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Lok Sabha Election: 1984 का वो चुनाव जब कांग्रेस ने आखिरी बार अपने दम पर बनाई थी सरकार

1984 के चुनाव में एनटीआर की तेलुगु देशम पार्टी ने लोकसभा में 30 सीटें जीतीं। सीपीआई (एम) ने 22 सीटें, जनता ने 10, सीपीआई ने 6 और लोक दल (सी) ने 3 सीटें जीतीं थीं।
Written by: श्‍यामलाल यादव
नई दिल्ली | May 14, 2024 17:29 IST
lok sabha election  1984 का वो चुनाव जब कांग्रेस ने आखिरी बार अपने दम पर बनाई थी सरकार
लाल किले से भाषण देते राजीव गांधी (Source- Express Archive)
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लोकसभा चुनाव 2024 से पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने NDA के 400 सीट के आंकड़े पार करने और BJP के 370 सीटें जीतने की भविष्यवाणी की थी। पीएम मोदी ने लोकसभा में साफ कहा था कि हमारी सरकार का तीसरा कार्यकाल भी बहुत दूर नहीं है। मैं आमतौर पर आंकड़ों के चक्कर में नहीं पड़ता लेकिन मैं देख रहा हूं कि देश का मिजाज एनडीए को 400 पार कराकर रहेगा और बीजेपी को 370 सीटें अवश्य देगा। इसी तरह से तमाम इंटरव्यू में अमित शाह भी एनडीए के 400 पार की बात कह चुके हैं। पर, क्या आपको पता है कि लोकसभा में वास्तव में '400 पार' जाने वाले एकमात्र राजनेता राजीव गांधी थे।

31 अक्टूबर, 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को अचानक प्रधानमंत्री पद का दावेदार बना दिया गया। इंदिरा की हत्या के बाद देशभर में उठी सहानुभूति की सुनामी पर सवार होकर, राजीव गांधी के समय में कांग्रेस ने दिसंबर, 1984 को हुए आठवें लोकसभा चुनाव के पहले चरण में 514 सीटों में से 404 सीटें जीतीं। वहीं, सितंबर और दिसंबर 1985 में पंजाब और असम में वोटिंग के बाद अन्य 10 सीटें जीतीं।

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कांग्रेस 1984 के बाद कभी भी अपने दम पर लोकसभा में बहुमत हासिल नहीं कर सकी

हालांकि, यह लहर ज्यादा दिन तक कायम नहीं रही और भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव केवल 40 वर्ष के थे जब उन्होंने पदभार संभाला और 1989 में एक बड़े भ्रष्टाचार घोटाले के बीच सत्ता खो दी। जिसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस 1984 के बाद कभी भी अपने दम पर लोकसभा में बहुमत हासिल नहीं कर सकी।

उस समय लोकसभा चुनाव सामान्य प्रक्रिया के तहत जनवरी 1985 में होने का प्रस्ताव था। 25 अगस्त 1984 को चुनाव आयोग (ECI) ने चुनाव अभियान में आधिकारिक मशीनरी के दुरुपयोग पर चर्चा करने के लिए सभी दलों की एक बैठक बुलाई।

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिख विरोधी हिंसा

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भयानक सिख विरोधी हिंसा हुई। देशभर में सिख समुदाय के 3000 से अधिक लोग मारे गए, जिनमें अकेले दिल्ली से 2500 से अधिक लोग थे। इसमें कुछ कांग्रेस नेताओं को भी दोषी ठहराया गया। जिसके बाद ईसीआई को लोकसभा चुनाव को कुछ सप्ताह आगे बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ा। अभियान के दौरान, जनता पार्टी और भाजपा ने कांग्रेस के एक विज्ञापन पर आपत्ति जताई जिसमें कहा गया था, "आपको दूसरे राज्य के टैक्सी चालक द्वारा चलाई जाने वाली टैक्सी में सवारी करने में असहजता क्यों महसूस होनी चाहिए?"

