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Republic Day: राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति नहीं बनने देना चाहते थे पं. नेहरू, पीएम पद छोड़ने तक की दी थी धमकी

India's 75th Republic Day 2024: नेहरू ने राजाजी को राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव पेश किया था, जिसका पार्टी के अधिकांश नेताओं ने विरोध किया था। नेहरू के प्रस्ताव का जिस तरह विरोध हुआ था, उससे वह टूट गए थे।
Written by: स्पेशल डेस्क
नई दिल्ली | Updated: January 27, 2024 09:05 IST
republic day  राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति नहीं बनने देना चाहते थे पं  नेहरू  पीएम पद छोड़ने तक की दी थी धमकी
बाएं से- डॉ. राजेंद्र प्रसाद और जवाहरलाल नेहरू (Express Archive)
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26 जनवरी, 1950 को भारत ने संविधान को स्वीकार कर खुद को गणतांत्रिक देश घोषित किया था। इसी तारीख से भारत के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के कार्यकाल की शुरुआत हुई थी। लेक‍िन, उनके राष्‍ट्रपत‍ि बनने के पीछे की कहानी भी 'राजनीत‍ि' से भरी है। पंड‍ित जवाहर लाल नेहरू क‍िसी सूरत में राजेंद्र बाबू को राष्‍ट्रपत‍ि नहीं बनने देना चाहते थे। बहुमत उनके पक्ष में होने के बावजूद नहीं। वह 'अपने उम्‍मीदवार' को देश का पहला राष्‍ट्रपत‍ि बनवाना चाहते थे। इसके ल‍िए उन्‍होंने तमाम कवायदें कीं। यहां तक क‍ि राजेंद्र प्रसाद से ल‍िख‍ित ले ल‍िया क‍ि वह राष्‍ट्रपत‍ि नहीं बनना चाहते हैं।

संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के काम और निष्ठावान कांग्रेसी होने के उनके रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए सरदार वल्लभभाई पटेल समेत कांग्रेस के अधिकांश नेता उन्हें राष्ट्रपति के पद पर देखना चाहते थे। लेकिन नेहरू की पसंद कोई और था।

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भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू राजाजी (सी. राजगोपालाचारी) को राष्ट्रपति बनाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने अपनी लगभग पूरी ताकत भी लगा दी थी। यह तो सभी जानते हैं, लेकिन देश के प्रथम राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान कांग्रेस के भीतर जो घमासान मचा था, उसकी विस्तृत जानकारी बहुत कम लोगों को है।

नेहरू ने जब राजाजी के नाम का प्रस्ताव पेश किया था, तो कांग्रेस नेता उनसे अभद्रता करने लगे थे। सरदार पटेल को बचाव में आना पड़ा था। नेहरू ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने तक का मन बना लिया था। कई और घटनाएं हुई थीं। प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित अपनी किताब 'भारतीय संविधान-अनकही कहानी' में वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने उस वक्त के कई नेताओं के संस्मणों के जर‍िए पूरे घटनाक्रम पर रोशनी डाली है।

नेहरू राजाजी को क्यों राष्ट्रपति बनाना चाहते थे?

इस सवाल का जवाब सरदार पटेल के निजी सचिव रहे वी. शंकर के लिखे में मिलता है। वी. शंकर सरदार की परछाई जैसे थे। वी. शंकर के मुताबिक, सरदार और महात्मा गांधी के प्रयास से राजाजी को कांग्रेस में स्थान मिला था। वे पश्चिम बंगाल के गवर्नर भी बना दिए गए। इस पद पर रहते हुए उन्होंने लार्ड माउंटबेटन और जवाहरलाल नेहरू के मन में अपने लिए जो जगह बनाई, उससे वह गवर्नर जनरल भी बने। अब नेहरू उन्हें निर्विरोध राष्ट्रपति निर्वाचित कराना चाहते थे। जहां तक सरदार पटेल का प्रश्न है, वे जवाहरलाल नेहरू के इस इरादे से परिचित होने के कारण उस समय एक हद तक ऊहापोह में थे, क्योंकि राजाजी से उनकी घनिष्ठता रही थी, इसलिए स्वयं भी सोचने के लिए वे थोड़ा समय चाहते थे। सरदार यह भी चाहते थे कि कांग्रेस में इस पर शांतचित्त से विचार हो (कांग्रेस का पूरा नेतृत्व उस समय संविधान सभा में था, उसे ही इस पर निर्णय करना था।)। लेकिन जवाहरलाल नेहरू बहुत जल्दबाजी में थे। अपनी अमेरिका यात्रा से पहले ही वे निर्णय करा लेना चाहते थे। राजाजी भी उतने ही उतावले थे।

