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बाबरी के अंदर मूर्ति रखे जाने पर पाकिस्तानी रेडियो ने चलाई थी ऐसी खबर कि तनाव में आ गए थे नेहरू, पंत को भेजा था अयोध्या

साल 1949 में बाबरी मस्जिद के भीतर रामलला की मूर्ति रखे जाने के बाद अशोक सिंघल के दादा ने मुख्यमंत्री गोबिंद बल्लभ पंत को फैजाबाद-अयोध्या में घूसने नहीं दिया था। सिंघल के दादा गुरु दत्त सिंह तब फैजाबाद सिटी मजिस्ट्रेट हुआ करते थे।
Written by: स्पेशल डेस्क | Edited By: Ankit Raj
नई दिल्ली | Updated: January 18, 2024 16:38 IST
बाबरी के अंदर मूर्ति रखे जाने पर पाकिस्तानी रेडियो ने चलाई थी ऐसी खबर कि तनाव में आ गए थे नेहरू  पंत को भेजा था अयोध्या
बाएं से- गुरु दत्त सिंह और अशोक सिंघल (Express archive photo)
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विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल ने अपने दादा को राम आंदोलन का पहला कारसेवक बताया था। अशोक सिंघल के दादा गुरु दत्त सिंह 1949 में बाबरी मस्जिद के अंदर रामलला (राम का बाल रूप) की मूर्ति रखे जाने के दौरान फैजाबाद सिटी मजिस्ट्रेट और अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट थे।

द इंडियन एक्सप्रेस के विकास पाठक ने राम जन्मभूमि आंदोलन में अशोक सिंघल के दादा की भूमिका के बारे में पूर्व केंद्रीय संस्कृति सचिव और नेहरू मेमोरियल संग्रहालय के पूर्व निदेशक राघवेंद्र सिंह से बातचीत की है।

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गुरु दत्त सिंह को पहला कारसेवक क्यों कहा गया?

गुरु दत्त सिंह को इसलिए पहला कारसेवक माना जाता क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत के निर्देश के बावजूद बाबरी में रखी मूर्ति को नहीं को नहीं हटाया था। दरअसल, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि मस्जिद से मूर्ति हटा दी जाए। लेकिन गुरुदत्त अड़े रहे और उन्होंने सीएम को फैजाबाद-अयोध्या में घुसने ही नहीं दिया।

राघवेंद्र याद करते हैं, "22-23 दिसंबर को राम लला (बाबरी मस्जिद में) प्रकट हुए और यह खबर स्थानीय स्तर पर फैल गई। तब पाकिस्तान रेडियो पर यह खबर चलाई गई कि बंटवारे के बाद जो जगहें उन्होंने खाली की थीं, उन पर हिंदू कब्जा कर रहे हैं। दिल्ली में केंद्र सरकार तुरंत दबाव में आ गई। उन्होंने कहा कि अगर इस स्थिति को कायम रहने दिया गया तो मुस्लिम समुदाय खुद को कांग्रेस पार्टी से दूर कर लेगा। मुख्यमंत्री पंत को इस मामले को देखने के लिए कहा गया। उन्होंने जिला प्रशासन से संपर्क किया। प्रशासन ने रिपोर्ट सौंपी, जिसमें बताया गया कि लोगों की मानसिक स्थिति को देखते हुए, अगर मूर्ति हटा दी गई तो समस्या होगी।"

राघवेंद्र आगे बताते हैं, "यह बात नेहरू तक पहुंची और उन्होंने पंत को अयोध्या भेजा। गुरुदत्त ने फैजाबाद की सीमा पर सीएम से मुलाकात की। उन्होंने मुख्यमंत्री को सलाह दी कि वह तनावपूर्ण माहौल में लोगों के बीच न जाएं। लोगों को लगता है कि राज्य और केंद्र दोनों सरकारें राम लला की मूर्ति को हटाना चाहती हैं।"

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पंत ने कहा- परिणाम भुगतने होंगे

राघवेंद्र कहते हैं, "गुस्से में पंत ने गुरु दत्त से कहा कि उन्हें परिणाम भुगतने होंगे। इसके बाद गुरु दत्त वापस आए और अपने प्रियजनों के साथ इस पर चर्चा की और अपना इस्तीफा सौंप दिया। लेकिन इस्तीफा देने से पहले उन्होंने दो आदेश पारित किए - एक- राम चबूतरे के पास होने वाली प्रार्थनाएं जारी रहेंगी, दूसरा- धारा 144 लागू की जाएगी ताकि अधिक लोग वहां न आएं और समस्याएं पैदा न करें।"

