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वैदिक काल में रखी गई स्त्री अधिकारों की नींव

Book Review: डॉ. सांत्वना श्रीकांत अपनी किताब ‘भारतीय नारी स्थति और गति’ में लिखती हैं कि वेदों में स्त्री के लिए उषा शब्द का प्रयोग किया गया है। यह उषा ही है जो सूर्य के आगे चलती है। सूर्य पुरुष का ही प्रतीक है। यह कथन सिद्ध करता है कि स्त्री पुरुष के पीछे नहीं चलती थी।
Written by: संजय स्वतंत्र
नई दिल्ली | March 29, 2024 10:42 IST
वैदिक काल में रखी गई स्त्री अधिकारों की नींव
प्रतीकात्मक तस्वीर (PC- Adobe Firefly)
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उपनिषदों में इस बात का उल्लेख किया गया है कि स्त्री-पुरुष एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं। कहा तो ये भी गया है कि ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना के लिए अपने शरीर के दो भाग किए। एक को स्त्री बनाया और दूसरे को पुरुष। इन दोनों के समागम से धरती पर मनुष्यों की उत्पत्ति हुई। वैदिक काल में स्त्रियों के अधिकार पुरुषों के समान थे। जो परवर्ती युग में धीरे-धीरे क्षीण होता गया। वह स्त्री जो घर की प्रबंधक और मुखिया थी, वह दासी में बदल गई। पुरुष वर्चस्व की ओर बढ़ते पितृसत्तात्मक समाज ने आखिर में उसे हाशिए पर डाल दिया।

मूलत: कवय‍ित्री डॉ. सांत्वना श्रीकांत ने अपनी हालिया प्रकाशित पुस्तक ‘भारतीय नारी स्थति और गति’ में पुराकाल से लेकर आधुनिक काल तक की स्त्रियों की दशा और दिशा की विवेचना की है। लेखिका यह साबित करती हैं कि नारी का अर्थ ही है कि जिसका कोई शत्रु न हो। मगर दुर्भाग्य यह कि पुरुष रूप में उसका सहचर ही उसका दमन और शोषण करता है। उन्‍होंने बहस तलब स्त्री विमर्श में परंपराओं को दरक‍िनार क‍िए ब‍िना नए प्रश्न खड़े किए हैं।

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सांत्वना श्रीकांत ने अपनी पुस्तक में यही सिद्ध करने का प्रयास किया है कि प्राचीन काल से भी पहले और कालांतर में स्त्रियों ने अपनी मेधा से पुरुषों से सम्मान प्राप्त किया। कहीं न कहीं वह उनसे भी श्रेष्ठ सिद्ध हुईं। मगर बाद में पुरुषों ने उसे हर उस कार्य से विमुख करना शुरू कर दिया, जिसमें वे उनसे श्रेष्ठतम साबित हो जाती थीं। इसके बाद स्त्रियों की जो उपेक्षा शुरू हुई वह थमी नहीं। सदियों तक यह सिलसिला जारी रहा।

एक समय के बाद स्त्रियों ने इसका विरोध शुरू किया। यह एक आंदोलन के रूप में सामने आया। उन्नीसवीं सदी में जिस नारीवाद को लेकर स्त्रियां सामने आईं, वह क्रांतिकारी पहल होते हुए भी एक विकृत स्वरूप में ढल गया। सहधर्मिनी नारी अब पुरुष के बरक्स खड़ी थी। उसका विचार कहीं न कहीं समाज पर प्रहार करते हुए परिवार और विवाह संस्था को खंडित करना था। यह विरोध एक ऐसी चिनगारी था जिसमें स्त्रियां ही झुलसतीं।

नारीवाद से कहीं विरोध नहीं। स्त्रियों की अस्मिता और गरिमा का सम्मान होना चाहिए, मगर अतिवादी नारीवाद को डॉ. सांत्वना ने विकृत छद्म रूप माना है और लिखा है कि यह स्वच्छंद यौनाचार और हर स्थिति में पुरुष के विरोध को ही नारी मुक्ति या नारी सशक्तीकरण का पथ्य मानता है। नारी विमर्श के कई आयामों को लेकर नारीवाद के अतिरेक का लेखिका ने अपनी पुस्तक में विस्तार से वर्णन किया है। उन्होंने स्पष्ट करने की कोशिश की है कि भारतीय नारियों का गौरवशाली अतीत है उसके सम्मान को आधुनिकता तथा परंपरा के बीच संतुलन साधते हुए और प्रतिष्ठा दी जा सकती है।

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लेखिका ने अपनी पुस्तक को चार अध्यायों में बांटा है। ‘नारी और समाज में स्थिति’ पहला अध्याय है। यह पुस्तक की आधार भूमि है। इसमें स्त्री चिंतन का विशाल फलक है। जबकि ‘नारी और नारीवाद’ दूसरा अध्याय है। तीसरे अध्याय ‘वैदिक काल और ऋषिकाओं का दर्शन और दृष्टि’ में डॉ. सांत्वना ने गार्गी और मैत्रेयी सहित उस दौर की तमाम विदुषियों का वर्णन करते हुए इस विमर्श के हर पहलू को छुआ है। बताया है कि भारत की नारियां तब कितनी सक्षम और अधिकार संपन्न थीं। चौथे अध्याय ‘संस्कृत निर्मात्री नारियों की प्रदत्त व्यवस्थाएं’ में लेखिका ने नारियों की अलग-अलग भूमिका के बारे में लिखा है कि भारत अपनी सभ्यता के विकास से लेकर स्त्रियों का सम्मान करता रहा है। उन्हें पुरुषों के बराबर सम्मान देता रहा है। हमारी परंपरा समृद्ध है और इससे हम स्त्रियों की दशा बदल सकते हैं। इस पर हमें पुरजोर काम करना होगा।

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Book
किताब का आवरण

डॉ. सांत्वना श्रीकांत की यह पुस्तक पढ़ते हुए जान सकते हैं कि भारतीय स्त्रियां आधुनिक काल में ही चेतना और अधिकार संपन्न नहीं हुईं। यह वैदिक काल ही था जिसमें स्त्रियों की प्रतिष्ठा शिखर पर थी। उसके तमाम अधिकार अक्षुण्ण थे। इसकी प्रामाणिकता वेदों और उपनिषदों में मिलती है। तब स्त्रियां यज्ञों में शामिल होती थीं। युद्धों में हिस्सा लेती थीं।

सांत्वना ने अपनी बात में लिखा है कि वेदों में स्त्री के लिए उषा शब्द का प्रयोग किया गया है। यह उषा ही है जो सूर्य के आगे चलती है। सूर्य पुरुष का ही प्रतीक है। यह कथन सिद्ध करता है कि स्त्री पुरुष के पीछे नहीं चलती थी।

इतिहास के पन्नों पर ठोकर खाकर गिरतीं स्त्रियों को अगर किसी ने उठाया और संभाला तो यह शिक्षा ही थी चाहे वह कोई भी काल रहा हो। आधुनिक काल में स्त्रियां विमान उड़ा रही हैं, बैंक और कारपोरेट का प्रबंधन कर रही हैं तो इसकी नींव वैदिक काल में ही रखी गई थी। वैदिक ऋषिकाओं से पता चलता है कि वे विद्वानों से कितनी आगे थीं। लेखिका ने इसका विस्तार से वर्णन किया है। सर्वभाषा ट्रस्ट से प्रकाशित इस पुस्‍तक में उन्होंने वैदिक परंपरा में वर्णित स्त्री गरिमा और भव्यता से साक्षात्कार कराने का प्रयास किया है।

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