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सोनिया गांधी ने नरसिंह राव सरकार पर लगाए थे बेहद गंभीर आरोप, अंतिम संस्कार तक में नहीं हुई थीं शामिल

Sonia Gandhi faced off with Narasimha Rao: सोनिया गांधी ने खुले तौर पर नरसिंह राव सरकार पर राजीव गांधी की हत्या की जांच धीमी गति से चलने का आरोप लगाया था।
Written by: स्पेशल डेस्क | Edited By: Ankit Raj
नई दिल्ली | Updated: February 10, 2024 15:05 IST
सोनिया गांधी ने नरसिंह राव सरकार पर लगाए थे बेहद गंभीर आरोप  अंतिम संस्कार तक में नहीं हुई थीं शामिल
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव (Express archive photo)
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पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव को भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (9 फरवरी) को एक्स पर लिखा, "एक प्रतिष्ठित विद्वान और राजनेता के रूप में नरसिंह राव गारू ने अलग-अलग पदों पर रहकर भारत की सेवा की… उनका दूरदर्शी नेतृत्व भारत को आर्थिक रूप से उन्नत बनाने, देश की समृद्धि और विकास के लिए एक ठोस नींव रखने में सहायक साबित हुआ।" यहां हम पीवी नरसिंह राव के बारे में चार महत्वपूर्ण बातें जानेंगे:

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आवारा कुत्ते खींच रहे थे नरसिंह राव की चिता, लावारिस पड़ी थी अधजली लाश

नरसिंह राव के निधन के बाद, उनके शव को आम कार्यकर्ताओं के लिए कांग्रेस मुख्यालय के अंदर रखे जाने की अनुमति नहीं दी गई थी। राव के निधन के एक दिन बाद, 24 दिसंबर, 2004 को सुबह 10 बजे उनके पार्थिव शरीर को लेकर फूलों से सजी सेना की एक गाड़ी, दिल्ली के मोतीलाल नेहरू मार्ग स्थित उनके घर से हवाई अड्डे के लिए निकली। सेना की गाड़ी को कांग्रेस पार्टी के मुख्यालय 24 अकबर रोड पर रुकना था।

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पीवी नरसिंह राव की जीवनी 'Half Lion: How P V Narasimha Rao Transformed India' के लेखक विनय सीतापति के अनुसार, "पिछले कांग्रेस अध्यक्षों के शवों को पार्टी मुख्यालय के अंदर ले जाने की प्रथा थी ताकि आम कार्यकर्ता उन्हें श्रद्धांजलि दे सकें। लेकिन पूर्व पीएम का शव लेकर जब जुलूस कांग्रेस मुख्यालय पहुंची तो गेट नहीं खुला था। जब राव के एक मित्र ने एक कांग्रेसी से गेट के बारे में पूछा तो बताया गया- हम उम्मीद कर रहे थे कि गेट खोला जाएगा… लेकिन कोई आदेश नहीं आया। केवल एक ही व्यक्ति वह आदेश दे सकता था। उन्होंने यह नहीं दिया।"

सेना का वाहन कांग्रेस मुख्यालय के बाहर लगभग 30 मिनट तक इंतजार करता रहा और फिर हवाईअड्डे की ओर चला गया। राव के पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए हैदराबाद ले जाया गया, जिसमें पूर्व पीएम एचडी देवेगौड़ा और बीजेपी के लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता शामिल हुए। हालांकि तब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी वहां मौजूद नहीं थीं।

सीतापति लिखते हैं, "उस रात टेलीविज़न चैनलों ने राव के आधे जले हुए शरीर के दृश्य दिखाए, खोपड़ी अभी भी दिखाई दे रही थी, आवारा कुत्ते अंतिम संस्कार की चिता को खींच रहे थे।"

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सोनिया ने राव पर लगाए थे गंभीर आरोप

सोनिया गांधी और नरसिंह राव के रिश्ते शुरू से ही ख़राब रहे। इसके व्यक्तिगत, राजनीतिक और शायद वैचारिक सहित कई कारण थे। मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री रहे एक कांग्रेस नेता ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, "सोनिया और राव के बीच पहला तकरार 1992 की शुरुआत में ही देखने को मिला। एस बंगारप्पा कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे। वह चाहते थे कि राजीव गांधी के निजी सचिव रहे जॉर्ज को राज्यसभा का टिकट दिया जाए क्योंकि उन्हें सीएम बनाने में जॉर्ज की अहम भूमिका थी। लेकिन राव के विचार कुछ और थे। वह चाहते थे कि टिकट किसी दूसरे नेता को दिया जाए। उन्होंने कुशलता से इस मामले को सोनिया गांधी के पाले में फेंक दिया और कहा कि अगर वह कहेंगी तो मैं इसे जॉर्ज को टिकट दे दूंगा। तब सोनिया गांधी एक अलग मानसिक स्थिति में थी। उन्होंने कभी हां नहीं कहा और ना ही कभी ना कहा और टिकट उस व्यक्ति को मिल गया जिसे राव चाहते थे।"

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राजीव गांधी हत्याकांड की जांच धीरे चलाए जाने को लेकर भी सोनिया राव से नाराज थीं। 1995 में उन्होंने खुले तौर पर राव सरकार पर उनके पति की हत्या की जांच धीमी गति से चलने का आरोप लगाया था। एक वरिष्ठ नेता ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, "उन्हें लगा कि वह नहीं चाहते कि जांच आगे बढ़े।"

