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मुख्तार अंसारी के ब्रिगेडियर नाना को पाकिस्तान बुलाने के लिए जिन्ना ने दिया था लालच, नहीं माने तो सिर पर रख दिया ₹50,000 का इनाम

मुख्तार अंसारी के नाना मोहम्मद उस्मान भारतीय सेना में ब्रिगेडियर के पद पर थे। आजादी के तुरंत बाद पाकिस्तान से हुए युद्ध में वह शहीद हो गए थे, जिसके लिए उन्हें महावीर चक्र से नवाजा गया था।
Written by: स्पेशल डेस्क | Edited By: Ankit Raj
नई दिल्ली | Updated: March 29, 2024 21:43 IST
मुख्तार अंसारी के ब्रिगेडियर नाना को पाकिस्तान बुलाने के लिए जिन्ना ने दिया था लालच  नहीं माने तो सिर पर रख दिया ₹50 000 का इनाम
मुख्तार अंसारी (Express Photo by Vishal Srivastav)
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मुख्तार अंसारी के विवादास्पद और प्रभावशाली राजनीतिक करियर का अब अंत हो गया है। गुरुवार (28 मार्च, 2024) की रात बांदा के एक अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से उत्तर प्रदेश की राजनीति के मुखर नेता और सजायाफ्ता अपराधी मुख्तार अंसारी का निधन हो गया। हालांकि मुख्तार अंसारी के बेटे उमर अंसारी समेत विपक्ष के कई नेताओं द्वारा उनकी मौत की परिस्थितियों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। अंसारी की मौत की न्यायिक जांच के आदेश दिए गए हैं।

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कांग्रेस और मुस्लिम लीग के अध्यक्ष थे दादा

साल 1963 में उत्तर प्रदेश के एक प्रतिष्ठित परिवार में पैदा हुए अंसारी के परिवार की कहानी बेहद दिलचस्प है। मुख्तार अंसारी के दादा डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी भारत के अग्रणी स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे। वह 1912 से लेकर 1936 में अपनी मृत्यु तक राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय रहे।

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स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वह देश के दो सबसे प्रमुख राजनीतिक दलों: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) और मुस्लिम लीग के अध्यक्ष भी रहे। इसके अलावा वह अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन से पैदा हुए जामिया मिलिया इस्लामिया के संस्थापकों में से एक थे।

मूल रूप से आधुनिक उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के रहने वाले अंसारी पेशे से एक डॉक्टर थे। उन्होंने मद्रास मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा में अपनी डिग्री प्राप्त की थी। 1898 में उन्होंने पहली बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के अखिल भारतीय सत्र में भाग लिया था। 1927 में वह कांग्रेस के अध्यक्ष बने।

कांग्रेस के अलावा वह अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के भी सदस्य थे। हालांकि 1936 में अपनी मृत्यु तक कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य रहे। उन्होंने 1920 में मुस्लिम लीग के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया।

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Dr. Mukhtar Ahmed Ansari
डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी (PC- amritmahotsav.nic.in)

अंसारी ने खिलाफत आंदोलन और 1919 में 18 दिन लंबे रोलेट अधिनियम के विरोध में सक्रिय भूमिका निभाई थी। वह 1919 में दिल्ली की स्थानीय सत्याग्रह सभा के सदस्य थे। असहयोग आंदोलन (1921) और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34) के दौरान अंसारी कांग्रेस की राजनीतिक गतिविधियों के केंद्र में थे।

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1921 में उन्हें असहयोग आंदोलन में उनकी भूमिका के लिए कैद किया गया था। इसके बाद जेल जाना उनके लिए एक आम बात हो गई थी। मुख्तार अहमद अंसारी भारत में बढ़ते सांप्रदायिकता को लेकर भी चिंतित थे और जब 1924 में दिल्ली में सांप्रदायिक अशांति भड़की, तो वह शहर में सांप्रदायिक तनाव को कम करने में सबसे आगे थे।

भारतीयों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से चिंतित, अंसारी ने अन्य लोगों के साथ मिलकर 29 अक्टूबर 1920 को जामिया मिलिया इस्लामिया की स्थापना की। वह विश्वविद्यालय की संस्थापक समिति के सदस्यों में से एक थे। मुख्तार अहमद अंसारी ने 1928 से अपनी मृत्यु तक विश्वविद्यालय के चांसलर के रूप में भी कार्य किया और उनके कार्यकाल में विश्वविद्यालय ने 1935 में अलीगढ़ से दिल्ली में अपने परिसर को स्थानांतरित कर दिया, जहां वह वर्तमान में स्थित है। विश्वविद्यालय के मेडिकल डिपार्टमेंट को स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर ही रखा गया है। पुरानी दिल्ली की दरियागंज इलाके में उनके नाम पर एक सड़क का नाम भी रखा गया है।

देश के लिए शहीद हो गए ब्रिगेडियर नाना

मुख्तार अंसारी के नाना मोहम्मद उस्मान भारतीय सेना में ब्रिगेडियर के पद पर थे। आजादी के तुरंत बाद पाकिस्तान से हुए युद्ध में वह शहीद हो गए थे, जिसके लिए उन्हें महावीर चक्र से नवाजा गया था।

