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कथनी और करनी का भेद खोलता इलेक्टोरल बॉन्ड

कहां सरकार बनने से पहले इसी सत्तारूढ़ दल द्वारा कहा जा रहा था कि जो काला धन भारतीयों ने विदेशों में छुपा रखा गया है, उसे देश में लाकर प्रत्येक व्यक्ति के खाते में जमा कराया जाएगा, उसके लिए अब वही काला धन लाकर उससे चुनाव लड़ा जा रहा है।
Written by: निशिकांत ठाकुर
नई दिल्ली | Updated: March 29, 2024 12:03 IST
कथनी और करनी का भेद खोलता इलेक्टोरल बॉन्ड
चुनावी बॉन्ड और भाजपा (PC- IE)
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कहते हैं, यह सारी दुनिया में सदा से ऐसा होता रहा है। राजनीतिज्ञों को सिर्फ सत्ता का मोह होता है; न व्यवस्था से मतलब है, न अव्यवस्था से। हां, जब वह व्यवस्था का मालिक नहीं होते, जब खुद के हाथ में ताकत नहीं होती, तब वे कहते हैं कि सब गलत है, इसलिए क्रांति जरूरी है। लेकिन, सत्ता में लौटते ही उन्हें क्रांति की जरूरत बिल्कुल नहीं पड़ती, क्योंकि क्रांति का काम पूरा हो गया। अब जो भी क्रांति की बात करे, वह दुश्मन है। साथ ही जो क्रांति की बात कर रहा है, उसे भी क्रांति से कुछ लेना-देना नहीं है। यह बड़ी अदभुत घटना है, जो दुनिया में रोज घटती है, फिर भी आदमी संभालता नहीं। राजनीतिज्ञ के सत्ता में आते ही सभी क्रांतिकारी उसके धुरविरोधी हो जाते हैं, जबकि सत्ता से हटते ही राजनीतिज्ञ क्रांतिकारी हो जाते हैं। सत्ता में बड़ा जादू है। यह तो एक बात हुई। दूसरी बात यह हुई कि जब राजा अयोग्य होता है और वह शासन व्यवस्था कायम करने में असमर्थ होता है, तो उसे अपने पिछले शासक पर आरोप लगाकर, उसके ऊपर सारा ठीकरा फोड़कर अपनी अयोग्यता को छुपा लिया जाना चाहिए।

सच में, वर्षों से ऐसा ही तो हो रहा है। केवल पिछली सरकार को कोसने, उसे नाकारा साबित करने में आज लगभग दस वर्ष हो गए। पिछले कुछ दिनों से जो घमासान देशभर में मचा है, उसके लिए कुछ लोगों का कहना है कि यह देश को फिर से आपातकाल की घोषणा को याद दिला रहा है। लेकिन, वह तो घोषित आपातकाल था, पर आज जिस तरह से विपक्षियों को उठा—उठाकर जेल में डाला जा रहा है, उसमें कोई फर्क नजर नहीं आ रहा है। उस घोषित आपातकाल में तो यह हुआ था कि सारे विपक्षी रातोंरात उठाकर जेल में बंद कर दिए गए, जबकि आज तो जो हो रहा है, वह सबको मालूम है कि चुन—चुन कर विपक्षियों पर पहले आरोप लगाया जाता है, फिर ईडी का समन भेजकर हाजिर होने का फरमान जारी किया जाता है। जब विपक्षी बेचैन हो उठता है, तो उन्हें पूछताछ के नाम पर जेल में बंद कर दिया जाता है। चले मुकदमा, कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन तब तक वे नेता इतने टूट जाते हैं, उनका भविष्य इतना अंधकारमय लगने लगता है कि वे डरकर सरकारी गवाह बनकर दूसरे को फसाने में लग जाते हैं।