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राघवेंद्र के मुताबिक, "गुरु दत्त को आधी रात में अपना आधिकारिक आवास खाली करने के लिए कहा गया और उनका सामान घर से निकाल दिया गया। अगले दिन वह कुछ समय के लिए अपने परिचित भगवती बाबू के मकान की खाली तीसरी मंजिल पर चले गये। बाद में उन्होंने फैजाबाद बस स्टैंड के पास राम भवन नाम से अपना घर बनाया।"

राघवेंद्र, अशोक सिंघल के हवाले से बताते हैं कि "सरकार ने उनके दादा की पेंशन में भी दिक्कतें पैदा कीं। लेकिन लोगों का उनसे प्रेम था और वे नगर पालिका के अध्यक्ष बन गये। इसके बाद, वह जनसंघ में शामिल हो गए। वह जनसंघ के जिला प्रमुख थे।"

उनके घर पर अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी और गुमनामी बाबा जैसे लोग आया करते थे। गुमनामी बाबा के बारे में अफवाह थी कि वह छद्मवेश में नेताजी सुभाष बोस थे। अब राम भवन में गुरु दत्त सिंह के भाई शक्ति सिंह रहते हैं। शक्ति सिंह ने अयोध्या में एक संग्रहालय बनाया है।

1949 से पहले भी उठी ती मंदिर निर्माण की मांग

राघवेंद्र का यह भी कहना है कि 22-23 दिसंबर, 1949 की रात को बाबरी मस्जिद में राम लला की मूर्ति रखे जाने से पहले भी यह मांग थी कि परिसर में राम चबूतरे के पास एक मंदिर का निर्माण किया जाए।

विकास पाठक की रिपोर्ट में अशोक सिंघल के हवाले से लिखा गया है, "जुलाई 1949 में यूपी सरकार को एक याचिका दी गई थी कि वहां एक मंदिर बनना चाहिए। सरकार ने इस मांग पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए फैजाबाद जिला प्रशासन को भेज दिया। मेरे दादा गुरुदत्त सिंह जी को डीएम को रिपोर्ट देने को कहा गया। उन्होंने वैसा ही किया। उन्होंने कहा कि जमीन सरकार की है और लोगों की रामलला में आस्था है और वे भव्य मंदिर चाहते हैं। अक्टूबर में उनके द्वारा एक पॉजिटिव रिपोर्ट भेजी गई। जब यह सब हो रहा था, राम चबूतरे पर रामचरित मानस का पाठ शुरू हो गया।"

गुरुदत्त एकमात्र अधिकारी नहीं थे जिन्होंने मूर्ति की स्थापना का समर्थन किया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अयोध्या के तत्कालीन डीएम केके नायर ने भी विवादित मस्जिद से मूर्ति हटाने से इनकार कर दिया था और सरकार से कहा था कि अगर वह मूर्ति हटाना चाहते हैं तो उन्हें बर्खास्त कर दें। 1952 में नायर की पत्नी शकुंतला को हिंदू महासभा ने गोंडा लोकसभा सीट से टिकट दिया था। वह जीत गई थीं।

बाबरी मस्जिद के भीतर ‘रामलला’ को ‘प्रकट’ होता देखने वाले को भाजपा ने दो बार बनाया था सांसद

22-23 दिसंबर, 1949 की रात को बाबरी मस्जिद में कथित तौर पर रामलला की मूर्ति 'प्रकट' हुई थी। विश्व हिंदू परिषद के आजीवन सदस्य रहे बीएल शर्मा ने दावा किया था कि उन्होंने मूर्ति को प्रकट होते हुए अपनी आंखों से देखा था। उन्होंने इसका पूरा विवरण भी दिया था। बाद में शर्मा भाजपा में शामिल हो गए। उन्होंने 1991 और 1996 में भाजपा के टिकट पर पूर्वी दिल्ली सीट से लोकसभा चुनाव का चुनाव लड़ा था और सांसद बने थे। विस्तार से पढ़ने के लिए फोटो पर क्लिक करें:

Ram Mandir
बाबरी विध्वंस (6 दिसंबर, 1992) के बाद अयोध्या पहुंचे CRPF के जवान 'रामलला' की पूजा करते हुए। (Express photo by R.K. Sharma)
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