इसके अलावा, कांग्रेस ने 1996 के लोकसभा चुनाव में हार के लिए राव को जिम्मेदार ठहराया। नतीजों के बाद राव की जगह सीताराम केसरी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। दो साल बाद, पूर्व प्रधानमंत्री को अगले लोकसभा चुनाव में टिकट देने से इनकार कर दिया गया।

राव ने अयोध्या को केंद्र शासित प्रदेश में बदलने और उसे वेटिकन जैसा दर्जा देने पर विचार किया था

द इंडियन एक्सप्रेस की कंट्रीब्यूटिंग एडिटर नीरजा चौधरी ने हाल ही में अपने साप्ताहिक कॉलम में लिखा था कि राव अयोध्या को केंद्र शासित प्रदेश में बदलने और उसे वेटिकन जैसा का दर्जा देने के लिए एक अध्यादेश लाना चाहते थे। हालांकि, वह योजना पर आगे नहीं बढ़े।

चौधरी ने अपनी किताब 'हाउ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड' में यह भी लिखा है कि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस के कुछ दिनों बाद, राव के दोस्त और पत्रकार निखिल चक्रवर्ती ने तत्कालीन प्रधान मंत्री से मुलाकात की थी।

चक्रवर्ती ने राव को चिढ़ाते हुए कहा, "मैंने सुना है कि आप 6 दिसंबर को बारह बजे के बाद पूजा कर रहे थे।" चक्रवर्ती की बात से चिढ़कर राव ने गुस्से में कहा, "दादा, आप सोचते हैं कि मैं राजनीति नहीं जानता। मेरा जन्म राजनीति में हुआ है और मैं आज तक केवल राजनीति ही कर रहा हूं। जो हुआ वो ठीक हुआ…। मैंने होने दिया ताकि भारतीय जनता पार्टी की मंदिर की राजनीति हमेशा के लिए खत्म हो जाए।"

चौधरी ने अपने कॉलम में लिखा, राव ने उस स्थान पर एक मंदिर बनाने के बारे में भी सोचा जहां कभी बाबरी मस्जिद थी। इसके लिए उन्होंने प्रमुख हिंदू संप्रदायों की एक ट्रस्ट की स्थापना भी करवाई थी।

अटल बिहारी वाजपेयी ने राव को भारत के न्यूक्लियर प्रोग्राम का 'सच्चा जनक' कहा था

सीतापति की किताब के मुताबिक, राव न्यूक्लियर प्रोग्राम में सक्रिय रूप से शामिल थे। वह उन कुछ राजनेताओं में से एक थे जिन्हें 1991 में प्रधानमंत्री बनने पर इस कार्यक्रम के अस्तित्व के बारे में पता था।

परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने सितंबर 1995 के आसपास राव को एक नोट लिखा, जिसमें सिफारिश की गई कि भारत दिसंबर 1995 और फरवरी 1996 के बीच पोखरण में दो या तीन परीक्षण करे।

हालांकि, 15 दिसंबर 1995 को, न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस गुप्त कार्यक्रम को अपने अखबार में छाप दिया। इसके बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने राव को फोन किया। क्लिंटन ने कहा, "हमें आपके विदेश मंत्री (प्रणब मुखर्जी को कार्यक्रम के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, इसलिए उन्होंने सार्वजनिक रूप से इनकार किया था।) के स्पष्ट बयान को देखकर खुशी हुई कि भारत सरकार परीक्षण नहीं कर रही है।"

सीतापति ने लिखा है, "राव ने क्लिंटन को तय योजना के अनुसार जवाब देते हुए कहा कि मैंने भी प्रेस क्लिपिंग देखी। लेकिन वे झूठ हैं। लेकिन क्लिंटन ने फिर पूछा कि वह क्या है जिसे हमारे कैमरों ने देखा है? राव ने एक बार फिर तय योजना के अनुसार ही जवाब दिया- वह केवल मेंटेनेंस फैसिलिटी है।" हालांकि राव ने हिंट देते हुए यह भी कहा कि फिलहाल विस्फोट की कोई योजना नहीं है। लेकिन हाँ, हम तैयार हैं।

किताब के मुताबिक, क्लिंटन की चेतावनी और न्यूयॉर्क टाइम्स की स्टोरी के बावजूद, राव ने फरवरी 1996 में वित्त मंत्रालय से "परमाणु परीक्षण के आर्थिक प्रभावों का एक और विश्लेषण तैयार करने" के लिए कहा।

अगले महीने क्लिंटन की ओर से प्रधानमंत्री को फिर फोन आया और परीक्षण को आगे न बढ़ाने का आग्रह किया गया। हालांकि यह ज्ञात नहीं है कि राष्ट्रपति ने वास्तव में क्या कहा। सीतापति ने लिखा- कॉल इस बात का सबूत है कि राव मार्च 1996 में भी परमाणु हथियारों के परीक्षण पर विचार कर रहे थे।

मई में लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार शुरू हो चुका था। उसी दौरान प्रधानमंत्री राव ने डीआरडीओ के तत्कालीन प्रमुख एपीजे अब्दुल कलाम को बुलाया और परीक्षण आगे बढ़ाने के लिए कहा। हालांकि, कुछ दिनों बाद राव ने परीक्षण को स्थगित करने के लिए फिर से कलाम को फोन किया क्योंकि चुनाव परिणाम उनके अनुमान से काफी अलग थे।

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