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अभी हाल के दिनों में अपने राज्य में कार्यरत दो मुख्यमंत्रियों को अवैध तरीके से धन उगाही करने के जुर्म में जेल में ठूंस दिया गया है। अब आप अपने को निरपराध होने के लिए तर्क देते रहिए, कानूनी तौर—तरीकों में उलझकर अपनी जिंदगी को नर्क में बदल डालिए। हो सकता है, साल दो साल में अदालत आपको बेगुनाह मान ले, लेकिन जितनी आपकी बदनामी समाज के अंदर हो चुकी है, उसमें अपने को निरपराध साबित करने में पूरा समय जाया कर दीजिए। हो सकता है कि तब समाज समझ पाएगा कि आप निर्दोष हैं। लेकिन, उसका क्या आपके हाथ से समय तो निकल चुका होगा। आप सफाई देते रहिए। राजनीति बड़ी कठिन हो गई है, लेकिन हां, राजनीति अब वैसी कहां रही जिसमें अपने को समर्पित करना मान लिया जाता था, अब तो आप भी राजनीति व्यावसायिक नजरिये से करते हैं, फिर जेल जाने का डर क्यों होता है। दूसरे शब्दों में कहें, तो आप तो देश को लूटने ही आए थे और लुटेरा जब पकड़ा जाता है, तो उसका हश्र यही तो होगा।

अभी पूरा देश इस मामले में उलझ गया है कि यह इलेक्ट्रोरल बॉण्ड है क्या? यदि यह काले धन को बंद करने का कोई नायब तरीका है या था, तो ऐसे राजनीतिज्ञों और ऐसे विचार को लाने वाले कितने बुद्धिमान थे। लेकिन, धन्यवाद सुप्रीम कोर्ट का कि उसने वही किया, जो एक जनतांत्रिक देश के सर्वोच्च न्यायालय को करना चाहिए। देश के संवैधानिक पीठ ने इस तथाकथित इलेक्ट्रोरल बॉण्ड को असंवैधानिक करार दिया। आज देश में इसी को लेकर हड़कंप मचा है कि आखिर इस चोरी को सर्वोच्च न्यायालय ने जगउजागर क्यों किया? इसे असंवैधानिक क्यों माना? अब इस मामले में सत्तारूढ़ द्वारा केवल कुतर्क ही गढ़ रहा है और इस घन को वैध माना जा रहा है, रिश्वत नहीं। बेशर्मी तो तब दिखती है, जब सत्तारूढ़ दल के नेता यह कहते हैं कि इस काले धन को वैध करने के लिए यह बॉण्ड लाया गया था। जनता को मूर्ख बनाने के इस तरीके को क्या कहा जाए। इस असंवैधानिक बॉण्ड का हल क्या निकलेगा, यह तो सांप के मुंह से निवाला निकलने जैसा है, लेकिन जिस तरह से प्रभावशाली कदम सुप्रीम कोर्ट ने निकाला है, इस मुद्दे पर फिर से एक कठिन निर्णय उसे देना पड़ेगा।

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इसी भारत्तवर्ष में वह दिन सदैव याद किया जाएगा, जब पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक झटका दिया था। आज भी देश की जनता सुप्रीम कोर्ट से इसी तरह के आदेश की अपेक्षा करती है, क्योंकि अब यह बात और वर्तमान सरकार से पंगा लेना आम आदमी के बस की बात नहीं रही है। जनता लगभग हार गई है और उसका विश्वास केवल संविधान की रक्षा के लिए गठित संवैधानिक प्रमुख सर्वोच्च न्यायालय से है। ऐसा इसलिए, क्योंकि जिस तरह से साफ कहा जा रहा है कि काले धन को सफेद करने के लिए इस बॉण्ड को लाया गया है, यह तो हद हो गई। कहां सरकार बनने से पहले उसी सत्तारूढ़ दल द्वारा कहा जा रहा था कि जो काला धन भारतीयों ने विदेशों में छुपा रखा गया है, उसे देश में लाकर प्रत्येक व्यक्ति के खाते में जमा कराया जाएगा, उसके लिए अब वही काला धन लाकर उससे चुनाव लड़ा जा रहा है। क्या हमारे देश की जनता इतनी मूर्ख है कि उसे अपने हिसाब से जब चाहो मूर्ख या गुणी बना डालो? यह सारी बातें यहीं आकर रुक जाती हैं कि हमारे देश में शिक्षा का प्रतिशत जबतक सौ फीसदी नहीं हो जाएगा? राजनीतिज्ञों द्वारा इसी तरह हम ठगी के शिकार होते रहेंगे। शिक्षा का यह कोरम कब तक पूरा होगा, यह तो नहीं मालूम, लेकिन जिस दिन देश पूरी तरह शिक्षित हो जाएगा, उसी दिन से ये राजनीतिज्ञ ठगी करना भूल जाएंगे और उसी दिन से देश का विकास होने लगेगा।

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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और
राजनीतिक विश्लेषक हैं।
यहां व्‍यक्‍त व‍िचार उनके न‍िजी हैं।)

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