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उन्हीं दिनों नेहरू ने सरदार से बातचीत में राजाजी की तारीफ करते हुए बताया कि गवर्नर जनरल के नाते उन्होंने विदेशी मेहमानों का दिल जीता। सरदार ने नेहरू को सलाह दी कि अमेरिका यात्रा से वापसी तक इस पर विचार स्थगित रखना चाहिए। नेहरू इससे सहमत हुए। लेकिन अचानक अपनी अमेरिका यात्रा से एक दिन पहले उन्होंने अपना विचार बदल दिया। वह अपनी यात्रा से पहले ही निर्णय करा लेना चाहते थे।

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नेहरू से हुई अभद्रता

नेहरू ने सरदार पटेल को फोन किया और पूछा कि क्या वर्तमान गवर्नर जनरल को राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव अगर मैं रखता हूं तो पार्टी के नेता उसका समर्थन करेंगे, अगर ऐसा होता है तो यह अमेरिका यात्रा से पहले उनकी तरफ से मेरे लिए उपहार होगा।

सरदार ने ऐसा न करने की सलाह दी। उन्होंने समझाया कि उनका प्रस्ताव आसानी से माना नहीं जाएगा। लेकिन नेहरू अड़े रहे। उसी शाम नेहरू ने प्रस्ताव रखा।

नेहरू के प्रस्‍ताव रखते ही माहौल बदल गया। वी. शंकर के मुताबिक, नेहरू के भाषण में जबरदस्त टोका टोकी होने लगी। प्रस्ताव के विरोध में कांग्रेसी आपे से बाहर होकर लोग बार-बार बोलने लगे। मर्यादाएं ध्वस्त हो गईं। नेहरू सचमुच संकट में पड़ गए। उन्होंने सरदार से अनुरोध किया कि वे बोलें अर्थात् लोगों को शांत करें। सरदार ने मना कर दिया। नेहरू के प्रस्ताव का विरोध ही विरोध था। सभा कलह में बदल गई। थोड़ी देर देखने और सुनने के बाद जब सरदार ने देखा कि पानी सिर से ऊपर बहने लगा है तो खड़े हुए। माइक पकड़ा। दस मिनट बोले। कांग्रेस की मर्यादा के पालन का स्मरण दिलाया। कहा कि कांग्रेस में गंभीर मतभेद को पहले भी दूर किया गया है। नेहरू का नाम लिए बगैर उन्होंने उनको कांग्रेस का निर्विवाद नेता बताया और कहा कि ऐसे नेता की विदेश यात्रा से पहले इस तरह का कलह भरा दृश्य पैदा नहीं होना चाहिए। नेताओं ने सरदार की बात सुनी और शांत हुए। सरदार ने कांग्रेस पार्टी से अपील की कि जल्दबाजी में कोई निर्णय करने से बेहतर है कि हम थोड़ी प्रतीक्षा करें।

प्रधानमंत्री पद छोड़ना चाहते थे नेहरू

नेहरू के प्रस्ताव का जिस तरह विरोध हुआ था, उससे वह टूट गए थे। इस हाल को समझते हुए सरदार ने गोविंद बल्लभ पंत को कहा कि वह नेहरू के साथ उनके घर तक जाएं। सरदार को आशंका थी कि नेहरू निराशा में डूब जाएंगे। सरदार की चिंता गलत नहीं थी। घर पहुंचकर पंत को नेहरू का हस्तलिखित पत्र मिला।

वी. शंकर के मुताबिक, पत्र में नेहरू ने अपने इस्तीफे की पेशकश की थी और यह भी लिखा था कि विदेश से वापसी के बाद वे गवर्नर जनरल से कहने जा रहे हैं कि सरदार पटेल को सरकार का नेतृत्व करने के लिए निमंत्रित करें। यह भी लिखा कि आपके चिंताजनक स्वास्थ्य और बढ़ती उम्र की हालत में यह बोझ डालने के लिए मैं क्षमा चाहता हूं। सभा की घटना को उन्होंने अपने नेतृत्व पर अविश्वास माना। नेहरू को इस बात से भी बहुत ठेस पहुंची थी कि जिस तरह का पूर्ण समर्थन और विश्वास पार्टी में सरदार को अर्पित है, वैसा उनको नहीं है।

