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Lok Sabha Election: महिलाएं, युवा और एससी मतदाता डाल सकते हैं चुनाव परिणाम पर असर, क्या हैं उनके मुद्दे?

स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार 2019 के लोकसभा चुनाव में महिलाएं मतदाता पुरुषों से आगे निकल गईं। हालांकि, इस बार के आम चुनावों में महिला वोटर्स मतदान को लेकर ज्यादा उत्साहित नजर नहीं आ रही हैं।
Written by: shrutisrivastva
नई दिल्ली | Updated: May 20, 2024 12:22 IST
lok sabha election  महिलाएं  युवा और एससी मतदाता डाल सकते हैं चुनाव परिणाम पर असर  क्या हैं उनके मुद्दे
Loksabha Election: पांचवे चरण के लिए मतदान की कतार में लगी महिलाएं (Source- PTI)
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लोकसभा चुनाव 2024 की घोषणा से पहले चुनाव आयोग ने बताया था कि पिछले कुछ सालों में देश में महिला मतदाताओं की भागीदारी में बढ़ोत्तरी देखी गई है। ECI के अनुसार, देश में 96.8 करोड़ मतदाता हैं जिनमें पुरुष मतदाताओं की संख्या 49.7 करोड़ है जबकि महिला मतदाताओं की संख्या 47.1 करोड़ है। वहीं, इस साल 21 करोड़ से ज्यादा नौजवान मतदाता हैं। चुनाव परिणामों पर असर डालने वाले तीन फैक्टर्स में से महिलाएं, युवा और अनुसूचित जाति (SC) हैं।

लोकसभा चुनाव में महिलाओं की भूमिका

स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार 2019 के लोकसभा चुनाव में महिलाएं मतदाता पुरुषों से आगे निकल गईं। हालांकि, इस बार के आम चुनावों में महिला वोटर्स मतदान को लेकर ज्यादा उत्साहित नजर नहीं आ रही हैं। कुछ राज्यों को छोड़कर इस बार पुरुषों की तुलना में महिलाएं मतदान को लेकर कम उत्साहित दिख रही हैं। चुनाव आयोग ने अब तक चरण 1 से 3 के लिए पुरुषों और महिलाओं के लिए लोकसभा क्षेत्रवार मतदान प्रतिशत जारी किया है। इस डेटा के विश्लेषण से पता चलता है कि महिलाओं के बीच मतदान में गिरावट पुरुषों की तुलना में थोड़ी अधिक रही है महिलाओं के लिए यह गिरावट 2.7 पॉइंट जबकि पुरुषों के बीच 2.1 पॉइंट रही।

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हालांकि, कुछ राज्यों में महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक संख्या में मतदान कर रही हैं। उदाहरण के लिए, कर्नाटक में 14 लोकसभा सीटों पर दूसरे चरण के मतदान में पांच सीटों पर महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक थी। बिहार में अब तक हुए चार चरणों में पहले चरण में महिलाओं का मतदान पुरुषों की तुलना में 6.21% अधिक था, जो तीसरे चरण में 11.6% हो गया। वास्तव में हिंदी पट्टी के राज्यों में पिछले विधानसभा चुनावों में महिलाओं द्वारा उच्च मतदान को भाजपा के लिए एक लाभ के रूप में देखा गया है, जैसा कि मध्य प्रदेश में भी देखा गया था।

कुछ राज्यों में महिला मतदाता वोटिंग करने में पुरुषों से आगे

2019 में, चरण 1 से 3 तक मतदान करने वाले 282 निर्वाचन क्षेत्रों में से 115 में महिलाओं ने पुरुषों की तुलना में अधिक मतदान किया। इस बार उनका मतदान प्रतिशत केवल 91 निर्वाचन क्षेत्रों में अधिक है, जिसमें यूपी (1 सीट पर ज्यादा), एमपी (1 सीट पर ज्यादा), उत्तराखंड (3 सीट) और केरल (11 सीट)। उत्तराखंड में जहां 2019 में महिलाओं का मतदान पुरुषों की तुलना में 6.8 पॉइंट अधिक था, यूपी में यह 2.9 अंक कम है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात अन्य बड़े राज्य हैं जहां महिलाओं के मतदान प्रतिशत में पुरुषों की तुलना में अधिक गिरावट आई है। अब तक केवल चार प्रमुख राज्यों (असम, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक) में महिलाओं के मतदान में पुरुषों की तुलना में अधिक वृद्धि देखी गई है।

