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क्या धर्म के नाम पर राजनीति बढ़ती बेरोजगारी को छुपाने की साजिश है?

जब राजनीति का इस्तेमाल एक धर्म या जाति के लोगों को दूसरे धर्म या जाति के लोगों के खिलाफ खड़ा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। तो अक्सर वो जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास होता है और इसीलिए ये राजनीति आम जनता के विरोध में है।
Written by: जनसत्ता ऑनलाइन
नई दिल्ली | Updated: January 17, 2024 10:51 IST
क्या धर्म के नाम पर राजनीति बढ़ती बेरोजगारी को छुपाने की साजिश है
प्रधानमंत्री मोदी ने 16 जनवरी को केरल के गुरुवयूर मंदिर में पूजा की और रोड शो किया। (PC- X/@BJP4India)
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Ritansh Azad

आज मोदी सरकार 22 जनवरी को होने वाले प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम की तैयारों में लगी है। सभी मुख्यधारा के न्यूज़ चैनल और अखबार भी सिर्फ राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम की बात कर रहे हैं। लेकिन हमारा कहना है कि ये कार्यक्रम धार्मिक नहीं है, ये शुद्ध रूप से राजनीतिक है। इसे देश का सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर बीजेपी आने वाले दिनों में लोकसभा चुनावों जीतने के प्रयास में है। यही बात सभी मुख्य विपक्षी दल भी कह रहे हैं।

भारतीय संविधान सभी धर्मों के लोगों को अपना धर्म मानने का अधिकार देता है और यह आपका निजी मामला है। इसीलिए इसके राजनीतिक इस्तेमाल पर हमारा एतराज़ है। राजनीति का मुख्य काम रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य प्रदान करना, तथा जनता के लिए जीने के बेहतर हालात पैदा करना होना चाहिए। जब राजनीति का इस्तेमाल एक धर्म या जाति के लोगों को दूसरे धर्म या जाति के लोगों के खिलाफ खड़ा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। तो अक्सर वो जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास होता है और इसीलिए ये राजनीति आम जनता के विरोध में है। जैसे आज धर्म के नाम पर की जा रही राजनीति बेरोज़गारी जैसे बड़े मुद्दे पर पर्दा डाल रही है। हमारी कोशिश है कि इस लेख के ज़रिये इस मुद्दे पर से पर्दा हटाया जाए।

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दोस्तों करीब 10 साल पहले जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में थे तो उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान सत्ता में आने पर युवाओं को बड़ी संख्या में रोज़गार देने का वादा किया था। आज देश में लगातार बढ़ रही बेरोज़गारी देखकर लगता है कि वो बात भी एक जुमला ही थी। जून 2019 में खुद केंद्र सरकार के श्रम विभाग ने ये माना कि साल 2017-18 में देश में बेरोज़गारी दर 45 सालों में सबसे ज़्यादा थी।

वरिष्ठ अर्थशास्त्री और जेएनयू में प्रोफेसर रहे प्रभात पटनायक ने 21 अप्रैल 2019 को “Unemployment, Poverty and the Modi Years” नामक एक लेख लिखा। इसमें वे लिखते हैं “मोदी के सत्ता में आने से पहले की तुलना में मोदी सरकार के वर्षों में बेरोज़गारी दर बढ़ी है। जब हम 2014 को अपना आधार वर्ष मानते हैं; तो हम पाते हैं कि प्रत्येक अगले वर्ष में, जिसके लिए हमारे पास पूरा डेटा है, न केवल कामकाजी आबादी के लिए, बल्कि पूरी आबादी के लिए प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता, 2014 की तुलना में कम थी। जिसका अर्थ है कि प्रत्येक अगले वर्ष में आय रोज़गार की स्थिति स्पष्ट रूप से बदतर होती रही है।’’

इसी तरह अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट (centre for sustainable employment ) की स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2023 रिपोर्ट के अनुसार 2021-22 में भारत के 25 साल से कम उम्र के 42% से ज़्यादा ग्रेजुएट युवा बेरोज़गार थे। एक बहुत ज़रूरी बात जो रिपोर्ट कहती है वो ये कि GDP में बढ़ौतरी से बेरोज़गारी कम नहीं हुई है। ये बात सरकार के उन दावों की हवा निकाल देती है जो कहते हैँ कि सिर्फ जीडीपी में वृद्धि से बेरोज़गारी की समस्या दूर हो जाएगी।

