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चुनावी माहौल में उठा बड़ा सवाल- चुनाव आयोग को ज‍ितना अध‍ि‍कार है, उतना इस्‍तेमाल कर रहा है क्‍या?

चुनाव आयोग को जितना अधिकार भारतीय संविधान देता है उसका उपयोग नहीं करते हुए चुनाव आयोग केवल अपनी कुर्सी बचाने के फिराक में रहता है। आजादी के बाद जितने चुनाव आयुक्त हुए उनमें पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन और टीएन शेषन को ही जनता आज भी याद करती है शेष को कोई याद नहीं करती।
Written by: निशिकांत ठाकुर
नई दिल्ली | Updated: April 26, 2024 17:30 IST
चुनावी माहौल में उठा बड़ा सवाल  चुनाव आयोग को ज‍ितना अध‍ि‍कार है  उतना इस्‍तेमाल कर रहा है क्‍या
आजादी के बाद से शब्दों के तीर बहुत चले, लेकिन राजनेताओं के बीच जैसा इस बार चला, वैसा कभी नहीं हुआ।
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आपको याद होगा 14 सितंबर 2013 जब भारतीय जनता पार्टी की गोवा में आयोजित बैठक में तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अगले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह की इस घोषणा के बाद पार्टी के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी ने एतराज जताया था और पार्टी अध्यक्ष को संबोधित करते हुए पत्र भी लिखा था। फिर गुजरात को विकास के एक मॉडल के रूप में तथा नरेंद्र मोदी को विकास पुरुष के रूप में पेश करते हुए कहा गया कि यदि उनकी सरकार बनी तो भारत को जापान के तर्ज पर विकसित किया जाएगा और विकास पुरुष के रूप में नरेंद्र मोदी याद किए जाएंगे।

विरोधी दल उजागर करते रहते हैं सत्ताधारी पार्टी की कमजोरियां

अत्यधिक उमंग और उत्साह से देश की जनता ने नए किरण की आस में दिल खोलकर भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी को विकास पुरुष के नाम पर मतदान किया। फिर भाजपा की सरकार बनी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बने । पूरी दुनिया में ऐसा होता है कि जो पार्टी सत्तारूढ़ होती है, वह अधिक समय तक शासन नही कर सकती। वह लाख कोशिश, लाख उपाय करें, सदा शासन में नहीं रह सकती। समाज की इतनी समस्याएं ही हैं कि सब का समाधान नहीं हो सकता, जो हल नहीं होगी, विरोधी पार्टी उन्हीं की ओर इशारा करती रहेगी। धीरे-धीरे सब विरोधी की बातें सुनने लगेंगे कि बात तो ठीक ही कह रहा है। विरोधी का बल बढ़ जाता है। जैसे ही विरोधी सत्ता में आया, उसके बाद उसका बल टूटना शुरू हो जाता है। सत्ताधिकारी सत्ता में आते ही कमजोर होने लगता है। गैर-सत्ताधिकारी सत्ता से बाहर रहकर बलशाली होने लगता है। इसलिए दुनिया में राजनीतिज्ञों का एक खेल चलता रहता है। जनता मूर्ख बनती रहती है और यह क्या, सभी राजनीतिज्ञ तो एक जैसे ही होते हैं। सबने पिछले वर्षों में यही तो महसूस किया।

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हिंदू-मुस्लिम पर प्रधानमंत्री का भाषण बन गया विवाद का मुद्दा

आजकल प्रधानमंत्री का राजस्‍थान में दिया भाषण देश में मंथन का विषय बना हुआ है। प्रधानमंत्री ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के 18 वर्ष पहले दिए गए भाषण के लिए कहा कि कांग्रेस अपने शासनकाल में घुसपैठियों और ज्यादा बच्चे वालों को आपकी संपत्ति दे देगी। इस पर देश के कई विश्लेषक और मीडिया में दिए गए बयान की सत्यता की जांच करने वालों ने कहा है कि पूर्व प्रधानमंत्री का भाषण जिसका उल्लेख नरेंद्र मोदी कर रहे हैं, बिल्कुल असत्य है और देश के 18 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय का अपमान है।

दरअसल, पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने 9 दिसंबर 2006 को बतौर प्रधानमंत्री नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल के अपने भाषण में कहा था कि "…हमें नई योजनाओं को लाकर यह सुनिश्चित करना होगा कि अल्पसंख्यकों और मुसलमानों का भी उत्थान हो सके-विकास हो सके।"

