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'चार सौ पार' या बहेगी बदलाव की बयार!

सच तो यह है कि गांव में इतनी बेरोजगारी है कि सारे युवा धीरे—धीरे नौकरी की उम्मीद छोड़कर अब अपराध की दुनिया में लिप्त होने लगे हैं, जिस पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होता।
Written by: निशिकांत ठाकुर
नई दिल्ली | March 08, 2024 18:35 IST
 चार सौ पार  या बहेगी बदलाव की बयार
बारासात (पश्चिम बंगाल) में पीएम नरेंद्र मोदी की नारीशक्ति सम्मान संवेदना रैली में एक समर्थक (Express photo by Partha Paul)
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आजकल किसी दो चार लोगों के बीच खड़े हो जाइए, सभी आपको देश के वर्तमान हालात पर चर्चा करते मिलेंगे। वे किस प्रकार के व्यक्ति हैं, इसपर नहीं जाइए, केवल उनके विचार को सुनिए—परखिए। राजनीति के जिन विषयों के बारे में कभी आपने सोचा तक नहीं होगा, वे उसपर गंभीर मंत्रणा करते मिलेंगे। आपको अपने देश पर गर्व होगा, उनकी शिक्षा दीक्षा पर भी गर्व होगा, लेकिन यह जानने के बाद आप घोर आश्चर्य में पड़ जाएंगे कि ये वे लोग हैं, जो बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं।

स्वाभाविक रूप से कोई रोजगार न मिलने के कारण उन्होंने देश की वर्तमान राजनीति का गहन अध्ययन करना शुरू कर दिया है। फिर अगले कुछ दिन में देश में लोकसभा चुनाव होने जा रहा है, तो ऐसी स्थिति में विचार व्यक्त करना तो भारतीय युवाओं की रीति—नीति भी रही है, क्योंकि देश का भविष्य तो इन्हीं युवाओं के हाथ में है। उनका आकलन इतना सटीक होता है कि आपको ऐसा प्रतीत होगा, मानो ये सभी किसी संसदीय क्षेत्र का दौरा करके अभी—अभी वापस लौटे हों। इन्हीं युवाओं के मन को भ्रमित करने के लिए आज बड़े—बड़े अखबारों में बड़े—बड़े खबरिया चैनलों पर उसे प्रकाशित और प्रसारित किया जाता है कि जिसे सुन—पढ़कर युवा परेशान हो जाते हैं कि कहीं वे भटक तो नहीं गए हैं?

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अभी बुद्धजीवियों के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने का अवसर मिला। वहां भीड़ से कुछ हटकर एक किनारे में खड़े ​होकर कुछ युवा आपस में बातें कर रहे थे, जिसे सुनकर स्तब्ध रह गया। उनकी बातचीत का मूल अर्थ यह था कि जो बातें शहर में देखने—सुनने को मिलती हैं, ऐसा कुछ गांव में तो नहीं देखने को मिलता है। शहरी लोग माहौल बनाते हैं, लेकिन सच किसी को देखना है, तो उसे गांव में जाकर देखना चाहिए और ग्रामीणों से उनकी पीड़ा सुननी चाहिए। सच तो यह है कि गांव में इतनी बेरोजगारी है कि सारे युवा धीरे—धीरे नौकरी की उम्मीद छोड़कर अब अपराध की दुनिया में लिप्त होने लगे हैं, जिस पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होता।

हानि यह होती है कि केवल रोजगार के चक्कर में युवा गांव छोड़कर शहर की ओर भाग रहे हैं और गांव बेरोजगारी के अंधेरे में आज तक वैसा ही डूबा हुआ है, जैसा कि कुछ वर्ष पहले तक था। अब वह आजिज हो चुका हैं और छिनैती—डकैती के बल पर जीवन निर्वाह कर रहे हैं। एक उदाहरण है कि पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की सरकार ने दस हजार लोगों को रोजगार देने के मकसद से परीक्षा आयोजित की थी, लेकिन सीने को छलनी कर देने वाली बात यह है कि दस हजार पद के लिए लगभग साठ लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था, जबकि उस परीक्षा का पेपर लीक हो गया और अंततः परीक्षा रद्द करनी पड़ी। नौकरी पाने की लालसा में समस्त परीक्षार्थियों का भविष्य अधर में लटक गया। अब वे क्या करेंगे?

सच में हमारे देश की जनता बहुत साफ हृदय, सुगम और सीधी है। इसमें दो राय नहीं कि ऐसी जनता को मूर्ख बनाना आज के इन चतुर सुजान राजनेताओं के लिए कोई बड़ी चुनौती नहीं होती। वे जनता को लच्छेदार भाषणों से उन्हीं से कहला सकते हैं कि आप से बड़ा कोई नेता नहीं, आपसे अधिक हित इस देश का करने वाला कोई नहीं, लिहाजा इस बार भी हम आपको ही अपना मत देकर सरकार बनाने का अवसर देंगे। अभी हाल के दिनों में प्रधानमंत्री बंगाल और बिहार में चुनावी रैली कर रहे थे और रैली में उपस्थित जनता के मुंह से बार—बार कहला रहे थे— 'अबकी बार … सरकार।' इस तरह के नारे देना प्रधानमंत्री के लिए कोई नई बात नहीं है। उनका सत्ता में आना ही इसलिए हुआ था कि वे रैली में आए लोगों से ऐसा वादा करवा लेते थे। लेकिन, अभी तक किसी भी नेता, मीडियाकर्मी या जनता में यह पूछने कि हिम्मत नहीं हुई कि पिछले दस वर्ष से देश की सत्ता पर काबिज आपकी सरकार ने इस कालखंड में आखिर ऐसा क्या किया है कि जिसके दम पर आप फिर से अपनी सरकार बनाने के लिए जनता के मुंह में हाथ डाल डालकर यह कहलवाते हैं कि एक अवसर उनकी सरकार को और दिया जाए?

