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Loksabha Election 2024: जनता को पसंद नहीं, फ‍िर भी जमीनी नेताओं को छोड़ दलबदलुओं को ट‍िकट दे रहींं पार्ट‍ियां

राजनीतिक दल अभी भी 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा करने की प्रक्रिया में हैं, लेकिन कई दलबदलू नेता या तो मैदान में हैं या दूसरी पार्टियों में जा चुके हैं।
Written by: shrutisrivastva
नई दिल्ली | Updated: April 17, 2024 10:53 IST
loksabha election 2024  जनता को पसंद नहीं  फ‍िर भी जमीनी नेताओं को छोड़ दलबदलुओं को ट‍िकट दे रहींं पार्ट‍ियां
दलबदलुओं पर भरोसा जता रही पार्टियां (Source- X)
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चुनाव की गहमागहमी के बीच नेताओं का दल बदलना भी जारी है। तमाम राजनीतिक दल दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को अपनी पार्टी से टिकट देकर चुनाव के मैदान में उतार रहे हैं। वहीं, महाराष्ट्र की बात की जाये तो एनसीपी के दोनों समूह अपनी 50 प्रतिशत सीटों के लिए दलबदलुओं पर निर्भर हैं।

शरद पवार के नेतृत्व वाले गुट को आवंटित 10 सीटों में से पांच सीटें दलबदलुओं को चली गईं हैं जबकि अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी जो चार सीटों पर चुनाव लड़ रही है, उसने दो सीटें उन्हें दी हैं जिन्होंने खेमा बदल लिया है। आइये जानते हैं उन दलबदलु नेताओं के बारे में जिन्हें एनसीपी और भाजपा से दिया है टिकट।

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भाजपा के डिस्ट्रिक्ट जनरल सेक्रेटरी धैर्यशील मोहिते-पाटिल महाराष्ट्र के उन दलबदलुओं की लिस्ट में सबसे आगे हैं जिन्होंने लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन किया है। धैर्यशील भाजपा छोड़कर एनसीपी (शरतचंद्र पवार) में शामिल हो गए। एक समय शरद पवार के साथ निकटता के लिए जाने जाना वाला माधा और सोलापुर का प्रभावशाली मोहिते-पाटिल परिवार 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा के साथ जुड़ गया था।

हालांकि, बाद में उन्हें लगा कि परिवार को दरकिनार किया जा रहा है जब विधायक रणजीत सिंह मोहिते-पाटिल को कैबिनेट में शामिल नहीं किया गया और न ही माधा से परिवार से किसी के नाम पर भी लोकसभा नामांकन के लिए विचार नहीं किया जा रहा है। ऐसे में विजयसिंह मोहिते-पाटिल के भतीजे धैर्यशील ने शरद पवार का दरवाजा खटखटाया और एनसीपी (शरतचंद्र पवार) में शामिल होने की इच्छा जताई। शरद पवार ने भी तुरंत प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और माधा से धैर्यशील के नामांकन की घोषणा कर दी।

पारनेर विधायक नीलेश लंके के अजित पवार के साथ घनिष्ठ संबंध थे, लेकिन एक हफ्ते पहले ही उन्होंने अजित गुट को छोड़कर NCP (शरतचंद्र पवार) में शामिल होने का फैसला किया। उन्हें राधाकृष्ण विखे पाटिल के बेटे और मौजूदा सांसद सुजय विखे पाटिल के खिलाफ अहमदनगर से उम्मीदवार बनाया गया है। रावेर सीट से एनसीपी ने श्रीराम पाटिल को उम्मीदवार बनाया है। वह भाजपा छोड़कर एनसीपी (शरतचंद्र पवार) में शामिल हुए हैं।

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बजरंग सोनवणे- लोकसभा चुनाव से पहले उपमुख्यमंत्री अजित पवार के करीबी माने जाने वाले बजरंग सोनवणे ने शरद पवार की पार्टी का दामन थाम लिया था। वह बीड से चुनाव मैदान में उतरेंगे। बजरंग सोनवणे ने 2019 का लोकसभा चुनाव प्रीतम मुंडे के खिलाफ बीड सीट से चुनाव लड़ा था। पार्टी में शामिल होने के दौरान उन्होंने कहा था कि वह कोई उम्मीद लेकर पार्टी में शामिल नहीं हुए और वह शरद पवार द्वारा दी जाने वाली किसी भी जिम्मेदारी को स्वीकार करने के लिए तैयार है। उन्हें अजित पवार गुट में घुटन महसूस हो रही थी इसलिए मैं अपन समर्थकों की ओर से यहां आया हूं। बीड से जो भी उम्मीदवार होगा, मैं पूरी ताकत से उनका समर्थन करूंगा।

