scorecardresearch
For the best experience, open
https://m.jansatta.com
on your mobile browser.

राघव दास: गांधी के करीबी थे नेहरू से लोहा लेने वाले 'राम भक्त' कांग्रेस विधायक, वाजपेयी सरकार ने सम्मान में जारी किया था डाक टिकट

Ayodhya Ram Mandir: वाजपेयी सरकार ने नेहरू से मुकाबला करने वाले 'राम भक्त' कांग्रेस विधायक 'बाबा राघव दास' की स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया था।
Written by: स्पेशल डेस्क | Edited By: Ankit Raj
नई दिल्ली | Updated: January 25, 2024 09:35 IST
राघव दास  गांधी के करीबी थे नेहरू से लोहा लेने वाले  राम भक्त  कांग्रेस विधायक  वाजपेयी सरकार ने सम्मान में जारी किया था डाक टिकट
राघव दास
Advertisement

विकास पाठक

22-23 दिसंबर, 1949 की रात को बाबरी मस्जिद में रामलला की मूर्ति रखे जाने के बाद, नाराज जवाहरलाल नेहरू ने इसे हटाने का आदेश दिया। लेकिन विभाजन और दंगों से उपजे देश में नेहरू की बात नहीं मानी गई। प्रधानमंत्री के आदेशों का विरोध न केवल तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट केके नायर और सिटी मजिस्ट्रेट गुरु दत्त सिंह की ओर से हुआ, बल्कि फैजाबाद में कांग्रेस के भीतर से भी हुआ।

फैजाबाद के स्थानीय कांग्रेस विधायक, बाबा राघव दास, उन लोगों में से थे जिन्होंने मूर्ति हटाने के किसी भी कदम का मुखर विरोध किया, यहां तक कि ऐसा होने पर इस्तीफा देने की भी धमकी दी।

Advertisement

अपनी पुस्तक, द डिमोलिशन एंड द वर्डिक्ट में पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय लिखते हैं, "1950 में जब केंद्र नेहरू के निर्देश पर राज्य सरकार पर कार्रवाई के लिए दबाव डाल रहा था, तब राघव दास ने धमकी दी कि अगर मूर्ति को हटाया गया तो वह विधानसभा और पार्टी से इस्तीफा दे देंगे।"

राघव दास को जिताने के लिए CM पंत ने किया था प्रचार

राघव दास फैजाबाद में बड़े नेता थे। उन्होंने 1948 के उपचुनाव में मौजूदा विधायक और समाजवादी दिग्गज आचार्य नरेंद्र देव को लगभग 1,300 वोटों के अंतर से हराया था। नरेंद्र देव उन 13 विधायकों में से थे, जिन्होंने एक अलग समाजवादी पार्टी बनाने के लिए कांग्रेस छोड़ दी थी।

राघव दास को खुद यूपी के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने उपचुनाव के लिए चुना था। आध्यात्मिक राघव दास, तर्कवादी नरेंद्र देव के खिलाफ उतारने के लिए एकदम उपयुक्त व्यक्ति थे। मुखोपाध्याय की पुस्तक में कहा गया है कि नरेंद्र देव की हार सुनिश्चित करने के लिए, पंत ने खुद अयोध्या में राघव दास के लिए प्रचार किया, और मंदिर शहर के लोगों को बताया कि नरेंद्र देव एक नास्तिक हैं जो भगवान राम में विश्वास नहीं करते। मुखोपाध्याय ने अपनी किताब में लिखा है, "पंत ने इस बात पर जोर दिया कि नरेंद्र देव ने चोटी नहीं रखी थी, जो कि कट्टर हिंदुओं रखा जाता है।"

Advertisement

शुरू में ही मंदिर आंदोलन से जुड़ गए थे राघव दास

नवनिर्वाचित विधायक शुरू में ही राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़ गए। जब 20 अक्टूबर, 1949 को अयोध्या में रामचरितमानस का नौ दिवसीय अखंड पाठ आयोजित किया गया था। राघव दास ने कार्यक्रम में अंतिम दिन भाग लिया। दास ने हिंदू महासभा के महंत दिग्विजयनाथ (महंत अवैद्यनाथ के गुरु, जिनके शिष्य योगी आदित्यनाथ हैं।) और राम राज्य परिषद के स्वामी करपात्री के साथ मंच साझा किया।

Advertisement

गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम में किया शामिल

राघव दास की भूमिका और कद केवल अयोध्या तक सीमित नहीं थी। भाजपा के पूर्व राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज ने अपनी किताब 'ट्रिस्ट विद अयोध्या' में लिखा है लोग उन्हें "पूर्वांचल का गांधी" भी कहते थे। राघव दास को 1921 में स्वयं महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम में शामिल किया था और वह कई बार जेल गए थे। उन्होंने गांधी जी की 1931 की दांडी यात्रा में भी हिस्सा लिया था। ऐसा माना जाता है कि यह गांधी ही थे जिन्होंने सबसे पहले उन्हें "बाबा" राघव दास कहा था, जिसके बाद यह उपसर्ग उनके साथ जुड़ गया।

दरअसल, राघव दास में आध्यात्मिक प्रतिभा भी थी। वह पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया के बरहज के प्रसिद्ध संत योगीराज अनंत महाप्रभु के शिष्य और उत्तराधिकारी थे। उन्होंने बरहज में परमहंस आश्रम भी बनवाया और आश्रम में क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी राम प्रसाद बिस्मिल की एक मूर्ति स्थापित कराई, जिनके वे करीबी थे।

राघव दास एक समाज सुधारक भी थे। वह शैक्षिक गतिविधियों में शामिल थे, कुष्ठरोगियों की सेवा करते थे और जमींदारी भूमि को किसानों को पुनर्वितरित करने के लिए विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से जुड़े थे।

'सत्या की तलाश' में 17 साल की उम्र में छोड़ दिया था घर

महाराष्ट्र में पुणे के एक ब्राह्मण परिवार में राघवेंद्र के रूप में जन्मे, राघव दास ने 17 साल की उम्र में घर छोड़ दिया। "सत्य की तलाश में" पूर्वी उत्तर प्रदेश में घूमते रहे और मौनी बाबा नामक एक तपस्वी से हिंदी सीखी।

राघव दास हिंदी भाषा के समर्थक बन गए और उन्होंने बरहज में अपने आश्रम में एक राष्ट्रभाषा विद्यालय खोला। उन्होंने बरहज में एक कुष्ठ आश्रम और एक डिग्री कॉलेज भी शुरू किया। आज तक, पूर्वी उत्तर प्रदेश में कुछ शैक्षणिक संस्थानों में राघव दास का नाम है। इनमें बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर, बाबा राघव दास इंटर कॉलेज, देवरिया और बाबा राघव दास डिग्री कॉलेज, बरहज शामिल हैं।

राघव दास का 1958 में निधन हो गया। 12 दिसंबर 1998 को वाजपेयी सरकार के कार्यकाल के दौरान, दास की जयंती के अवसर पर भारत सरकार द्वारा नेहरू से मुकाबला करने वाले 'राम भक्त' कांग्रेस विधायक की स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया गया था।

Advertisement
Tags :
Advertisement
tlbr_img1 राष्ट्रीय tlbr_img2 ऑडियो tlbr_img3 गैलरी tlbr_img4 वीडियो