प्रस्ताव वाले दिन की पूरी तस्वीर महावीर त्यागी के संस्मरण 'भारत के प्रथम राष्ट्रपति' से स्पष्ट होती है। वह लिखते हैं, "एक रात को जवाहरलालजी ने प्रस्ताव रखा कि सविधान लागू होते ही भारत के राष्ट्रपति पद पर राजगोपालाचारी को नियुक्त किया जाए। हमने प्रस्ताव रखा कि संविधान सभा के अध्यक्ष बाबू राजेंद्र प्रसाद को ही प्रथम राष्ट्रपति नियुक्त करना चाहिए। बहुत गरमागरमी की बहस हुई। जोश में आकर जवाहरलालजी ने खड़े होकर चुनौती के रूप में कहा कि 'यदि राजगोपालाचारी को आप स्वीकार नहीं करते हैं तो आपको अपनी पार्टी का नेता भी नया चुनना पड़ेगा।"

महावीर त्यागी ने इसका जवाब दिया, "मैंने उनसे सबसे जोश में चिल्लाकर सभापति महोदय से कहा कि 'इस प्रकार की धमकी से हमारी राय बदलने की कोशिश करना कहां तक न्यायसंगत है? इस धमकी के उत्तर में मेरा कहना है कि हर व्यक्ति को अपनी सम्मति के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता है, हम तो राजेंद्र बाबू को चुनना चाहते हैं, यदि ये त्याग-पत्र देना चाहें तो दें, हम किसी दूसरे साथी को पार्टी का नेता चुन लेंगे।"

मामला इतनी तेजी पकड़ गया कि पार्टी में फूट पड़ जाने के डर से पट्टाभि सीतारमय्या ने बैठक स्थगित कर दी। इसके तुरंत बाद ही जवाहरलाल नेहरू अमेरिका चले गए।

नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद पर बनाया दबाव?

नेहरू के अमेरिका से वापस आने के दो दिन बाद महावीर त्यागी को सरदार पटेल ने फोन क‍िया। पटेल ने बताया कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने तो जवाहरलालजी को लिखकर दे दिया है कि वह राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार नहीं हैं। यह सुनते ही वह फौरन अपनी जीप लेकर राजेंद्र बाबू के घर पहुंच गए। वह कमरे के फर्श पर दरी बिछाए चरखा कात रहे थे।

कमरे में घुसते ही महावीर त्यागी ने पूछा, "राजेंद्र बाबू, क्या सचमुच आप मैदान से भाग निकले?" प्रसाद ने जवाब दिया, "भाई, तुम ही बताओ, मैं क्या करता? अमेरिका से लौटते ही शाम को जवाहरलाल मेरे घर आए और बोले कि राजेंद्र बाबू, मेरी आपसे अपील है कि आप राजाजी को निर्विरोध चुन जाने दो। मैं लाजवाब हो गया और उनके कहे अनुसार मैंने लिखकर दे दिया कि राजगोपालाचारी के राष्ट्रपति चुने जाने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है और मैं इसका उम्मीदवार नहीं हूँ।"

महावीर त्यागी अपने संस्मरण में लिखते हैं, "यह सुनकर मैंने गुस्से (बनावटी) से चिल्लाकर कहा, राजेंद्र बाबू याद रखना, मैं भी कांग्रेस में एक अव्वल नंबर का गुंडा हूं। जिस तरह से तुमने हमारे साथियों के साथ विश्वासघात किया है, मैं उसका बदला लिये बिना नहीं छोडूंगा। भरे चौराहे पर तुम्हारी टोपी उछालूंगा, बिहारी बुद्ध कहीं के!" त्यागी की बात सुन प्रसाद उन्हें रोकते रह गए और वह सरदार के पास जाने लिए निकल गए।

जब सरदार को पता चला तो उन्होंने त्यागी से कहा, "जब तुम्हारा दूल्हा ही पालकी छोड़कर भाग गया तो बारात कैसे चढ़ेगी? उसने तुमको नहीं पूछा, यह तो समझ सकता हूं, पर कम-से-कम हमको तो टेलीफोन करता, बीसियों वर्ष का हमारा साथी है।"

इसके बाद महावीर त्‍यागी ने एक चाल चली और अंतत: नेहरू को मात खानी पड़ी और राजेंद्र प्रसाद के नाम पर सहमत होना पड़ा। (उस चाल के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए फोटो पर क्लिक करें।)

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बाएं से- सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू (Express Archive)
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