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महिला आरक्षण बिल: दो शर्तों के चलते 2039 से पहले मुश्किल है कानून पर अमल! योगेंद्र यादव ने समझाई प्रक्रिया

महिला आरक्षण कानून लागू होने के बाद लोकसभा की 543 सीटों में से 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। राज्यों की विधानसभाओं की भी 33 प्रतिशत सीटों पर अनिवार्य रूप से महिलाएं ही चुनी जाएंगी।
Written by: न्यूज डेस्क | Edited By: Ankit Raj
Updated: September 22, 2023 18:55 IST
महिला आरक्षण बिल  दो शर्तों के चलते 2039 से पहले मुश्किल है कानून पर अमल  योगेंद्र यादव ने समझाई प्रक्रिया
संसद में महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बाद शुक्रवार (22 सितंबर, 2023) को नई दिल्ली स्थित भारतीय जनता पार्टी मुख्यालय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अभिनंदन किया गया। (AP Photo)
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27 वर्षों की कोशिश के बाद महिला आरक्षण बिल (Women Reservation Bill) संसद के दोनों सदनों में पास हो चुका है। हालांकि यह कानून प्रभाव में कब आएगा, इसे लेकर संशय बना हुआ है। पहले ऐसा लगा रहा था कि 2024 के आम चुनाव में ही 33 प्रतिशत महिला सांसद चुनकर आएंगी। फिर के सरकार के बयान से यह अंदाजा लगाया गया कि 2029 तक कानून लागू हो सकता है। अब कुछ विशेषज्ञों ने इसमें 10 साल और जोड़ दिया है। दरअसल, इस कानून को लागू करने की जो दो प्रमुख शर्तें हैं, वही इसे दूर की कौड़ी बना रही हैं।

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क्या हैं वो दो शर्तें?

कानून को लागू करने की पहली अनिवार्य शर्त है जनगणना। भारत में जनगणना हर 10 साल पर होती है। पिछली जनगणना 2011 में हुई थी। जाहिर है इसके बाद 2021 में होनी थी, जो कोविड-19 महामारी के कारण टल गई। अब 'उम्मीद' की जी रही है कि 2025 तक जनगणना की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी।

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दूसरी शर्त है परिसीमन। संविधान के 42वें संशोधन से 2000 के बाद पहली जनगणना के परिणाम प्रकाशित होने तक परिसीमन प्रक्रिया को रोक दिया गया था। 2001 में इसे 25 साल के लिए और बढ़ा दिया गया। इसका मतलब यह हुआ कि 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के नतीजे आने के बाद परिसीमन किया जाएगा। 2026 के बाद पहली जनगणना 2031 होगी। यानी परिसीमन का काम 2031 के बाद शुरू होगा। परिसीमन अपने आप में एक लंबी चौड़ी प्रक्रिया है।

योगेंद्र यादव 2039 तक का वक्त क्यों दे रहे हैं?

द वायर के एक कार्यक्रम में स्वराज इंडिया के सह-संस्थापक और पूर्व चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने क्रमवार बताया कि क्यों महिला आरक्षण कानून को लागू करने में डेढ़ दशक तक का समय लग सकता है।

द वायर की सीनियर एडिटर आरफा खानम शेरवानी से बातचीत में योगेंद्र यादव ने कहा, "मैंने ड्राफ्ट पढ़ा है। इसमें जनगणना और परिसीमन की जो शर्त लगाई गई है, वह बहुत खतरनाक है। इससे कानून लंबे समय के लिए लटक गया है। महिला आरक्षण न इस चुनाव में लागू होने वाला है, न अगले चुनाव में, न उसके बाद जल्दी होगा। 2024 के चुनाव में यह लागू नहीं होने वाला है, यह तो मोदी सरकार खुद ही बता चुकी है। सरकार की तरफ से ऐसा इशारा किया जा रहा है कि 2029 तक हो जाएगा। लेकिन यह सरासर झूठ है।"

