scorecardresearch
For the best experience, open
https://m.jansatta.com
on your mobile browser.

मंदिर मूवमेंट के 200 साल का इतिहास: 1822 में पहली बार अदालत पहुंचा था अयोध्या विवाद, कांग्रेस नेता थे 'राम जन्मभूमि आंदोलन' के शुरुआती अगुआ!

Ram Temple at Ayodhya: 1949 में फैजाबाद के कांग्रेस विधायक राघव दास ने बाबरी मस्जिद से रामलला की मूर्ति हटाए जाने पर इस्तीफा देने की धमकी दे दी थी। पढ़िए, मंदिर मूवमेंट के 200 साल के इतिहास का पार्ट-1
Written by: एक्सप्लेन डेस्क | Edited By: Ankit Raj
नई दिल्ली | Updated: January 22, 2024 13:20 IST
मंदिर मूवमेंट के 200 साल का इतिहास  1822 में पहली बार अदालत पहुंचा था अयोध्या विवाद  कांग्रेस नेता थे  राम जन्मभूमि आंदोलन  के शुरुआती अगुआ
प्राण प्रतिष्ठा के लिए सजा राम मंदिर (PTI Photo)
Advertisement
विकास पाठक

अयोध्या में 'राम जन्मभूमि आंदोलन' का लंबा इतिहास है। भव्य राम मंदिर के लिए दो शताब्दियों (200 वर्ष) से अधिक समय तक आंदोलन चलाया गया। इस बीच कई बार खून-खराबे हुए। यहां हम मंदिर आंदोलन का संक्षिप्त इतिहास जानेंगे, जिसने पिछले तीन दशकों में भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी।

पत्रकार से राजनेता बने, भाजपा के पूर्व राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज ने अपनी हालिया किताब Tryst With Ayodhya में लिखा है कि 1751 में मराठों ने अवध के नवाब से अयोध्या, काशी और मथुरा का नियंत्रण सौंपने की अपील की थी। मराठों ने नवाब की दोआब क्षेत्र में पठान सेनाओं को हराने में मदद की थी।

Advertisement

1756 में जब नवाब शुजा-उद-दौला ने अफगान आक्रमण के खिलाफ मराठों की मदद मांगी, तो मराठों ने अनुरोध किया कि तीन स्थल उन्हें हस्तांतरित कर दिए जाएं। हालांकि बाद में नवाब ने पाला बदल लिया और मराठा मांग अप्रासंगिक हो गई। इसके तुरंत बाद वे 1761 में अहमद शाह अब्दाली से पानीपत की तीसरी लड़ाई भी हारने के बाद मराठा साम्राज्य का पतन हो गया।

मंदिर के लिए पहला कोर्ट केस- 1822

पुंज का कहना है कि न्यायिक रिकॉर्ड में अयोध्या विवाद 1822 का है। हाफिजुल्लाह नामक एक अधिकारी ने 1822 में फैजाबाद अदालत में एक दलील दी थी कि अयोध्या में सीता रसोई के पास में राजा दशरथ के पुत्र भगवान राम का जन्मस्थान है, जहां बाबर ने मस्जिद बना दी थी।

28 जुलाई, 1855 को बाबरी मस्जिद के पास हनुमान गढ़ी मंदिर में हिंदू और मुसलमानों के बीच खूनी संघर्ष हुआ। दिन के अंत तक, नागा साधुओं और बैरागियों के नेतृत्व में हिंदुओं ने 70-75 मुसलमानों को मार डाला।

Advertisement

हालांकि घटना होने से पहले मेजर जनरल जीडी आउट्रम ने नवाब वाजिद अली शाह को सूचित किया था कि शाह गुलाम हुसैन ने हनुमान गढ़ी को नष्ट करने के लिए एक बड़ी सेना इकट्ठा की है, लेकिन टकराव को टाला नहीं जा सका। हनुमान गढ़ी के भीतर मजबूत होकर हिंदुओं ने न केवल हनुमान गढ़ी की रक्षा की, बल्कि उस रक्त-रंजित दिन पर 'जन्मस्थान' पर भी कब्जा कर लिया। इस बात का जिक्र 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में भी है।

Advertisement

फैसले में कहा गया है, "ऐसा कहा जाता है कि उस समय तक हिंदू और मुसलमान समान रूप से मस्जिद-मंदिर में पूजा करते थे। ब्रिटिश शासन में विवादों को रोकने के लिए एक रेलिंग लगाई गई। इसके बाद  मस्जिद में मुसलमान नमाज पढ़ने लगे और बाहर हिंदुओं ने एक चबूतरा बनाया है, जहां वे पूजा करने लगे।"

मिर्ज़ा जान द्वारा लिखित हदीगा-ए-शुहुदा में बताया गया है कि 1856 में अमीर अली ने 'राम जन्मभूमि' पर कब्जा करने की कोशिश की थी, लेकिन हमलावर को ब्रिटिश सैनिकों ने मार डाला था।

निहंग सिखों ने मस्जिद में किया हवन-पूजन-1858

30 नवंबर, 1858 को मोहम्मद सलीम नाम के एक व्यक्ति ने निहंग सिखों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी, जिन्होंने बाबरी मस्जिद के अंदर निशान साहिब स्थापित किया था और हवन किया था। साथ ही मस्जिद की दीवारों पर 'राम' लिख दिया था।

