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अयोध्या राम मंदिर: 2019 में नरेंद्र मोदी के खिलाफ उम्मीदवार उतार रहे थे ज्योतिर्मठ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्‍वती, कहा था- तानाशाही चल रही है

ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्‍वामी अवमुक्‍तेश्‍वरानंद सरस्‍वती ने एक इंटरव्यू में बताया है कि उन्हें प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल होने के लिए निमंत्रण नहीं भेजा गया है।
Written by: एक्सप्लेन डेस्क | Edited By: Ankit Raj
नई दिल्ली | Updated: January 17, 2024 12:45 IST
अयोध्या राम मंदिर  2019 में नरेंद्र मोदी के खिलाफ उम्मीदवार उतार रहे थे ज्योतिर्मठ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्‍वती  कहा था  तानाशाही चल रही है
ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्‍वामी अवमुक्‍तेश्‍वरानंद सरस्‍वती (PC- X)
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राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में सभी चारों मठों के शंकराचार्य शामिल नहीं हो रहे हैं। ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उद्घाटन में शामिल न होने का कारण धार्मिक ग्रंथों का पालन न करना बताया। उन्होंने कहा है कि मंदिर का निर्माण पूरा होने से पहले अभिषेक करके धर्मग्रंथों को कमजोर किया जा रहा है। इस हड़बड़ी का कोई कारण नहीं है।

साल 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद उनके शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उत्तराखंड में ज्योतिर्मठ का नया शंकराचार्य बनाया गया था। अविमुक्तेश्वरानंद ने 2006 में स्वामी स्वरूपानंद से दीक्षा ली थी। तब से, वह उत्तराखंड स्थित ज्योतिर्मठ की सभी धार्मिक और अन्य गतिविधियों की देखरेख कर रहे हैं। वह  ज्योतिर्मठ पीठ के 46वें शंकराचार्य हैं।

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कॉलेज में लड़ा था चुनाव

अविमुक्तेश्वरानंद ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) से पढ़ाई की है। नवभारत टाइम्स से बातचीत में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने बताया था कि उन्हें उनके गुरू ने ही शिक्षा ग्रहण करने के लिए बीएचयू भेजा था। कॉलेज में चुनाव लड़ने के सवाल पर शंकराचार्य ने कहा कि उस समय छात्रों को नेतृत्व की जरूरत थी। छात्रों के हित के लिए मैंने चुनाव में भाग लिया। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि वह कभी भी राजनीति में नहीं जाना चाहते थे। बचपन से ही वह संत बनकर ही समजा के लिए कुछ करना चाहते थे।

पिछले लोकसभा में नरेंद्र मोदी के खिलाफ उतारा था उम्मीदवार!

2019 के लोकसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार श्री भगवान पाठक का नामांकन रद्द होने पर अविमुक्तेश्वरानंद धरना पर बैठ गए थे। दरअसल, संतों के संगठन (राम राज्य परिषद) ने वाराणसी से नरेंद्र मोदी के खिलाफ श्रीभगवान पाठक को मैदान में उतारा था लेकिन एफिडेविट में खामी का हवाला देकर उनका नामांकन खारिज कर दिया था।

अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे लोकतंत्र की हत्या बताई थी। उन्होंने मीडिया से बातचीत कहा था,  "यह तानाशाही है। वह नहीं चाहते कि उनके सामने कोई लड़े। उनका बहुत विरोध है काशी में। काशी में उन्होंने जिस तरह से मंदिर को तोड़ा है, जिस तरह गंगा के खिलाफ छल किया है, जिस तरह से वादा पूरा नहीं कर पाए हैं... इसलिए वह चाहते हैं कि उन्हें जनता में न जाना पड़े। जाए तो अकेले जाए। ताकि सारा वोट उन्हें ही मिले। इसलिए वो ये करवा रहे हैं। ये गलत है। ये लोकतंत्र की हत्या है।"

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भाजपा की नीतियों पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा था, "हमें अधिकारियों से नहीं मिलने दिया जा रहा है। हम सड़क पर हैं। हम आदमी हैं। हम तो प्रधानमंत्री नहीं हैं। हम तो तानाशाह नहीं हैं। हमारे पास अमित शाह जैसा अध्यक्ष नहीं है। हमारे पास नोटबंदी कर के इकट्ठा किया हुआ पैसा नहीं है।"

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जब योगी आदित्यनाथ पर उठाया सवाल- संत सीएम नहीं हो सकता  

जनवरी 2022 में अविमुक्तेश्वरानंद ने योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने पर सवाल उठाते हुए कहा था, "संत महंत हो सकता है। लेकिन सीएम और पीएम नहीं। जब आप संवैधानिक पद पर बैठता है तो उसे धर्मनिरपेक्षता की शपथ लेनी पड़ती है, ऐसे में वह व्यक्ति धार्मिक कैसे रह सकता है। कोई भी व्यक्ति दो प्रतिज्ञाओं का पालन नहीं कर सकता- एक संतत्व की और एक संवैधानिक पद की। यह केवल इस्लाम में ही संभव है जहां राजा धार्मिक प्रमुख भी हो सकता है।"

प्राण प्रतिष्ठा में क्यों नहीं हो रहे शामिल?