भारत की आजादी से पहले ही मुख्तार अंसारी के नाना ब्रिगेडियर बन गए थे। उनके पास पाकिस्तान जाने का विकल्प था। उन्हें पाकिस्तान बुलाने के लिए मोहम्मद अली जिन्ना और लियाकत अली खान दोनों ने पूरी ताकत लगा दी थी। पाकिस्तान की तरफ से उन्हें तुरंत पदोन्नति देने का लालच भी दिया गया था। लेकिन वह अपनी देशभक्ति पर कायम रहे। उन्होंने भारत में रहकर सेवा करना चुना।

Brigadier usman
नौशेरा की लड़ाई (1948) के बाद मोहम्मद उस्मान को 'नौशेरा का शेर' कहा जाने लगा था।

आजादी के तुरंत बाद पाकिस्तान से हुए युद्ध में मोहम्मद उस्मान 3 जुलाई 1948 को शहीद हो गए थे। हालांकि जान गंवाने से पहले उन्होंने पाकिस्तानी सेना को ऐसी धूल चटाई थी कि उन पर 50,000 का इनाम तक रख दिया गया था। वह भारतीय सेना के शायद इकलौते ऐसे जवान हैं, जिनके सिर पर पाकिस्तान ने 50,000 रुपये का रखा था। शहादत के वक्त उनकी उम्र 36 साल भी नहीं थी।

मुख्तार अंसारी के नाना को उसी जामिया मिलिया विश्वविद्यालय परिसर में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया था, जिसके संस्थापक उनके दादा थे। मोहम्मद उस्मान की अंत्येष्टि में प्रधानमंत्री नेहरू समेत भारतीय राजनीति और सेना के तमाम दिग्गज शामिल हुए थे।

पिता थे वामपंथी नेता!

मुख्तार अंसारी के पिता सुभानउल्ला अंसारी साफ-सुथरी छवि वाले कम्युनिस्ट नेता थे। गाजीपुर की स्थानीय राजनीति में सक्रिय रहे। भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी रिश्ते में मुख्तार अंसारी के चाचा हैं

मुख्तार अंसारी के बेटे ने देश का नाम किया था रोशन

मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास अंसारी शॉटगन शूटिंग के इंटरनेशनल खिलाड़ी रहे हैं। वह चार बार जूनियर नेशनल शूटिंग चैंपियन रह चुके हैं। वह शूटिंग के कई चैंपियनशिप में गोल्ड और सिल्वर मेडल जीत चुके हैं। साल 2012 में उन्होंने स्कीट निशानेबाजी के नेशनल चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता था।

अब्बास ने जूनियर भारतीय निशानेबाजी टीम का नेतृत्व भी किया है, यानी कैप्टेन रहे हैं। साल 2012 में ही अब्बास ने दुनिया के टॉप-10 निशानेबाजों में जगह बनाई थी। दरअसल, उस साल जूनियर वर्ल्ड कप हुआ था। भारत की तरफ से अब्बास ने भी उसमें हिस्सा लिया था और दुनिया के टॉप-10 स्कीट शूटर्स में जगह बनाई थी।

साल 2014 में एक सड़क हादसे के बाद अब्बास का शूटिंग करियर खत्म हो गया और वह पिता की कौमी एकत दल के रास्ते राजनीति में सक्रिय गए। फिलहाल अवैध रूप से हथियार रखने के मामले में जेल में हैं।

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इंटरनेशनल शूटिंग स्पोर्ट्स फेडरेशन की वेबसाइट पर अब्बास अंसारी की प्रोफाइल (screengrab- issf)

मुख्तार अंसारी: राजनेता और गैंगेस्टर!

आपराधिक गतिविधियों में मुख्तार अंसारी की संलिप्तता काफी पहले से शुरू हो गई थी। वह राज्य में प्रचलित सरकारी अनुबंध माफिया में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए अपराध में गए थे।

15 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपराध की दुनिया में कदम रख दिया था। उन पर गाजीपुर के सैदपुर पुलिस स्टेशन में आपराधिक धमकी का मामला दर्ज किया गया था। ये 1978 की बात है। करीब एक दशक बाद वर्ष 1986 तक उनके खिलाफ हत्या का मामला दर्ज हो चुका था।

अगले दशक में 14 और गंभीर आपराधिक मामलों के बावजूद, अंसारी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए राजनीतिक में उतरते हैं और पांच बार विधायक बने।

वह पहली बार 1996 में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर मऊ सदर से विधायक चुने गए थे। इसके बाद 2002 और 2007 के विधानसभा चुनावों में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में इस सीट से जीत दर्ज की। 2012 में कौमी एकता दल लॉन्च किया और मऊ सदर से फिर जीते।

अंसारी ने 2017 में भी मऊ से जीत दर्ज की थी। 2022 में उन्होंने अपने बेटे अब्बास अंसारी के लिए सीट खाली कर दी, जो सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के टिकट पर इस सीट से जीते थे। 2005 से अपनी मौत तक अंसारी यूपी और पंजाब की विभिन्न जेलों में बंद रहे।

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