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अक्टूबर 2023 के लिए दिए गए Centre for Monitoring Indian Economy (CMIE) के आंकड़े बताते हैं कि देश में बेरोज़गारी दर 10.05% थी; ग्रामीण बेरोज़गारी दर 10.82% थी जबकि शहरी बेरोजगारी दर 8.44% थी। यह बेरोज़गारी दर मई 2021 के बाद से सबसे अधिक थी। Centre for Monitoring Indian Economy (CMIE) की ही एक अन्य रिपोर्ट ये भी बताती है कि “2022-23 में युवाओं के बीच बेरोज़गारी दर 45.4% रही। यह भारत की बेरोज़गारी दर 7.5 प्रतिशत से छह गुना अधिक है। इसके अलावा, हाल के दिनों में इसमें भयंकर बढ़ोतरी हुई है और 2017-18 के बाद इसमें 23% से अधिक अंक की वृद्धि दर्ज की गई है।’’ ये आँकड़े आज की बढ़ती बेरोज़गारी का भयानक मंज़र दिखा रहे हैं!

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अगस्त 2023 में लोकनीति- CSDS के द्वारा छापी गई रिपोर्ट बताती है कि 15 से 34 साल के 36% युवाओं के हिसाब से बेरोज़गारी देश की सबसे बड़ी समस्या है । इन युवाओं में से 16% ने गरीबी और 13% युवाओं ने बढ़ती महंगाई को देश की सबसे बड़ी समस्या बताया। लोकनीति- CSDS के मुताबिक 2016 में उन्होंने इसी तरह का सर्वे कराया था और तब के मुकाबले अब 18% ज़्यादा युवा बेरोज़गारी को सबसे बड़ा मुद्दा बता रहे हैं। ये सर्वे 18 राज्यों में किया गया और इन युवाओं में ग्रेजुएट और उससे ज़्यादा पढे 40% युवाओं ने बेरोज़गारी के मुद्दे को ही सबसे बड़ा मुद्दा बताया था। शिक्षित युवाओं में इस मुद्दे के असर को ये रिपोर्ट चिन्हित करती है।

लेकिन Periodic Labor Force survey(PLFS) नामक सरकारी रिपोर्ट जो कि अक्टूबर 2023 में प्रकाशित हुई, उसके मुताबिक श्रमिक जनसंख्या अनुपात में वृद्धि हुई है और साथ ही बेरोज़गारी दर में कमी आई है। लेकिन जानकारों की माने तो ये आँकड़े सत्य को छुपा रहे हैं। इस रिपोर्ट का विश्लेषण करते हुए वरिष्ठ पत्रकार सुबोध वर्मा का 31 अक्टूबर, 2023 को एक लेख छपा।

इसमें वे लिखते हैं “Periodic Labor Force survey रिपोर्ट में डेटा के विवरण से पता चलता है कि यह आशावाद गलत है। रिपोर्ट एक वास्तविकता को दर्शाती है विशेष रूप से महिलाओं में बिना वेतन की मज़दूरी(unpaid labor) काफी बढ़ गई है। अनौपचारिक काम (informal work) बढ़ गया है, कृषि तेज़ी से काम का मुख्य आधार बन रही है और कम कमाई वाला स्व-रोज़गार काम का मुख्य ज़रिया बन रहा है।’’

वे आगे लिखते हैं “2018-19 में सभी नौकरी कर रहे व्यक्तियों में से स्व-रोज़गार करने वाले 52% थे, नियमित वेतन या वेतन अर्जित करने वाले 24% थे और आकस्मिक श्रमिक 24% थे। 2022-23 तक, स्व-रोज़गार वालों की हिस्सेदारी बढ़कर 57% हो गई थी, जबकि नियमित वेतन पाने वालों और आकस्मिक श्रम दोनों की हिस्सेदारी में गिरावट आई थी। स्व-रोज़गार वाले वे लोग हैं जो कृषि से लेकर छोटी दुकानदारी, रिक्शा चालक, मरम्मत करने और विभिन्न प्रकार के काम कर रहे हैं ।’’

वे आगे लिखते हैं “यह पहला संकेत है कि बढ़ा हुआ रोज़गार जीवित रहने के लिए किसी भी तरह का काम करने के लिए लोगों की बढ़ती हताश को दर्शा रहा है।’’