वरिष्ठ पत्रकार करण थापर से बातचीत में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य ने बताया कि उन्हें प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के लिए निमंत्रण भेजा ही नहीं गया है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर उन्हें आमंत्रित किया गया होता, तब भी वहां नहीं जाते। उन्होंने कहा, "मैं बस भगवान के दरबार से आए आमंत्रण का सम्मान करते हुए अयोध्या तक चला जाता, लेकिन कार्यक्रम में शामिल नहीं होता।"  

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद महाराज ने कहा, "मैं नहीं जाना चाहता क्योंकि अगर शंकराचार्यों के सामने शास्त्रों के विपरीत कोई आचरण होता है तो वह स्वीकार नहीं किया जा सकता है। हम लोग यह चाहते हैं कि जो भी धर्म कार्य हो वह शास्त्रों के निर्देश पर हो।"

क्या मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण हुए बिना की जा सकती है मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा?

इस सवाल के जवाब में अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने करण थापर को बताया, "देखिए, अपने जितने भी वास्तुशास्त्र के ग्रंथ में हैं, किसी को उठा लीजिए। वहां स्पष्ट रूप से कहा गया है कि मंदिर भगवान का शरीर होता, मूर्ति उसकी आत्मा होती है। जैसे हमारे शरीर में अंग होते हैं वैसे ही मंदिर में अंग की कल्पना की गई है। मंदिर का कलश भगवान का सिर होता है। मंदिर का शिखर भगवान की आंखें होती हैं। प्राण प्रतिष्ठा वाले दिन सभी अंगों की प्रतिष्ठा होती है। अभी वहां आंख बना नहीं, सिर बना नहीं, मुख बना नहीं, बाल (ध्वजा) बना नहीं... ऐसी स्थिति में जब सिर बना ही नहीं, बिना सिर का केवल धड़ बना है और उसी धड़ में आप कहते हैं कि हम प्राण डाल देंगे। ये कितना गलत होगा। ये कोई सामान्य गलती नहीं है।" शंकराचार्य ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल गर्भगृह तैयार होने पर प्राण प्रतिष्ठा नहीं हो सकती है।

"22 जनवरी की तारीख किसी पंचांग में नहीं है"

जब शंकराचार्य से पूछा गया कि क्या 22 जनवरी की तारीख प्राण प्रतिष्ठा लिए सही है? इस पर उन्होंने जवाब दिया, "आप पूरे भारत से पंचांग मंगा लीजिए और किसी एक पंचांग में दिखा दीजिए, क्या किसी ने 22 जनवरी के मुहूर्त को प्रतिष्ठा मुहूर्त के रूप में छापा है? क्या पूरे देश के किसी ज्योतिषी ने इस मुहूर्त को पकड़ा ही नहीं। केवल एक व्यक्ति आ गया और उसने मुहूर्त को पकड़ लिया। अगर यह मुहूर्त इतना उत्तम था तो बाकी ज्योतिष क्यों नहीं पकड़ पाए। हमने तो बहुत सारे पंचांग मंगा कर देख लिया, मुझे तो 22 जनवरी को मुहूर्त नहीं दिखा। जिन्होंने यह मुहूर्त निकाला है वह काशी जी (वाराणसी) के हैं। अच्छे विद्वान हैं। सज्जन व्यक्ति हैं। हम भी उनका आदर सम्मान करते हैं। हमने उनका एक इंटरव्यू देखा जिसमें वह बताते हैं कि उनसे जनवरी महीने में मुहूर्त निकालने को कहा गया था। इसलिए उन्होंने मुहूर्त निकाल दिया।"

शंकराचार्य आगे कहते हैं, "इसका मतलब है कि कोई उन्हें प्रेरित कर रहा था कि आपको इसी टाइम फ्रेम में मुहूर्त देना है। उसमें उन्हें जो अच्छा लगा, बता दिया। इसमें मैं ज्योतिषी का दोष नहीं मानता।"  

शंकराचार्य का मतलब?

हिंदू धर्म के प्रचार प्रसार के लिए आदि शंकराचार्य ने चार मठों की स्थापना की थी। शंकराचार्य का शाब्दिक अर्थ होता है 'शंकर के मार्ग के शिक्षक'। एक धार्मिक उपाधि है। हिंदू धर्म में सर्वोच्च धर्मगुरु शंकराचार्य ही माने जाते हैं।

कहां-कहां हैं मठ और कौन हैं शंकराचार्य?

हिंदू धर्म की दार्शनिक व्याख्या करने वाले आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित मठ वर्तमान भारत के चार अलग-अलग राज्यों (कर्नाटक, ओडिशा, गुजरात और उत्तराखंड) में हैं।

राज्यमठशंकराचार्य
कर्नाटकश्रृंगेरी मठशंकराचार्य भारतीतीर्थ महाराज
ओडिशा (पुरी)गोवर्धन मठशंकराचार्य निश्चलानन्द सरस्वती महाराज
गुजरात (द्वारका)शारदा मठशंकराचार्य सदानंद महाराज
उत्तराखंड (बदरिका)ज्योतिर्मठशंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद महाराज

चार जनवरी पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने पत्रकारों से कहा, "मोदी (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) मंदिर का उद्घाटन करेंगे, वह मूर्ति को छूएंगे, तो मैं वहां क्या करूंगा? खड़े होकर ताली बजाऊंगा? 13 जनवरी को निश्चलानंद सरस्वती ने कहा था कि धार्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में राजनीतिक हस्तक्षेप उचित नहीं है।

टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक शारदा पीठ (द्वारका, गुजरात) के शंकराचार्य सदानंद महाराज ने 12 जनवरी को मीडिया से बातचीत में प्राण प्रतिष्ठा में शामिल न होने कारण बताया था। उन्होंने कहा था, "अगर कोई धार्मिक स्थल किसी विवाद में फंसा हो और उस पर धर्म विरोधी ताकतों का कब्जा हो तो वहां पूजा करना प्रतिबंधित होता है।"

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