो पता चला कि अगर मैं विश्वास प्रस्ताव के खिलाफ भी वोट देता तो भी इसका कोई फर्क नहीं पड़ता।

जब मैंने पार्टी के इस आदेश को मानने से मना कर दिया और यह तर्क दिया कि स्पीकर होने के नाते मैं पार्टी का निर्देश मानने के लिए बाध्य नहीं हूं और मुझसे यह उम्मीद की जाती है कि मैं तटस्थ रहूं। लेकिन उस वक्त सीपीएम के महासचिव रहे प्रकाश करात इस बात से नाराज हो गए और उन्होंने मुझे 23 जुलाई, 2008 को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

चटर्जी लिखते हैं कि मैंने इसके जवाब में पार्टी को बताया कि अगर मुझे बाहर का रास्ता दिखाने से पार्टी मजबूत होती है तो तो यह मेरे लिए सांत्वना की बात होगी। लेकिन 23 जुलाई, 2008 का दिन मेरे माता-पिता के निधन के बाद मेरे लिए सबसे दुखद दिन था।

एनडीए की बैठक में एन चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार के साथ नरेंद्र मोदी। (फोटो: पीटीआई)

क्‍या है अध्यक्ष को हटाने का तरीका?

भारत में, लोकसभा के अध्यक्ष का कार्यकाल उस सदन के भंग होने तक होता है जिसमें उनका चुनाव हुआ था। इसका मतलब है कि अध्यक्ष का कार्यकाल 5 साल का होता है, जब तक कि लोकसभा को भंग नहीं कर दिया जाता है।

अध्यक्ष को दोबारा चुना जा सकता है, और यदि लोकसभा भंग हो जाती है, तो अध्यक्ष अपना पद तब तक बनाए रखते हैं जब तक कि नई लोकसभा का चुनाव नहीं हो जाता है और नए अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो जाता है।

अध्यक्ष को पद से हटाने के दो तरीके हैं:

  1. त्यागपत्र: अध्यक्ष किसी भी समय उपाध्यक्ष को लिखित पत्र देकर अपना पद त्याग सकते हैं।
  2. अविश्वास प्रस्ताव: लोकसभा अध्यक्ष को उनके पद से हटाने के लिए, सदन में एक अविश्वास प्रस्ताव लाया जाना चाहिए और इसे पारित किया जाना चाहिए।

यह प्रस्ताव कम से कम 14 दिन पहले नोटिस देकर पेश किया जाना चाहिए और इसमें लगाए गए आरोप स्पष्ट और तथ्यात्मक होने चाहिए। चर्चा केवल प्रस्ताव में लगाए गए आरोपों तक ही सीमित होनी चाहिए, और इसमें कोई अपमानजनक या भड़काऊ भाषा नहीं होनी चाहिए।

अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर अध्यक्ष को अपने पद से हटा दिया जाता है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अध्यक्ष को पद से हटाना आसान नहीं है। अविश्वास प्रस्ताव पारित होने के लिए, सदन में उपस्थित सदस्यों के बहुमत द्वारा इसे पारित किया जाना चाहिए। यह सुनिश्चित करने के लिए कि अध्यक्ष निष्पक्ष और निष्पक्ष रूप से कार्य करते हैं, और वे सदन के सभी सदस्यों के प्रति जवाबदेह होते हैं, यह महत्वपूर्ण प्रावधान है।

बीजेपी में नहीं थम रही रार। (Source-PTI)

लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव कैसे होता है?

भारत की संसद के निचले सदन, लोक सभा में, अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव सदस्यों द्वारा किया जाता है। यह चुनाव उन सदस्यों द्वारा होता है जो सदन में उपस्थित हैं और मतदान करते हैं। साधारण बहुमत से विजेता का निर्धारण होता है।

हालांकि अध्यक्ष के लिए कोई विशेष योग्यता निर्धारित नहीं की गई है, सिवाय लोक सभा का सदस्य होने के, फिर भी अध्यक्ष पद के लिए कुछ गुण महत्वपूर्ण माने जाते हैं। अध्यक्ष को संविधान, देश के कानून, संसदीय प्रक्रियाओं और संसद की परंपराओं की गहरी समझ होनी चाहिए।

नई लोक सभा के गठन के बाद सबसे पहले अध्यक्ष का चुनाव किया जाता है। आम तौर पर सत्ताधारी दल के सदस्य को ही अध्यक्ष चुना जाता है। ऐसे भी उदाहरण हैं जब सत्ताधारी दल या गठबंधन से अलग कोई सदस्य अध्यक्ष चुना गया है।

