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CJI ने बताया कैसे गहरी हुई दोस्‍ती तो भर आईं जस्‍ट‍िस शाह की आंखें, गुनगुनाने लगे राज कपूर की फ‍िल्‍म का गाना…

जस्टिस एमआर शाह का 15 मई को सुप्रीम कोर्ट में आखिरी दिन है। उन्होंने साल 1982 में वकालत शुरू की थी। करियर के शुरुआती सालों का एक किस्सा आजतक नहीं भूले हैं।
Written by: स्पेशल डेस्क
May 15, 2023 12:42 IST
cji ने बताया कैसे गहरी हुई दोस्‍ती तो भर आईं जस्‍ट‍िस शाह की आंखें  गुनगुनाने लगे राज कपूर की फ‍िल्‍म का गाना…
जस्टिस एमआर शाह 15 मई को रिटायर हो रहे हैं।
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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एमआर शाह (Justice MR Shah) 15 मई को रिटायर हो रहे हैं। सोमवार को जब जस्टिस शाह के सम्मान में सेरेमोनियल बेंच की कार्यवाही शुरू हुई तो उनकीं आंखें भर आईं। जस्टिस शाह ने कहा कि मैं रिटायर होने वाला शख़्स नहीं हूं। राज कपूर का गाना, 'कल खेल में हम हों न हों, गर्दिश में तारे रहेंगे सदा…' गुनगुनाते हुए कहा कि जल्द ही नई पारी की शुरुआत करूंगा। इस दौरान चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि जब मैं ASG था, तब से जस्टिस शाह को जानता हूं। सुप्रीम कोर्ट में आने के बाद हमारी दोस्ती और गहरी हुई।

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ (CJI DY Chandrachud) ने कहा कि कोरोना काल में हम अपने चैंबर में बैठा करते थे। मैं उन्हें (जस्टिस शाह) को कोई जजमेंट भेजता तो उसी दिन, देर रात नोट के साथ वापस आ जाता था। जस्टिस शाह को ड्रिस्ट्रिक्ट ज्यूडिशियरी की गहरी समझ है। कॉलेजियम के फैसलों को हमेशा सपोर्ट किया।

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कौन हैं जस्टिस एमआर शाह?

गुजरात यूनिवर्सिटी से एलएलबी की पढ़ाई करने वाले जस्टिस शाह ने 19 जुलाई 1982 को बतौर एडवोकेट इनरोलमेंट कराया था।8 मार्च 2004 को गुजरात हाईकोर्ट में एडिशनल जज नियुक्त हुए। फिर 22 जून 2005 को गुजरात हाईकोर्ट में ही स्थाई जज नियुक्त हुए। 12 अगस्त 2018 को जस्टिस शाह का पटना हाई कोर्ट तबादला हुआ और चीफ जस्टिस बने। वहां से 2 नवंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त हुए।

आज तक नहीं भूले हैं वो एक वाकया

जस्टिस एमआर शाह एक इंटरव्यू में कहते हैं कि करियर के शुरुआती सालों में मेरी जिंदगी में एक ऐसा वाकया, हुआ जिसने मेरी सोच बदल कर रख दी। उसके बाद से मैंने कभी पैसे के लिए प्रैक्टिस नहीं की। Bar&Bench को दिये इंटरव्यू में जस्टिस शाह कहते हैं कि करियर के शुरुआती वर्षों में मैं भी पैसा कमाना चाहता था। उन दिनों मेरे पास जमानत से जुड़ा एक केस आया। हाईकोर्ट में पहले दो बार मामला लग चुका था। मेरे पास केस आया तो सौभाग्यवश अगले ही दिन मैंने जमानत ले ली। उस समय मैंने 2500 रुपये फीस तय की थी। 500 रुपये एडवांस मिल गया था और 2000 रुपये बकाया थे।

जमानत ले ली लेकिन मुवक्किल आया ही नहीं

जस्टिस शाह कहते हैं कि जिस दिन मैंने जमानत ली उसी दिन मैंने मुवक्किल को पत्र लिखा कि आपको जमानत मिल गई है। बकाया पैसा लाइए और जमानत की कॉपी ले जाइए। 15-20 दिन बीत गए लेकिन कोई आया नहीं, जबकि बेल का ऑर्डर तैयार था। करीब 20 दिन बीतने के बाद उनके घर से एक शख्स आया। मैं देखते ही आग बबूला हो गया और चीखते हुए कहा कि हम यहां क्या करने के लिए बैठे हैं? आपको जमानत मिल गई है…आपके परिवार का सदस्य जेल में बंद है। उन्होंने माफी मांगी तो मैंने कहा ठीक है… आप बकाया पैसे लाए हैं? उन्होंने कहा- सॉरी सर, पैसे तो नहीं लाया। मैंने कहा- क्या?

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पैसे नहीं मिले तो आग बबूला हो गए थे

जस्टिस शाह कहते हैं कि मुझे थोड़ा गुस्सा आ गया। मैंने कहा कि आप जाइए। जब पैसे लेकर आएंगे तब आपको बेल आर्डर की कॉपी दूंगा। इसके बाद अगले एक महीने तक फिर कोई नहीं आया। मैंने दोबारा चिट्ठी लिखी। कुछ दिन बीतने के बाद मुवक्किल आए। इस बार पैसे ले आए थे। मैंने उनसे पूछा कि आपने इतनी देर क्यों की? पहले क्यों नहीं आए? तो उन्होंने जवाब दिया कि सर, हमारे पास पैसे नहीं थे। गहने बेचने पड़े, तब पैसे का जुगाड़ हुआ।

मुवक्किल की बात सुन रो पड़े थे

जस्टिस शाह कहते हैं कि यह सुनते ही मेरी आंखों से आंसू निकलने लगे। मैंने सोचा कि यह मैंने क्या कर दिया… उसके परिवार का सदस्य जेल में है और मैं पैसे के लिए अड़ा रहा। इसके बाद मैंने उनसे कहा कि आप फौरन जाइए, जहां गहने गिरवी रखे हैं उसको पैसे लौटाकर अपने गहने छुड़ा लीजिये। उसकी रसीद ले आइए, मैं आपको तुरंत जमानत की कॉपी दे दूंगा। अगले दिन मैंने जमानत की कॉपी दे दी, लेकिन इससे जो सबक मिला वो आजतक नहीं भूल पाया हूं।

मुवक्किल को दिया करते थे किराये-खाने के पैसे

जस्टिस शाह बताते हैं कि मैंने अपने करियर के शुरुआती सालों में पंचमहाल और दाहोद जैसे ट्राइबल इलाकों में प्रैक्टिस की है। तब वहां के लोगों की आमदनी कुछ खास नहीं थी। मैं सुबह 8:30 बजे के करीब अपने चेंबर में बैठ जाता था। ट्राइबल इलाकों से सुबह 6:30 बजे चलकर लोग मेरे पास आते थे। मैं उनसे पूछता था कि क्या आपने चाय नाश्ता किया? घर वापस जाने के लिए भी पैसे दिया करता था।

वह इतने मासूम थे कि कहते थे 'सर, आपने आने-जाने का पैसा दिया, कुछ पैसे और दे देते तो रास्ते में खाने का हो जाता। मैं 50 रुपये खाने के लिए भी दिया करता था। लेकिन साल के आखिर में जब उनकी फसल तैयार होती थी तो मेरे लिए लाना नहीं भूलते थे।

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