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इस ल‍िस्‍ट के बाद बीजेपी कैसे कह सकती है- हमारे यहां पर‍िवारवाद नहीं? 

कर्नाटक में कांग्रेस, बीजेपी और जेडीएस तीनों ने ही अपने नेताओं के परिजनों को टिकट दिया है। यहां नेताओं के बेटे-बेटियां, पत्नियां, बहन-भाई और अन्य रिश्तेदार चुनाव लड़ रहे हैं।
Written by: Pawan Upreti
नई दिल्ली | Updated: April 05, 2024 10:52 IST
इस ल‍िस्‍ट के बाद बीजेपी कैसे कह सकती है  हमारे यहां पर‍िवारवाद नहीं  
कर्नाटक की राजनीति में परिवारवाद- राधाकृष्ण (ऊपर) को कांग्रेस ने, जबकि एचडी कुमारस्वामी (बाएं) को जेडीएस ने और बीवाई राघवेंद्र (दाएं) को बीजेपी ने चुनाव मैदान में उतारा है।
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भारतीय राजनीति में परिवारवाद को लेकर चल रही लंबी बहस लोकसभा चुनाव के दौरान तेज हुई है। कर्नाटक के तीनों प्रमुख दल- कांग्रेस, बीजेपी और जेडीएस ने अपने नेताओं के परिवार के लोगों को टिकट दिया है। जब भी किसी राजनीतिक परिवार के बेटे-बेटियों या अन्य रिश्तेदारों को टिकट मिलता है तो राजनीति में परिवारवाद की बहस हर बार एक नए रूप में जिंदा होकर सामने आती है।

बेटे-बेटियां, बहन-भाई लड़ रहे चुनाव

कर्नाटक में कांग्रेस, बीजेपी और जेडीएस तीनों ही परिवारवाद की राजनीति करने में नहीं हिचकते। इन तीनों दलों ने लगभग दो दर्जन ऐसे उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा है जो राज्य के प्रभावशाली राजनीतिक घरानों से संबंध रखते हैं। इन राजनीतिक घरानों के बेटे-बेटियां, पत्नियां, बहन-भाई और अन्य रिश्तेदार चुनाव लड़ रहे हैं।

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सबसे पहले राज्य में सरकार चला रही कांग्रेस की बात करते हैं। कांग्रेस की ओर से राज्यसभा के पूर्व उपसभापति रहमान खान के बेटे मंसूर अली खान, राज्य की सरकार में सामाजिक कल्याण मंत्री एचसी महादेवप्पा के बेटे सुनील बोस को मैदान में उतारा गया है। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एमवी वेंकटप्पा के बेटे प्रोफेसर राजीव गौड़ा को भी कांग्रेस ने टिकट दिया है।

इसके अलावा राज्य सरकार में महिला और बाल विकास मंत्री लक्ष्मी हेब्बालकर के बेटे मृणाल हेब्बालकर और परिवहन मंत्री रामालिंगा रेड्डी की बेटी सौम्या रेड्डी को पार्टी ने चुनाव लड़ने का मौका दिया है।

कर्नाटक कांग्रेस में परिवारवाद की राजनीति पर बात यहीं पर आकर खत्म नहीं होती। पूर्व मुख्यमंत्री एस. बंगारप्पा की बेटी गीता शिवराज कुमार, लोक निर्माण विभाग के मंत्री सतीश जरकिहोली की बेटी प्रियंका, वन मंत्री ईश्वर खंडारे के बेटे सागर खंडारे और कपड़ा मंत्री शिवानंद पाटिल की बेटी सम्युक्ता के अलावा बेंगलुरु के पूर्व मेयर केवी विजय कुमार के बेटे केवी गौतम को भी कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी बनाया है।

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बीजेपी भी पीछे नहीं 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर परिवारवाद को लेकर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों पर हमला बोलते रहते हैं लेकिन कर्नाटक बीजेपी ने भी बड़ी संख्या में नेताओं के रिश्तेदारों को टिकट दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री एसआर बोम्मई के बेटे बसवराज बोम्मई, पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के बेटे और कर्नाटक बीजेपी के अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र के भाई बीवाई राघवेंद्र, पूर्व सांसद श्रीकांता दत्त नरसिम्हाराजा वडियार के दत्तक पुत्र यदुवीर केसी वडियार के अलावा चिकबल्लापुर जिला पंचायत के पूर्व अध्यक्ष के बेटे के. सुधाकर को भी पार्टी ने टिकट दिया है।

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बेटे और पोते को टिकट

कर्नाटक में बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही जेडीएस ने पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के बेटे और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी को उम्मीदवार बनाया है। कर्नाटक सरकार के पूर्व मंत्री एचडी रेवन्ना के बेटे और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के पोते प्रज्वल रेवन्ना भी जेडीएस के टिकट पर अपनी सियासी किस्मत आजमा रहे हैं।

पत्नियों को उतारा मैदान में 

इस सबके अलावा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के दामाद राधा कृष्णा जबकि पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के दामाद सीएन मंजूनाथ भी चुनाव मैदान में हैं। राज्य सरकार के मंत्री एसएस मल्लिकार्जुन की पत्नी प्रभा मल्लिकार्जुन कांग्रेस के टिकट पर और पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद जीएम सिद्धेश्वर की पत्नी गायत्री सिद्धेश्वर बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं।

कर्नाटक की सियासत में बड़ा नाम और राज्य सरकार के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के भाई डीके सुरेश और कोप्पल से विधायक राघवेंद्र हितनाल के भाई राजशेखर हितनाल भी चुनाव मैदान में हैं।

भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और साउथ बेंगलुरु से चुनाव मैदान में उतरे तेजस्वी सूर्या बीजेपी के विधायक रवि सुब्रह्मण्य के रिश्तेदार हैं।

परिवारवाद खत्म होने की बात सिर्फ जुमला 

चुनाव मैदान में उतरे इतने सारे नामों को देखने के बाद यह साफ पता चलता है कि राजनीति में परिवारवाद खत्म होने की बात सिर्फ एक जुमला है क्योंकि तमाम राजनीतिक दलों में परिवारवाद हावी है। बीजेपी, जो दूसरे राजनीतिक दलों पर परिवारवाद को लेकर टिप्पणी करती है उसके यहां भी नेताओं के तमाम रिश्तेदार चुनाव लड़ रहे हैं।

ऐसे में राजनीति से परिवारवाद खत्म होने की बात करना बेईमानी ही होगा क्योंकि राजनीतिक दलों के अंदर यह इच्छा शक्ति नहीं दिखाई देती कि वह परिवारवाद को खत्म करना चाहते हैं। यह कहा जा सकता है कि राजनीतिक दलों के लिए फैमिली फर्स्ट ही जरूरी है।

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