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जब आरएसएस को हिंदू एकता मुहिम में 1956 और 1981 में लगे थे दो बड़े झटके, फिर संघ ने चलाए कई अभियान

आरएसएस ने 1925 में अपनी स्थापना के समय से ही हिंदू एकता का झंडा बुलंद रखा है। लेकिन उच्च जातियों और विशेषकर ब्राह्मणों के वर्चस्व वाले नेतृत्व की वजह से उसे हमेशा आलोचना का सामना करना पड़ा है।
Written by: Ankit Raj | Edited By: Ankit Raj
Updated: September 08, 2023 13:59 IST
जब आरएसएस को हिंदू एकता मुहिम में 1956 और 1981 में लगे थे दो बड़े झटके  फिर संघ ने चलाए कई अभियान
जाति-आधारित आरक्षण और RSS (Express Photo by Gurmeet Singh 05/10/2022)
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बुधवार (6 सितंबर) को कहा कि जब तक समाज में भेदभाव है तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए। यह बयान भागवत के आठ साल पहले व्यक्त किए विचार से अलग है, तब उन्होंने रिजर्वेशन सिस्टम की समीक्षा का आह्वान किया था। संघ प्रमुख का ताजा बयान जाति-आधारित आरक्षण पर आरएसएस के पुराने रुख से अलग है।

भागवत ने बुधवार को क्या कहा?

पीटीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में भागवत ने कहा, "सामाजिक व्यवस्था में हमने अपने ही बंधुओं को पीछे छोड़ दिया। हमने उनकी देखभाल नहीं की और यह 2000 सालों तक चला। जब तक हम उन्हें समानता नहीं प्रदान कर देते हैं तब तक कुछ विशेष उपचार तो होने ही चाहिए और आरक्षण उनमें एक है। इसलिए आरक्षण तब तक जारी रहना चाहिए जब तक ऐसा भेदभाव बना हुआ है। संविधान में प्रदत्त आरक्षण का हम संघवाले पूरा समर्थन करते हैं।"

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भागवत का बयान पहले कही किस बात से अलग है?

सितंबर 2015 में आरएसएस से जुड़े साप्ताहिक पत्रिका पांचजन्य और ऑर्गेनाइजर को दिए एक साक्षात्कार में भागवत ने आरक्षण की समीक्षा के लिए एक पैनल बनाने की बात कही थी। सरसंघचालक ने कहा था, "…पूरे राष्ट्र के हित को लेकर चिंतित और सामाजिक समानता के लिए प्रतिबद्ध लोगों की एक समिति बनाई जाए… उन्हें यह तय करना चाहिए कि किन श्रेणियों को आरक्षण की आवश्यकता है और कितने समय के लिए।"

भागवत ने बिहार में विधानसभा चुनाव से कुछ दिन पहले यह बात कही थी। तब ऐसा माना गया था कि इससे भाजपा को नुकसान होगा। हालांकि भागवत को जल्द ही अपनी गलती का एहसास हो गया था, लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ। 22 अक्टूबर तक जब दो चरणों के मतदान खत्म हो चुके थे और तीन चरण शेष थे। सरसंघचालक ने विजयादशमी के अपने पारंपरिक संबोधन में डॉ. भीमराव अम्बेडकर की तारीफ की और भाषण का अंत, "हिंदू एक रहे, भेदभाव को नहीं सहे" के नारों के साथ की।

लेकिन नीतीश कुमार की जद (यू), लालू प्रसाद की राजद, कांग्रेस और कुछ छोटी पार्टियों के महागठबंधन ने उनके बयान का इस्तेमाल मतदाताओं को यह समझाने के लिए किया कि आरएसएस और भाजपा एससी, एसटी और ओबीसी के आरक्षण के खिलाफ है। महागठबंधन को दो-तिहाई बहुमत मिला और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने।

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RSS ने कब-कब किया अम्बेडकर का जिक्र?

मोहन भागवत ने विजयदशमी के मौके पर अंबेडकर की जो प्रशंसा की उसे आरक्षण की समीक्षा वाले बयान का डैमेज कंट्रोल माना गया। हालांकि वह पहला मौका नहीं था जब आरएसएस ने बाबासाहेब को याद किया हो। आरएसएस ने 1925 में अपनी स्थापना के समय से ही हिंदू एकता का झंडा बुलंद रखा है। लेकिन उच्च जातियों और विशेषकर ब्राह्मणों के वर्चस्व वाले नेतृत्व की वजह से उसे हमेशा आलोचना का सामना करना पड़ा है।

विशेष रूप से दो घटनाओं के बारे में ऐसा माना जाता है कि उससे आरएसएस की "हिंदुओं को एकजुट करने" की कोशिश को झटका लगा। 1956 में विजयादशमी के दिन, जब सरसंघचालक एमएस गोलवलकर नागपुर के रेशम बाग में स्वयंसेवकों को संबोधित कर रहे थे। तब शहर के एक दूसरे हिस्से, दीक्षाभूमि में अंबेडकर ने लगभग पांच लाख अनुयायियों को बौद्ध धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया।