चूंकि प्रधानमंत्री के सभी भाषणों का रिकॉर्ड रखा जाता है इसलिए यदि उनके लिए प्रधानमंत्री ही उसे झुठलाना चाहे तो नहीं झुठलाया जा सकता है। यह तो झूठ की पराकाष्ठा हो गई। विश्लेषकों का मानना है कि केवल पहले चरण के मतदान के बाद दिया गया उनका भाषण हार की बौखलाहट को ही दिखाता है। फिलहाल, विपक्ष ने प्रधानमंत्री के इस भाषण को चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन माना है और इसके लिए चुनाव आयोग से शिकायत करते हुए कार्यवाही की मांग की है । विपक्ष यह भी कहता है कि क्या चुनाव आयोग प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई कार्रवाई करने की हिम्मत दिखा पाएगा?

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दूसरी ओर विपक्ष भी पीछे हटने वाला नजर नहीं आता है। रांची में इंडिया गठबंधन के कार्यक्रम में वर्तमान सरकार को तानाशाह कहा और उन्हें सत्ता से बाहर करने का संकल्प लिया है। वहीं कांग्रेस के नेता राहुल गांधी कहते हैं प्रधानमंत्री ने देश को बेरोजगारी का केंद्र बना दिया। राहुल गांधी ने भागलपुर की एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि अडानी-अंबानी सहित 22 उद्योगपतियों के पास जितनी संपत्ति है, उतनी संपत्ति सत्तर करोड़ हिंदुस्तानियों के पास नहीं है। मोदी केवल अडानी-अंबानी को पूरा धन दे रहे हैं । एयरपोर्ट, पोर्ट, बिजली, सोलर प्लांट, डिफेंस अदानी को पकड़ा दिया है। 22 से पच्चीस उद्योगपतियों के 16 लाख करोड़ का कर्ज माफ कर दिया । इतने पैसों से 25 बार किसानों का कर्ज माफ हो जाता। जितना पैसा उद्योगपतियों को दिया गया, हम उतना पैसा गरीबों को देंगे, किसानों को उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलाएंगे ।

आजादी के बाद से देश में अब तक लोकसभा-विधान सभा के कई चुनाव हुए, लेकिन शब्दों का जो तीर एक दूसरे दलों पर इस चुनाव में चलाया जा रहा है, वैसा इसके पहले न कभी देखा गया और न ही कभी सुना गया। यह ठीक है कि हमारा देश पूरी तरह शिक्षित नहीं हो सका है, लेकिन जो हमारे राजनेता हैं उनके भी बोल ऐसे बिगड़ जाएंगे ऐसा कभी सोचा नहीं गया था।

सत्ता पर काबिज होने के लिए कोई स्तरहीन बात करेगा समाज को हिंदू-मुसलमान के बीच बंटेगा, यह समाज के लिए बड़ा ही गंभीर प्रश्न आ खड़ा हुआ है। सच तो यह है कि अभी चुनाव में जिसे इन सब मुद्दों पर अंकुश लगाने का भार डाला गया है, उन्होंने ही अपने को इतना कमजोर बना लिया है कि किसी चुनाव आयुक्त की इतनी हिम्मत नहीं कि वह सत्तारूढ़ और प्रधानमंत्री या सत्तारूढ़ के बिगड़े बोल पर अंकुश लगाने का आदेश जारी करे या उनके खिलाफ कार्रवाई करे?

यह ठीक है कि ऊंचाई पर पहुंचने के लिए बहुत कुछ त्याग करना पड़ता है, इसका यह अर्थ नहीं होता कि कोई वास्तविकता की अनदेखी करके समाज के आत्मबल को कम कर दे। चुनाव आयोग को जितना अधिकार भारतीय संविधान देता है उसका पूरा उपयोग वह करता है? आजादी के बाद जितने चुनाव आयुक्त हुए उनमें पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन और टीएन शेषन को ही जनता आज भी याद करती है शेष को कोई याद नहीं करती। ठीक है इतिहास में नाम दर्ज कराया नहीं जाता बल्कि इनके कृत्य को इतिहास जीवित रखता है और उन्हें समाज सदैव सम्मान की नजर से देखता है। अब प्रश्न यह है कि आज के वर्तमान चुनाव आयुक्त को इतिहास सम्मानित देश निर्माता या चुनाव आयुक्त के रूप में याद रखेगा?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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