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"कट्टर हिंदू नहीं थे केके नायर", फिर नेहरू के आदेश के बावजूद बाबरी से क्यों नहीं हटाई रामलला की मूर्ति?

केके नायर के भतीजे केके पद्मनाभ पिल्लई याद करते हैं, 'नायर कट्टर हिंदू नहीं थे। वह न्याय के लिए खड़ा होना चाहते थे। लेकिन...'
Written by: शाजु फिलिप | Edited By: Ankit Raj
नई दिल्ली | Updated: January 23, 2024 10:56 IST
 कट्टर हिंदू नहीं थे केके नायर   फिर नेहरू के आदेश के बावजूद बाबरी से क्यों नहीं हटाई रामलला की मूर्ति
केके नायर ने स्वर्ण पदक के साथ ऑनर्स की डिग्री प्राप्त की थी। (PC- X)
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अयोध्या में डीएम (District Magistrate) रहे केके नायर को लोग "नायर साहब" के रूप में याद करते हैं। केरल में जन्मे कदमकलाथिल करुणाकरण नायर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू आदेश की अवहेलना करते हुए, मस्जिद से रामलला (राम का बाल रूप) की मूर्ति से हटाने के इनकार कर दिया था। इसके परिणामस्वरूप उन्हें निलंबित कर दिया गया था। उन्होंने फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की।

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केके नायर को श्रद्धालु "राम जन्मभूमि हिंदू पुनरुद्धार आंदोलन शुरू करने वाले व्यक्ति" के रूप में वर्णित करते हैं। केरल के अलाप्पुझा में कुट्टनाड के मूल निवासी नायर को मस्जिद में मूर्ति रखे जाने से कुछ महीने पहले जून 1949 में फैजाबाद का जिला मजिस्ट्रेट नियुक्त किया गया था।

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गोविंद बल्लभ पंत के नेतृत्व वाली यूपी सरकार और बाद में प्रधानमंत्री नेहरू ने इस मुद्दे में हस्तक्षेप किया और नायर से मूर्ति हटाने के लिए कहा, लेकिन अड़ियल आईसीएस अधिकारी ने निर्देशों का पालन करने से इनकार कर दिया। निलंबन के बाद सेवा में बहाल होने के लिए नायर को कानूनी लड़ाई से गुजरना पड़ा। उन्होंने केस जीत लिया, लेकिन नौकरी छोड़ दी, क्योंकि तब तक उन्होंने कानून की डिग्री हासिल कर ली थी।

इसके बाद नायर ने उत्तर प्रदेश के बहराईच लोकसभा क्षेत्र से जनसंघ के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और 1967 में चौथी लोकसभा के सदस्य बने। इससे पहले, नायर की पत्नी शकुंतला ने 1952 में कैसरगंज लोकसभा से जनसंघ (अब भाजपा) के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था और जीत हासिल की थी। बाद में वह यूपी विधानसभा की सदस्य और मंत्री बनीं।

स्कूल में टीचर ने बदल दिया था नाम

अलाप्पुझा में नायर के भतीजे केके पद्मनाभ पिल्लई के पास परिवार के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति की यादें हैं। 78 वर्षीय चार्टर्ड अकाउंटेंट पिल्लई ने कहा, "अयोध्या के लोगों के लिए, वह अभी भी नायर साहब हैं।" पिल्लई का बेटा सुनील पिल्लई विशेष आमंत्रित व्यक्ति के रूप में प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल हुए थे।

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नायर एक किसान कंदमकलाथिल शंकर पणिक्कर और पार्वती अम्मा की छह संतानों में से एक थे। पणिक्कर अपने बच्चों - चार लड़के और दो लड़कियों - की पढ़ाई-लिखाई पर पूरा ध्यान दिया। 1907 में जन्मे नायर के स्कूल के दिन अलाप्पुझा में बीते।

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पद्मनाभ पिल्लई बताते हैं, "मेरे पिता राघवन पिल्लई नायर को कैनाकारी (जहां वे रहते थे) से एक छोटी नाव चलाकर स्कूल ले जाते थे। दरअसल, उनका नाम करुणाकरण पिल्लई था। लेकिन स्कूल में उस नाम का एक और छात्र था। इसलिए, शिक्षक ने उनका नाम पिल्लई से बदलकर नायर रख दिया। हमारे परिवार में उन्हें (नायर) छोड़कर बाकी सभी का सरनेम नाम पिल्लई है।"