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अमर काले- कांग्रेस छोड़कर एनसीपी (शरद पवार गुट) का हाथ थामने वाले से अमर काले ने वर्धा से नामांकन दाखिल किया है। अमर का कहना है कि उन्हें जीत का पूरा भरोसा है. वर्धा जिले के आर्वी विधानसभा क्षेत्र में अमर काले पांच बार चुनाव लड़ चुके हैं। साल 1999 में वह विधायक चुने गए। जिसके बाद साल 2004 में अमर काले दोबारा विधायक के रूप में चुनकर आए थे तो वहीं 2009 के चुनाव में वह पराजित हो गए। जिसके बाद 2014 के चुनाव में अमर काले दोबारा चुनकर आए जबकि 2019 में वे पराजित हो गए।

अजित पवार गुट का हाथ थामने वाले नेता

शिवाजीराव अधलराव पाटिल- शिव सेना छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल होने के बाद शिवाजीराव अधलराव पाटिल शिरूर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे। पाटिल त्रिपक्षीय महायुति गठबंधन के उम्मीदवार होंगे।

अर्चना पाटिल- कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष शिवराज पाटिल की बहू अर्चना पाटिल चाकुरकर भी भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गईं। उन्होंने धाराशिव से नामांकन दाखिल किया है। अर्चना पाटिल चाकुरकर ने कहा था कि उन्होंने पहले ही शिवराज पाटिल के करीबी सहयोगी और राज्य के पूर्व मंत्री बसवराज मुरुमकर के साथ भाजपा में शामिल होने की योजना बनाई थी लेकिन अपनी बेटी की शादी के कारण उन्होंने योजना स्थगित कर दी।

चुनाव जीतने में असफल हो रहे दलबदलू नेता

दलबदलू उम्मीदवारों के चुनाव जीतने की दर समय के साथ गिरती जा रही है। अशोक विश्वविद्यालय के त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डेटा के लोकसभा संख्या के विश्लेषण से पता चलता है कि 1960 के दशक के बाद से औसतन लगभग 30 प्रतिशत की तुलना में हाल के चुनावों में उनकी स्ट्राइक रेट 15 प्रतिशत से कम थी। इसमें केवल वे लोग शामिल हैं जो आम चुनावों में दलबदलू थे और उन राजनेताओं को शामिल नहीं किया गया है जिन्होंने एक अलग पार्टी के तहत राज्य का चुनाव लड़ा हो।

1977 के चुनावों में दलबदलू राजनेताओं की स्ट्राइक रेट सबसे अधिक 68.9 प्रतिशत थी। 2019 में यह 14.9 प्रतिशत था। स्ट्राइक रेट उन दलबदलू राजनेताओं का शेयर है जो किसी चुनाव में सफल होते हैं। डेटासेट ने 2019 में राजनीतिक दलों के 195 टर्नकोट उम्मीदवारों की पहचान की। चुनाव लड़ने वाले 8,000 से अधिक उम्मीदवारों में से उनका हिस्सा 2.4 प्रतिशत था। पर दलबदलुओं में से केवल 29 ही जीते। सफल टर्नकोट उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 2004 के अंत तक काफी अधिक थी। उस समय यह आंकड़ा 26.2 प्रतिशत था। 2004 में कुल उम्मीदवारों में टर्नकोट का प्रतिशत 3.9 प्रतिशत था।

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उम्मीदवारों की सूची में दलबदलुओं की सबसे अधिक हिस्सेदारी 1980 में

उम्मीदवारों की सूची में दलबदलुओं की सबसे अधिक हिस्सेदारी 1980 में थी। उस समय 4,629 उम्मीदवारों में से 377 या 8.1 प्रतिशत टर्नकोट थे। 1977 में 2,439 उम्मीदवारों (6.6 प्रतिशत) में से 161 टर्नकोट थे। हालांकि उनका सक्सेस रेट 1980 में 20.69 प्रतिशत था। लगातार तीन चुनावों से यह 15 फीसदी से नीचे रही है।

2014 में भाजपा के दलबदलू उम्मीदवारों की सफलता दर 66.7 प्रतिशत थी। कांग्रेस के लिए यह आंकड़ा 5.3 प्रतिशत था। 2019 के दौरान भाजपा के कुल उम्मीदवारों में टर्नकोटों की हिस्सेदारी 5.3 प्रतिशत थी। कांग्रेस के लिए, यह 9.5 प्रतिशत थी।

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