वरिष्ठ पत्रकार के एम वेणु इसी रिपोर्ट पर 10 नवंबर 2023 को अपने लेख में लिखते हैं “अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा के अनुसार, स्व-रोज़गार श्रेणी में बिना वेतन के काम कर रहे मज़दूरों (unpaid workers) की संख्या 2017-18 में लगभग 4 करोड़ से बढ़कर 2022-23 में 9 करोड़ 50 लाख हो गई है। मेहरोत्रा का कहना है कि ऐसे बिना वेतन के काम कर रहे मज़दूरों (unpaid workers) को अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (International Labor Organization) द्वारा निर्धारित पद्धति के अनुसार नौकरी में लगा हुआ(employed) नहीं माना जाता है।’’

एक तरफ बेरोज़गारी इतनी बड़ी समस्या बनी हुई है तो दूसरी तरफ खुद केन्द्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने मार्च 2023 में संसद में एक जवाब देते खुद माना कि केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों में करीब 10 लाख पद खाली हैं! इसके अलावा लगातार सारे देश में सरकारी पेपर लीक के मामले सामने आते रहे हैं, जिनके खिलाफ लगातार युवाओं ने आंदोलन किये हैं। इस पूरे मंज़र को ध्यान से देखने पर आपको आज के युवाओं की हताश का अंदाज़ा हो जाएगा!

रोज़गारों के अवसरों में बढ़ौतरी न होने के मुद्दे पर अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक 12 नवंबर 2023 को छपे अपने लेख में लिखते हैं “रोज़गार के अवसरों में पूर्ण ठहराव का कारण यह है कि पिछले कुछ वर्षों में विकास की प्रकृति पहले की तुलना में बदल गई है, जिससे विकास कम रोजगार पैदा करने वाला हो गया है। छोटा और लघु उत्पादन क्षेत्र, पहले से ही में नव-उदारवाद के कारण प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना कर रहा था, क्योंकि इस नीति के कारण इस क्षेत्र से राज्य ने अपना समर्थन वापस ले लिया था और इसे अप्रतिबंधित विदेशी प्रतिस्पर्धा के लिए खुला छोड़ दिया था। इसके ऊपर से मोदी सरकार के डिमोनेटाइज़ेशन और GST टैक्स लागू करने के फैसले से इसकी मुसीबतें और बढ़ा दी थीं।

इन सबके अलावा, कोविड-19 के दौरान सरकार द्वारा लिए गए कठोर लॉकडाउन का इस क्षेत्र पर और भी विनाशकारी प्रभाव पड़ा। यह इन सभी कारकों के कारण उत्पन्न संकट से उबर नहीं पाया है। कोविड के बाद की अवधि में अर्थव्यवस्था में विकास के पुनरुत्थान ने इस क्षेत्र(लघु उद्योग) को पीछे छोड़ दिया है, जो अर्थव्यवस्था का सबसे अधिक रोजगार पैदा करने वाला क्षेत्र है और वो अभी भी संकट से जूझ रहा है।’’

सरकारी विभागों में पदों को न भरे जाने के विषय वे लिखते हैं “विडम्बना यह है कि रोज़गार को बढ़ावा देने के नाम पर पूंजीपतियों को कर रियायतें सौंपते समय, सरकार सरकारी क्षेत्र में मौजूद बड़ी संख्या में खाली पदों को भरने के लिए आवश्यक खर्च नहीं करती है। इसका प्रत्यक्ष कारण राजकोषीय बाधा(fiscal constraint) है; लेकिन राजकोषीय बाधा(fiscal constraint) अन्य कारणों के अलावा, पूंजीपतियों को दी गई कर रियायतों के कारण ही उत्पन्न होती है।’’

इन सभी बातों से ये साफ हो जाता है कि धार्मिक आधार पर खड़े किये जा रहे भावनात्मक मुद्दे तथा हिन्दू मुसलमान के बुनियाद झगड़े, बेरोज़गारी की भयानक मार को छुपाने की साज़िश है। हमारी युवाओं से यही अपील है कि धर्म का आवरण ओढ़े इस राजनीति को पहचानिए और बेरोज़गारी के खिलाफ आवाज़ उठाइए।

(लेखक सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता हैं)

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