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BJP को विरोधियों की तुलना में महिलाओं से ज्यादा वोट

उत्तर प्रदेश (2022) और मध्य प्रदेश (2023) में हाल के विधानसभा चुनावों में, Axis-MyIndia द्वारा किए गए एग्जिट पोल से पता चला कि भाजपा को अपने विरोधियों की तुलना में महिलाओं से वोटों का एक बड़ा हिस्सा मिला। भाजपा की तरफ झुकाव वाले परिवारों में 73% महिलाओं ने बताया कि वे भी भाजपा के साथ जुड़ी हुई थीं। हालांकि, कांग्रेस की तरफ झुकाव वाले परिवारों में 25% महिलाओं ने खुद को प्रतिद्वंद्वी भाजपा के साथ जोड़ लिया। जिन घरों में किसी एक पार्टी को लेकर स्पष्ट प्राथमिकता नहीं थी, इन घरों में 48% महिलाएं भाजपा की तरफ गईं।

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अन्य दलों पर क्या असर?

2019 में भाजपा द्वारा जीती गई सीटों में मतदान में 2.2 परसेंटेज पॉइंट (PP) की गिरावट हुई है, जो 2019 में INDIA द्वारा जीती गई सीटों में 2.4 पीपी की गिरावट के समान है। उन सीटों पर मतदान प्रतिशत (0.5 प्रतिशत) में मामूली वृद्धि हुई है जो वाईएसआरसीपी, बीजेडी, एआईएमआईएम आदि जैसे गुटनिरपेक्ष दलों के पास थीं।

हम अगर पश्चिम बंगाल, यूपी, बिहार और राजस्थान में विधानसभा क्षेत्रों के अनुसार मतदान पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो प्रत्येक राज्य में शीर्ष दो दलों के विधानसभा क्षेत्रों में कुल मतदान में गिरावट लगभग समान (1 PP से कम) है। इसी तरह, महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक और आंध्र में, शीर्ष दो पार्टियों के कब्जे वाले विधानसभा क्षेत्रों में मतदान में वृद्धि 1 परसेंटेज पॉइंट के भीतर है। मध्य प्रदेश, जहां कांग्रेस के कब्जे वाले विधानसभा क्षेत्रों में मतदान में गिरावट भाजपा के कब्जे वाले क्षेत्रों की तुलना में 2 प्रतिशत कम है, गुजरात जहां कांग्रेस की सीटों बनाम भाजपा की सीटों में 3 प्रतिशत कम गिरावट है और केरल, जहां कांग्रेस की सीटों की तुलना में सीपीआई (एम) की सीटें 2 प्रतिशत कम हैं। यूपी में, राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के कब्जे वाली विधानसभा सीटों पर मतदान में गिरावट राज्य में औसत गिरावट से 4 पीपी अधिक है।