एक बार जब अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवार तय हो जाता है, तो आम तौर पर प्रधानमंत्री और संसदीय कार्य मंत्री उनके नाम का प्रस्ताव करते हैं। यदि एक से अधिक प्रस्ताव आते हैं तो उनको क्रमवार रखा जाता है।

सभी प्रस्तावों को, जो स्वीकृत होते हैं, एक-एक करके, उनके प्रस्तावित क्रम में रखा जाता है। जरूरत पड़ने पर, मत विभाजन द्वारा फैसला किया जाता है।

एक बार कोई प्रस्ताव पारित हो जाने के बाद, पीठासीन अधिकारी अन्य प्रस्तावों को रखे बिना ही घोषणा करते हैं कि स्वीकृत प्रस्ताव में नामित सदस्य को सभा का अध्यक्ष चुना गया है।

परिणाम घोषित होने के बाद, प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता नए अध्यक्ष को अध्यक्ष आसन तक ले जाते हैं। फिर सभी राजनीतिक दलों और समूहों के नेता अध्यक्ष को बधाई देते हैं। अध्यक्ष उनका धन्यवाद करते हैं और फिर अपना कार्यभार संभालते हैं।

रांची में ब‍िरसा मुंडा का सम्‍मान करते श‍िवराज स‍िंंह चौहान का फाइल फोटो (फोटो सोर्स: https://x.com/ChouhanShivraj)

अध्यक्ष के मुख्य दायित्व क्‍या होते हैं?

संसदीय लोकतंत्र में अध्यक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वे सदन के मुखिया होते हैं और सदन की गरिमा और शक्ति का प्रतीक हैं। अध्यक्ष को सदन के सभी सदस्यों का प्रतिनिधित्व करने और सदन के कार्यों का सुचारू रूप से संचालन करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है।

सदन की बैठकों की अध्यक्षता करना: अध्यक्ष सदन की सभी बैठकों की अध्यक्षता करते हैं और सदन की कार्यवाही का संचालन करते हैं। वे सदस्यों को बोलने का अवसर देते हैं, बहस को नियंत्रित करते हैं और सदन के नियमों और प्रक्रियाओं को लागू करते हैं।

सदन के सदस्यों के बीच विवादों को सुलझाना: यदि सदस्यों के बीच कोई विवाद होता है, तो अध्यक्ष उसका समाधान करने का प्रयास करते हैं।

वे सदस्यों को सदन के नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और सदन में शांति और व्यवस्था बनाए रखते हैं।

सदन के कामकाज की देखरेख करना: अध्यक्ष सदन के सचिवालय का पर्यवेक्षण करते हैं और सदन के कामकाज को कुशलतापूर्वक चलाने के लिए आवश्यक कदम उठाते हैं। वे सदन की समितियों के कामकाज की भी देखरेख करते हैं।

संसदीय लोकतंत्र की परंपराओं की रक्षा करना: अध्यक्ष संसदीय लोकतंत्र की परंपराओं के संरक्षक होते हैं। वे सदन के सदस्यों को सदन के नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करने और सदन की गरिमा और सम्मान को बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

अध्यक्ष के पास हैं कई शक्तियां

सदस्यों को दंडित करने की शक्ति: यदि कोई सदस्य सदन के नियमों या प्रक्रियाओं का उल्लंघन करता है, तो अध्यक्ष उसे दंडित कर सकते हैं। वे सदस्य को सदन से बाहर निकाल सकते हैं या उसे निलंबित भी कर सकते हैं।

विधेयकों पर आपत्ति जताने की शक्ति: यदि अध्यक्ष को लगता है कि कोई विधेय संविधान के विपरीत है या सदन के नियमों का उल्लंघन करता है, तो वे उस पर आपत्ति जता सकते हैं।

सदन को भंग करने की शक्ति: यदि अध्यक्ष को लगता है कि सदन कार्य करने में असमर्थ है, तो वे सदन को भंग करने की सिफारिश कर सकते हैं।

अध्यक्ष का पद एक उच्च सम्मानित पद होता है और इसके लिए एक अनुभवी और योग्य व्यक्ति का चुनाव किया जाता है। अध्यक्ष को निष्पक्ष और न्यायप्रिय होना चाहिए और सदन के सभी सदस्यों का विश्वास प्राप्त करना चाहिए।

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