पच्चीस साल बाद, 1981 में तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले के मीनाक्षीपुरम में कथित निचली जाति के सैकड़ों हिंदुओं ने जाति उत्पीड़न से बचने के लिए इस्लाम अपना लिया। मीनाक्षीपुरम की घटना ने आरएसएस को झकझोर कर रख दिया। इसके बाद उसने अंबेडकर और दलितों का बार-बार आह्वान करना शुरू कर दिया।

तब ही से संघ ने हिंदू समागमों और सभाओं की पूरी एक श्रृंखला शुरू कर दी। 1982 में बेंगलुरु में आयोजित ऐसे ही एक कार्यक्रम में हजारों वर्दीधारी स्वयंसेवकों ने घोषणा की- "हिंदवः सहोदरः सर्वे (सभी हिंदू भाई हैं)।"

14 अप्रैल, 1983 को महाराष्ट्र में आरएसएस ने एक समारोह का आयोजन कर अपने संस्थापक केबी हेडगेवार और अंबेडकर दोनों का जन्मदिन मनाया था। दरअसल, उस वर्ष रोमन कैलेंडर के अनुसार अंबेडकर की जयंती और हिंदू कैलेंडर के अनुसार हेडगेवार की जयंती एक ही दिन पड़ गई थी। इस सिम्बोलिज्म को आगे बढ़ाने के लिए, आरएसएस ने 45 दिनों की फुले-अम्बेडकर यात्रा भी निकाली थी, जो पूरे महाराष्ट्र में घूमा।

1989 में हेडगेवार की जन्म शताब्दी वर्ष थी। तब मधुकर दत्तात्रेय देवरस सरसंघचालक और एचवी शेषाद्रि सरकार्यवाह थे। दोनों ने प्रत्येक आरएसएस शाखा को अपने क्षेत्र के दलित इलाकों में कम से कम एक शिक्षा केंद्र चलाने के लिए कहा था। ऐसी गतिविधियों को आयोजित करने के लिए आरएसएस में सेवा विभाग स्थापित किए गए।

इसके बाद के वर्षों में आरएसएस ने अंबेडकर और ज्योतिबा फुले का शताब्दी वर्ष भी मनाया। आरएसएस के भीतर निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था "अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा" ने एक प्रस्ताव पारित कर कहा था: "इन दोनों महान नेताओं ने हिंदू समाज में प्रचलित बुरी प्रथाओं और परंपराओं के उन्मूलन के लिए अभियान चलाया और सफलतापूर्वक हिंदू समाज को इसके लिए राजी किया।"

जाति-आधारित आरक्षण पर RSS का क्या रुख रहा है?

मोहन भागवत ने 2015 में जो बयान दिया था, वह संघ के पिछले तीन दशकों का दृष्टिकोण बताता है। 1981 में संघ ने एक प्रस्ताव पारित किया था जिसमें आरक्षण की नीति की समीक्षा के लिए गैर-राजनीतिक लोगों की एक समिति बनाने का आह्वान किया गया था और बाद के दशकों में भी यह उसी रुख पर कायम रहा। हालांकि, महत्वपूर्ण बात यह है कि जनसंघ और भाजपा दोनों ने जाति-आधारित आरक्षण जारी रखने की आवश्यकता पर जोर देने के अलावा, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए बार-बार कोटा की मांग की। 2019 में गरीबों के लिए आरक्षण लागू भी हुआ।

1981 में जब गुजरात में आरक्षण विरोधी आंदोलन भड़का, तो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा कि वंचित वर्गों के लिए न्याय सुनिश्चित करते समय योग्यता को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उस वर्ष अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (एबीपीएस) ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें "पक्षपात न करने वाले सामाजिक विचारकों की एक समिति के गठन की मांग की गई, जो आरक्षण से उत्पन्न होने वाली सभी समस्याओं का गहराई से अध्ययन करें और हरिजनों और आदिवासियों के उत्थान के लिए सकारात्मक कदम सुझाए…" अब ध्यान देने वाली बात यह है कि भागवत का 2015 का बयान इस मूल सूत्र से काफी मिलता-जुलता है।

एबीपीएस यह भी चाहता था कि विचारकों की समिति "आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों का त्वरित विकास सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक रियायतों की सिफारिश करे" साथ ही प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण से सहमत होते हुए एबीपीएस ने कहा था कि "आरक्षण एक स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकती है, जितनी जल्दी हो सके इन बैसाखियों को खत्म करना होगा…"

चार साल बाद 1985 में आरएसएस के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल (एबीकेएम) ने अपनी पहले की मांग को दोहराया कि केंद्र सरकार को बिना देरी किए जांच और मूल्यांकन के लिए प्रतिष्ठित और निष्पक्ष व्यक्तियों की एक प्रतिनिधि समिति बनानी चाहिए, आरक्षण की नीति पर एक राष्ट्रीय सहमति तैयार की जानी चाहिए, ताकि सामाजिक रूप से उपेक्षित और जरूरतमंद वर्गों को जरूरी सहायता मिल सके…"

इसी एबीकेएम में अपनाए गए एक अन्य प्रस्ताव में कहा गया था कि "…आरक्षण की नीति, जिसे हमारे पिछड़े और उपेक्षित भाइयों के विकास की गति को तेज करने और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने के साधन के रूप में डिजाइन और स्वीकार किया गया था, उसे अब बिना वजह आगे बढ़ाया जा रहा है।"

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