युवाओं के बीच बेरोजगारी है बड़ा मुद्दा

जातिगत आधार से ऊपर उठकर वोटिंग करने वाले मतदाताओं की एक श्रेणी युवाओं की है। युवाओं के बीच बेरोजगारी, विशेष रूप से नौकरियों के लिए सरकारी भर्ती से संबंधित परीक्षा पत्रों का सिलसिलेवार लीक होना युवाओं के बीच गुस्से का एक बड़ा कारण है। बेरोजगारी के मुद्दे से देशभर के युवाओं में आक्रोश है लेकिन क्या यह मुद्दा इन चुनावों में नतीजों को प्रभावित करेगा यह देखना होगा। आंकड़ों की अगर बात करें तो इस बार के आम चुनाव में 1.8 करोड़ मतदाता पहली बार मतदान करेंगे। इंडिया इम्प्लॉइमेंट रिपोर्ट 2024 के मुताबिक, 2022 तक देश में नौकरीशुदा युवाओं का प्रतिशत 37% है, वहीं बेरोजगार युवाओं का प्रतिशत 5% है। इन युवा मतदाताओं में से 35% स्टूडेंट हैं।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की भारत रोजगार रिपोर्ट, 2024 बताती है कि भारत के लगभग 83% बेरोजगार 30 वर्ष से कम आयु के हैं। सीडीएस लोकनीति सर्वे के मुताबिक, बेरोजगारी को सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा मानने वालों का प्रतिशत 11% (2019 के चुनाव बाद सर्वेक्षण में) से बढ़कर 2024 के चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में 27% हो गया।

युवाओं के बीच बढ़ी बेरोजगारी

इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (ILO) और इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन डेवलपमेंट (IHD) द्वारा जारी इंडिया एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट 2024 दर्शाती है कि भारत में बेरोजगारी की समस्या युवाओं, ख़ासकर शिक्षित युवाओं और शहरी क्षेत्रों की महिलाओं में तेज़ी से बढ़ रही है। भारत में शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी बढ़ी है। साल 2000 में सभी बेरोजगारों में शिक्षित युवाओं की हिस्सेदारी 54.2 प्रतिशत थी, जो 2022 में बढ़कर 65.7 प्रतिशत हो गई। शिक्षित (माध्यमिक स्तर या उससे ऊपर) बेरोजगार युवाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी (76.7 प्रतिशत) पुरुषों (62.2 प्रतिशत) की तुलना में ज़्यादा है।

तूल पकड़ता आरक्षण का मुद्दा

चुनाव की शुरुआत में ही आरक्षण का मुद्दा सिर उठाने लगा था। अनंत कुमार हेगड़े और ज्योति मिर्धा सहित भाजपा नेताओं की टिप्पणी कि बड़े बदलाव के लिए एनडीए को प्रचंड बहुमत की आवश्यकता है, को संविधान में बदलाव की योजना के रूप में समझा गया, खासकर एससी के लिए आरक्षण के संबंध में। प्रधानमंत्री सहित भाजपा नेताओं को पहले ही एहसास हो गया था कि यह मुद्दा तूल पकड़ रहा है। सिर्फ पीएम मोदी या राहुल गांधी ही नहीं, भाजपा के वरिष्ठ मंत्री और नेता और कई अनुभवी विपक्षी नेता, सभी अपने राजनीतिक मुद्दे को आगे बढ़ाने के लिए संविधान का सहारा ले रहे हैं।

दलित-आदिवासी कम वेतन वाले अस्थायी नौकरियों में ज्यादा

बढ़ती सामाजिक असमानताओं पर प्रकाश डालते हुए इंडिया एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट 2024 में कहा गया है कि आरक्षण और टारगेटेड पॉलिसी के बावजूद, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अभी भी बेहतर नौकरियों तक पहुंच के मामले में पीछे हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों की काम में भागिदारी तो है लेकिन वे कम वेतन वाले अस्थायी आकस्मिक वेतन वाले काम और अनौपचारिक रोजगार में अधिक लगे हुए हैं।

सरकार और विपक्ष दोनों की दलीलें आरक्षण के इर्द-गिर्द घूमती हैं और जाति विभाजन में असुरक्षाओं और आशंकाओं पर आधारित होती हैं। ऐसे में यह देखना होगा कि क्या यह मुद्दा चुनाव परिणाम पर असर डालता है। महिलाओं, युवाओं और अनुसूचित जातियों को साधने वाला ही 4 जून को दिल्ली में सरकार बनाएगा।

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