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यह सच है आपकी सरकार ने कुछ दिया हो या नहीं दिया हो, लेकिन देश के समस्त भ्रष्टाचारियों को एक पार्टी में लाकर हिटलरशाही की तरह नए—नए कानून बनाकर उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देती रही। हां, यह भी सच है कि देश के अस्सी करोड़ लोगों को अपंग बना दिया, उन्हें उन पांच किलो अनाज पर जीवन—यापन करने के लिए विवश कर दिया। क्या यह नहीं हो सकता था कि इन निरीह जनता के लिए रोजगार खड़ा कर दिया जाता, जिसमें अपनी ताकत के बलबूते कमाकर लाने की कूवत होती। लेकिन, फिर सरकार का वह मुहावरा कहां जाता, जिसमें कहा जाता है कि हमारी सरकार अस्सी करोड़ गरीब जनता को 'मुफ्त का राशन' देती है। निराश्रित बनाने की यह विश्व में अपनी तरह की पहली योजना है, जो भारत की वर्ततान सरकार द्वारा बनाई गई है। इसे जनता को अपने पक्ष में मतदान करने का नायाब तरीका भी कह सकते हैं।

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उसके अगले ही दिन पटना के गांधी मैदान में विपक्षी महागठबंधन की रैली हुई। भीड़ और विपक्षी नेताओं के उत्साह को देखकर ऐसा लगने लगा कि सत्तारूढ़ सरकार के प्रति जनता में घोर नाराजगी है और विपक्षी खेमों को घेरने के लिए तरह—तरह की जो योजनाएं सत्तारूढ़ दल द्वारा बनाई गई हैं, वह सफल होने वाली नहीं हैं। ऐसा इसलिए भी कि सत्तारूढ़ ने अपने पक्ष को बिहार में मजबूत बनाने की योजना के तहत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को तोड़कर अपने साथ शामिल कर लिया था, उसका कोई भी लाभ होता दिखाई नहीं देता। कारण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कभी भी सामूहिक नेतृत्वकर्ता नहीं रहे हैं, लेकिन इतने वर्षों तक वे केंदीय मंत्री सहित बार—बार बिहार के मुख्यमंत्री बनते रहे, उसका कारण उनकी निज की योग्यता को ही माना जाता है।

एनडीए द्वारा बिहार में लोकसभा के लिए प्रत्याशियों का नाम न घोषित करना सत्तारूढ़ दल के संशय को ही दिखाता है। वैसे, पिछले लोकसभा चुनाव में एनडीए और जदयू गठबंधन ने बेहतरीन प्रदर्शन किया था, लेकिन इस बार मामला इसलिए गंभीर है कि एनडीए या जदयू का प्रदर्शन वैसा ही रहेगा, इसकी कोई आज कल्पना भी नहीं करता। इसकी वजह यह है कि इस बार उसका सामना महागठबंधन से है, जिसका नेतृत्व बिहार में तेजस्वी यादव, उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और केंद्रीय स्तर पर मल्लिकार्जुन खडगे और राहुल गांधी कर रहे हैं।

इस चुनाव के बाद किसकी सरकार बनेगी, यह तो रिजल्ट आने के बाद पता चलेगा, लेकिन जो कई सर्वेक्षणों से छनकर आई है उसने सत्तारूढ़ भाजपा को बेचैन अवश्य कर दिया है। इसके प्रमाण के रूप में तो भाजपा की पहली सूची ही है, जिसमें साफ हो गया है कि किस तरह से वह फूंक—फूंककर कदम रख रही है। पहली ही लिस्ट में उन लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है, जिन्होंने कभी भाजपा नेता के रूप में पार्टी को दागदार किया। वैसे ही कई तथाकथित नेताओं ने भाजपा का टिकट पाने के बाद भी चुनाव लडने से इनकार कर दिया। यह तो बड़ा ही हास्यास्पद लगता है कि कोरम पूरा करने के लिए राजनीति से दूर—दूर तक कोई वास्ता न रखने वालों को भी टिकट देकर चुनाव लड़ने के लिए आमंत्रित किया जाता है और चुनाव लड़ने वाला प्रत्याशी चुनाव लड़ने से इनकार कर देता है। इसे देश की जनता किस रूप में लेगी, यह तो पता नहीं, लेकिन इतनी बात तो अब लोगों के मन में साफ हो गई है कि इस बार भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ना खतरे से खाली नहीं है। वैसे, प्रधानमंत्री का 'चार सौ पार' का यह दावा कितना सच हो पाता है, यह अभी से कहना अनर्गल प्रलाप है, लेकिन इतनी बात साफ है कि इस बार विपक्ष ने कमर कसकर तय कर लिया है कि यह चुनाव इस पार या उस पार की होगा, क्योंकि उन्हें देश की जनता पर भरोसा है। वे ऐसा इसलिए कहते हैं, क्योंकि मतदाताओं का कहना यह है कि पिछले दस वर्षों में उन्होंने न जाने कितने जुमलों को झेला है, लेकिन अब इस बार वे बदलाव चाहते हैं। वे झूठे जुमलों से आजिज आ चुके हैं।

Nishikant Thakur

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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