गोल्ड मेडलिस्ट नायर ने ब्रिटेन से ली उच्च शिक्षा

स्कूली शिक्षा समाप्त होने के बाद, नायर और उनके बड़े भाई, राघवन तिरुवनंतपुरम चले गए, जहां उनके सबसे बड़े भाई गोपाल पिल्लई पहले से ही न्यायिक सेवा में थे।

पिल्लई याद करते हैं, "गोपाल चाहते थे कि उनके भाई पढ़ाई जारी रखें। नायर ने स्वर्ण पदक के साथ ऑनर्स की डिग्री प्राप्त की। जब नायर 20 वर्ष के थे, तब एक कुलीन परिवार से विवाह का प्रस्ताव आया। शादी के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए ब्रिटेन चले गये। गणित उनका पसंदीदा विषय था। वह 21 साल की उम्र में आईसीएस बन गए और उनकी पोस्टिंग संयुक्त प्रांत (बाद में उत्तर प्रदेश) में हुई।"

बच्चे की हो गई मौत, पत्नी से हुआ तलाक

जब नायर सिविल सर्विस में शामिल हुए तो उन्हें अपने निजी जीवन में उथल-पुथल का सामना करना पड़ा। उनकी पत्नी सरसम्मा, जो तिरुवनंतपुरम की मूल निवासी थीं, अपने माता-पिता के आसपास रहना चाहती थीं और संयुक्त प्रांत में स्थानांतरित होने के लिए तैयार नहीं थीं। दंपति का एक बच्चा था, सुधाकरन, जिसकी बाद में मृत्यु हो गई। आख़िरकार उनका तलाक हो गया। 1946 में नायर ने शकुंतला से शादी की, जो यूपी-नेपाल सीमा के एक क्षत्रिय परिवार से थीं। उनका एक बेटा, मार्तंड विक्रमन नायर था, जो बाद में भारतीय राजस्व सेवा में शामिल हो गया।

"कट्टर हिंदू नहीं थे"

पिल्लई, जो 1970 के दशक की शुरुआत में लखनऊ में नायर के साथ रहे थे, याद करते हैं, "नायर कट्टर हिंदू नहीं थे। वह न्याय के लिए खड़ा होना चाहते थे। लेकिन वह हिंदू संन्यासियों को वहां से बेदखल करके और मूर्ति को हटाकर उनके नरसंहार का कारण नहीं बनना चाहते थे। वह संन्यासियों के खून की कीमत पर नौकरी नहीं चाहते थे।"

पिल्लई आगे बताते हैं, "जब नायर को निलंबित किया गया तब वह आईसीएस में 21 साल के करियर के साथ 42 वर्ष के थे। वह सेवा में बने रहने के इच्छुक नहीं थे, लेकिन उन्होंने इसके लिए कानूनी रूप से लड़ने का फैसला किया। वह यह साबित करना चाहते थे कि उनका निर्णय सही था और राजनीतिक नेतृत्व ग़लत था। निलंबित नायर ने कानून की पढ़ाई की। जब अदालत ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया तो नायर ने नौकरी छोड़ने का फैसला किया।"

इलाहाबाद में वकील भी रहे नायर

नायर ने इलाहाबाद में एक वकील के रूप में प्रैक्टिस किया और जनसंघ में सक्रिय भूमिका निभाई। 1962 में वे लोकसभा के सदस्य बने। उनकी पत्नी शकुंतला नायर कैसरगंज सीट से तीन बार (1952, 1967 और 1971) लोकसभा सदस्य रहीं।

यह दंपति 1967 में जनसंघ सम्मेलन के लिए कोझिकोड भी गया था। नायर की केरल की आखिरी यात्रा उनकी मृत्यु से एक साल पहले 1976 में हुई थी। वह मलप्पुरम के कोट्टक्कल में आर्य वैद्य शाला में आयुर्वेदिक उपचार के लिए आए थे। अलाप्पुझा में परिवार ने नायर के नाम पर एक ट्रस्ट स्थापित किया है। पिल्लई कहते हैं, "वह केरल में एक गुमनाम नायक हैं। अब, विहिप ट्रस्ट की गतिविधियों को आगे बढ़ाने में मदद के लिए आगे आई है।" बीते शनिवार को केरल हिंदू ऐक्य वेदी ने नायर के लिए एक स्मरणोत्सव बैठक आयोजित की थी।

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