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यादव आगे बताते हैं कि देश की जनगणना 2021 में होनी थी। नहीं हुआ। सरकार ने कहा है 2025 में करवा देंगे। हो सकता है 2025 में हो जाए। लेकिन ऐसा नहीं होता है कि आज जनगणना हुई और कर परिणाम आ गए। जनगणना होने के बाद प्रोविजनल रिजल्ट कम से कम एक साल बाद आता है और फाइनल फिगर्स दो साल बाद आते हैं। यानी जनगणना की प्रक्रिया पूर्ण होने में 2027 तक का समय लग जाएगा।"

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परिसीमन को एक लंबी प्रक्रिया बताते हुए यादव कहते हैं, "अगर किसी को लगता है कि जनगणना होने के तुरंत बाद परिसीमन हो जाएगा, तो वो लोग ये नहीं जानते कि परिसीमन अपने आप में एक लंबी प्रक्रिया है। उसमें सबसे पहले न्यायिक समितियां बनाई जाती हैं। फिर उसके बाद स्थानीय स्तर से प्रस्ताव मांगे जाते हैं। प्रस्ताव में पूछा जाता है कि परिसीमन कैसा होना चाहिए, नई सीमाएं कैसी बननी चाहिए, आदि। उसके बाद उस पर अलग अलग कमेटियों में चर्चा होती है। जिस तरह कोर्ट में किसी मामले की सुनवाई होती है, उसी तरह परिसीमन से पहले भी ज्यूडिशियल हियरिंग चलती है। इतना होने के बाद डिलिमिटेशन कमिशन (परिसीमन समिति) अपना ड्राफ्ट पेश करती है। उस ड्राफ्ट पर फिर देश भर से आपत्तियां मंगाई जाती है। फिर उन आपत्तियों पर चर्चा होती है, जिसके बाद परिसीमन समिति अपना फाइनल रिपोर्ट देता है।"

पिछली बार परिसीमन करने में कितना वक्त लगा था?

पिछली बार डिलिमिटेशन कमिशन 2002 में बनी थी। उसने अपनी रिपोर्ट 2007 में दी थी। पूरे पांच साल पांच महीने लगे थे। योगेंद्र यादव कहते हैं कि "मान लीजिए सरकार इस बार यह प्रक्रिया दो-तीन साल में पूरी कर लेगी। तब भी 2029 तक तो नहीं ही हो पाएगा। इन सब में अभी हम एक बड़ा पेंच भूल रहे हैं। वह ये है कि संविधान में लिखा हुआ कि अलग परिसीमन 2026 के बाद होने वाली जनगणना के परिणाम के आधार पर होगा। यानी सरकार अगर 2025 में जनगणना करवा भी लेती है तो उसका कोई महत्व नहीं है। उसके आधार पर परिसीमन नहीं हो सकता। ऐसा संविधान में लिखा है। 2026 के बाद पहली जनगणना 28 फरवरी, 2031 में होगी। हम कह सकते हैं कि सरकार बहुत अच्छी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर 2032 तक जनगणना के फाइनल फिगर्स ले आएगी। फिर आप डिलिमिटेशन कमिशन बनाएंगे। कमिशन अपनी पूरी कार्यवाही को जल्दी से जल्दी भी कर देगा तब भी 2034 के मध्य तक मामला चला ही जाएगा। यहां मैं समय कम कर के बता रहा हूं। जिस काम में पांच साल लगता है, उसके लिए दो साल बता रहा हूं।"

परिसीमन के बाद क्या?

योगेंद्र यादव बताते हैं कि डिलिमिटेशन कमिशन की रिपोर्ट आने के बाद देश भर के वोटर लिस्ट को बदला जाता है। क्योंकि मतदाताओं को यह बताना होता है कि कि कल तक जो पोलिंग बूथ इस चुनाव क्षेत्र (Constituency) में था, अब वह दूसरी चुनाव क्षेत्र में चला गया है। इसका मतलब है कि इस पूरी प्रक्रिया को पूर्ण होने में कम से कम 2035 तक का समय लग जाएगा। इसका मतलब यह हुआ कि महिला आरक्षण कानून 2039 के चुनाव में प्रभाव में आएगा।"

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