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जब इंदिरा गांधी को जेल भेजना सत्ताधारी दल को पड़ा भारी, केजरीवाल की गिरफ्तारी पर वरिष्ठ पत्रकार ने याद किया किस्सा

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने लिखा है, 'आज कई लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि भाजपा ऐसा क्यों कर रही है, जीती हुई बाजी क्यों दांव पर लगा रही है?'
Written by: स्पेशल डेस्क
नई दिल्ली | March 24, 2024 17:36 IST
जब इंदिरा गांधी को जेल भेजना सत्ताधारी दल को पड़ा भारी  केजरीवाल की गिरफ्तारी पर वरिष्ठ पत्रकार ने याद किया किस्सा
अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद प्रदर्शन करते आप समर्थक (ANI Photo/ Mohd Zakir)
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आबकारी नीति से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप (AAP) संयोजक अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी का कई तरह राजनीतिक विश्लेषण किया जा रहा है। केजरीवाल की गिरफ्तारी से भाजपा को फायदा होगा, या आप को बढ़त मिलेगी, इसे लेकर अलग-अलग लोगों की अलग-अलग राय है।

द इंडियन एक्सप्रेस की कॉलमनिस्ट कूमी कपूर ने केजरीवाल की गिरफ्तारी के बहाने आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी की घटना को याद किया है।

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कपूर ने लिखा है, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कथित रूप से इंदिरा गांधी के राजनीतिक करियर से प्रेरणा ली है। लेकिन ऐसा लगता है कि मोदी सरकार चरण सिंह की सीबीआई द्वारा इंदिरा गांधी को एक कथित भ्रष्टाचार मामले में गिरफ्तार करने की गलती भूल गई है, जो 1975 में आपातकाल के बाद जनता पार्टी की जीत के तुरंत बाद हुई थी। गिरफ्तारी की घटना को इंदिरा गांधी और कांग्रेस ने सहानुभूति की लहर को कुशलता से भुनाया और कुछ महीनों बाद चिकमंगलूर उपचुनाव में आसानी से जीत हासिल की। उस जीत से राजनीतिक परिदृश्य बदल गया।"

वह आगे लिखती हैं, "राजनीतिक पर्यवेक्षकों को लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हुई आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल की नाटकीय गिरफ्तारी, और इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी में समानता नज़र आ रही है।"

"ये थोड़ा ज्यादा हो रहा है"

द इंडियन एक्सप्रेस की कंट्रीब्यूटिंग एडिटर नीरजा चौधरी का मानना है कि केजरीवाल की गिरफ्तारी अन्य विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी से अलग है। वह लिखती हैं, "अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा हाल ही में की गई अन्य विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियों से अलग है। … जमीनी स्तर पर वह लोग भी इस गिरफ्तारी को ज्यादती बता रहे हैं, जो केजरीवाल या उनकी राजनीति को खास पसंद नहीं करते। ऐसे लोग चिंता के स्वर में कह रहे हैं, "ये थोड़ा ज्यादा ही हो रहा है।"

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चौधरी आगे लिखती हैं, "चुनाव आज भी भारत के लोकतंत्र की धड़कन बने हुए हैं, चाहे वे कितने भी त्रुटिपूर्ण क्यों न हों। आम आदमी और औरतें अभी भी वोट देने के अपने अधिकार को एक अनमोल चीज़ मानते हैं - यह उन्हें सरकारें बदलने में सक्षम बनाता है और यही एकमात्र समय है जब उन्हें अपने शासकों पर शक्ति का एहसास होता है। आज कई लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि भाजपा ऐसा क्यों कर रही है, जीती हुई बाजी क्यों दांव पर लगा रही है?"

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मोदी के संभावित विकल्प केजरीवाल

नीरजा चौधरी लिखी हैं, "हाल के महीनों में देश के विभिन्न हिस्सों में यात्रा करते हुए, चाहे वह गुजरात, हरियाणा, गोवा, बिहार या कर्नाटक हो, मैंने कई लोगों को यह कहते सुना है कि वे केजरीवाल को तुरंत नहीं, बल्कि भविष्य में मोदी के संभावित विकल्प के रूप में देखते हैं।"

भाजपा की रणनीति क्या है?

केजरीवाल की इस बात के लिए भी आलोचना की जाती है कि वह "माई-वे-और हाईवे" वाले हैं। चौधरी लिखती हैं, "केजरीवाल ने बराबरी की टीम या नेतृत्व की अगली पंक्ति नहीं बनाई है। यही वह बात है जिस पर भाजपा भरोसा करेगी। भाजपा उम्मीद करेगी कि केजरीवाल और अन्य शीर्ष नेताओं की अनुपस्थिति (मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और सत्येंद्र जैन भी जेल में हैं।) आप नेता रणनीति नहीं बना पाएंगे, इस दौरान विरोधी हावी हो जाएंगे और पार्टी ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगी या अन्य पार्टियों (शिवसेना और राकांपा) जैसे विभाजित हो जाएगी।"

अगर ऐसा होता है तो फिर अगले साल की शुरुआत में होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनावों में आप कोई बड़ी ताकत नहीं होगी। बेशक, बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि लोकसभा चुनाव में दिल्ली में आप और कांग्रेस का प्रदर्शन कैसा रहता है। और यह इस बात पर निर्भर करेगा कि केजरीवाल की गिरफ्तारी से दिल्ली और उसके बाहर जनता में कितनी सहानुभूति पैदा होती है।

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