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ईसीआई की रिपोर्ट में कहा गया कि शिकायतकर्ताओं के अनुसार, "टैक्सी ड्राइवर का संदर्भ वास्तव में सिख समुदाय को संदर्भित करने के लिए था और इसका उद्देश्य लोगों के विभिन्न वर्गों के बीच सांप्रदायिक पूर्वाग्रह और असंतोष को बढ़ावा देना था।" हालांकि, ईसीआई ने निष्कर्ष निकाला कि विज्ञापन किसी भी चुनावी कानून का उल्लंघन नहीं करता ना आदर्श आचार संहिता में निर्धारित सिद्धांतों के विपरीत है।

17 राज्यों और सभी नौ केंद्र शासित प्रदेशों में एक ही दिन चुनाव

17 राज्यों और सभी नौ केंद्र शासित प्रदेशों में एक ही दिन चुनाव हुए। पंजाब और असम में कोई मतदान नहीं हो सकता था। इसे सुविधाजनक बनाने के लिए, धारा 73 A को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में जोड़ा गया था, जिसने ईसीआई को असम और पंजाब राज्य में चुनाव के संबंध में कदम उठाने की अनुमति दी थी।

उन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में वोटों की गिनती 28 दिसंबर 1984 को शुरू हुई, जहां 24 और 27 दिसंबर को मतदान हुआ था। वहीं नागालैंड और मेघालय में 29 दिसंबर को काउंटिंग हुई जहां 28 दिसंबर को मतदान हुआ था। 31 दिसंबर 1984 तक लगभग सभी निर्वाचन क्षेत्रों के परिणाम घोषित कर दिए गए थे।

किसे मिली जीत, किसे चखना पड़ा हार का स्वाद?

राजीव ने अपनी भाभी और संजय की पत्नी मेनका गांधी को हराकर अमेठी में जीत हासिल की। अभिनेता अमिताभ बच्चन ने इलाहाबाद में पूर्व कांग्रेसी और दिग्गज नेता एच एन बहुगुणा को हराया। के आर नारायणन ने केरल के ओट्टापलम में, प्रकाश चंद सेठी ने इंदौर में, गुलाम नबी आज़ाद ने महाराष्ट्र के वाशिम में और पी वी नरसिम्हा राव ने बेरहामपुर में जीत हासिल की। इंदिरा के आपातकाल के दौरान राष्ट्रपति रहे फखरुद्दीन अली अहमद की पत्नी आबिदा अहमद ने बरेली में जीत हासिल की।

इस चुनाव में एनटीआर की तेलुगु देशम पार्टी ने लोकसभा में 30 सीटें जीतीं। सीपीआई (एम) ने 22 सीटें, जनता ने 10, सीपीआई ने 6 और लोक दल (सी) ने 3 सीटें जीतीं। भाजपा ने सिर्फ दो सीटें जीतीं - आंध्र प्रदेश के हनमकोंडा से चंदुपटला जंगा रेड्डी और गुजरात के मेहसाणा से एके पटेल। वाजपेयी ग्वालियर में हार गये और जनता पार्टी के चन्द्रशेखर अपने गृह क्षेत्र यूपी के बलिया में हार गये। बागपत में चरण सिंह जीते. जगजीवन राम, जो कांग्रेस छोड़कर कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी में शामिल हुए थे और बाद में नई पार्टी कांग्रेस (जे) बनाई, ने सासाराम में जीत हासिल की। बारामती में कांग्रेस (सोशलिस्ट) के शरद पवार जीते थे।

शुरू हुआ राजनीति का नया दौर

1984 के चुनाव के समय तक, पिछली पीढ़ी के अधिकांश दिग्गज का निधन हो चुका था। सी राजगोपालाचारी की 1972 में मृत्यु हो गई थी। 1977 में विपक्षी एकता के पीछे की ताकत रहे जयप्रकाश नारायण की 1979 में मृत्यु हो गई थी। जे बी कृपलानी का 1982 में निधन हो गया था। नए विपक्षी दलों और नेताओं में, मार्च 1982 में स्थापित टीडीपी सबसे प्रमुख थी।

1985 में, केंद्र सरकार ने पंजाब में राजीव-लोंगोवाल समझौते और असम समझौते पर हस्ताक्षर किए। 1986 में सरकार शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को रद्द करने के लिए संसद में एक कानून लाई। फील्ड हॉवित्जर तोपों की आपूर्ति के लिए स्वीडिश हथियार निर्माता बोफोर्स के साथ करार के बाद सौदे में 64 करोड़ रुपये की रिश्वत का खुलासा हुआ, जो उस समय एक बड़ी रकम मानी जाती थी। बोफोर्स घोटाला राजीव को उनके पूरे कार्यकाल परेशान करता रहा। 1989 के चुनाव में कांग्रेस 1984 में छुई गयी ऊंचाइयों से गिरकर लोकसभा में केवल 197 सीटों पर सिमट गई, जिससे एक और गैर-कांग्रेसी सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

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