30 नवंबर, 1858 के दिन ही बाबरी मस्जिद के मुअद्दिन मुहम्मद असगर ने एक बैरागी के खिलाफ न्यायिक कार्यवाही की मांग की थी। उन्होंने प्रांगण में बनाए गए चबूतरे को तोड़ने की भी बात कही थी।

1885 में जन्मस्थान के महंत रघुबर दास ने बाबरी मस्जिद के करीब, लेकिन परिसर के भीतर राम चबूतरे पर राम मंदिर बनाने की अनुमति मांगने के लिए अदालत का रुख किया। इतिहासकार मीनाक्षी जैन अपनी पुस्तक राम और अयोध्या में इस मामले के बारे में विवरण देती हैं। याचिका इस आधार पर खारिज कर दी गई कि यदि यथास्थिति में गड़बड़ी हुई तो कानून और व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है।

यूपी सरकार से मंदिर की मांग- 1949

जुलाई 1949 में यूपी सरकार को एक याचिका दी गई कि उस स्थान पर एक मंदिर बनना चाहिए। सरकार ने मांग की जांच के लिए फैजाबाद जिला प्रशासन को भेज दिया। फैजाबाद के सिटी मजिस्ट्रेट गुरु दत्त सिंह ने अक्टूबर, 1949 को डीएम को एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें कहा गया कि जमीन सरकार की है और लोगों की रामलला में आस्था है और वे एक भव्य मंदिर चाहते हैं।

14 अगस्त, 1949 को हिंदू महासभा ने अयोध्या में राम जन्मभूमि, मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि और काशी में विश्वनाथ की 'मुक्ति' के लिए एक प्रस्ताव पारित किया। इसमें केंद्र सरकार द्वारा गुजरात में सोमनाथ मंदिर के निर्माण को एक उदाहरण की तरह पेश किया गया था।

20 अक्टूबर, 1949 से अयोध्या में रामचरितमानस का नौ दिवसीय अखंड पाठ आयोजित किया गया था। फैजाबाद के कांग्रेस विधायक राघव दास ने आखिरी दिन कार्यक्रम में भाग लिया, उन्होंने हिंदू महासभा के महंत दिग्विजयनाथ - महंत अवैद्यनाथ के गुरु (इनके शिष्य योगी आदित्यनाथ अब यूपी के मुख्यमंत्री हैं) और राम राज्य परिषद के स्वामी करपात्री के साथ मंच साझा किया।

मुस्लिम कांस्टेबल ने देखा मस्जिद में 'प्रकट हुए रामलला'

लिब्रहान आयोग के अनुसार 22-23 दिसंबर, 1949 की रात को अभिराम दास (संन्यासी बनने से पहले अभिराम दास का नाम अभिनंदन मिश्रा था) ने मस्जिद में रामलला की मूर्ति रख दी। राम मंदिर के समर्थकों ने दावा किया कि मूर्ति स्वयं प्रकट हुई और ड्यूटी पर तैनात मुस्लिम कांस्टेबल अब्दुल बरकत ने दावा किया कि वह मस्जिद में एक रोशनी देखकर बेहोश हो गए थे, उन्हें मस्जिद में "भगवान के समान बच्चे" की एक छवि दिखी थी।

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यूपी सरकार को मूर्ति हटवाने का निर्देश दिया। हालांकि, सिटी मजिस्ट्रेट गुरु दत्त सिंह ने मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत को फैजाबाद-अयोध्या में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी। इस वजह से उन्हें इस्तीफा भी देना पड़ा। गुरु दत्त सिंह विहिप नेता अशोक सिंघल के दादा थे, जिन्हें पहला कारसेवक कहा जाता है।

जिला मजिस्ट्रेट केके नायर ने भी कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए मूर्ति हटाने से इनकार कर दिया था। फैजाबाद के कांग्रेस विधायक राघव दास ने मूर्ति हटाए जाने पर इस्तीफा देने की धमकी दे दी थी। बाद में नगरपालिका बोर्ड ने उस स्थान का अधिग्रहण कर लिया, जिसके अंदर मूर्ति थी। नायर को डीएम पद से हटा दिया गया। नायर की पत्नी शकुंतला नायर ने हिंदू महासभा के टिकट पर गोंडा से 1952 का लोकसभा चुनाव जीता। गुरुदत्त सिंह बाद में नगर पालिका के चेयरमैन और जनसंघ (अब भाजपा) के जिला प्रमुख भी बने।

विहिप के राम जन्मभूमि आंदोलन में कांग्रेस नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका-1983

कांग्रेस नेता और यूपी के पूर्व मंत्री दाऊ दयाल खन्ना पहले राजनेता थे जिन्होंने मई 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर अयोध्या, काशी और मथुरा को हिंदुओं को सौंपने की मांग की थी। यूपी से कांग्रेस के दिग्गज नेता केंद्रीय मंत्री कमलापति त्रिपाठी ने खन्ना को आगाह किया कि वह बारूद से खेल रहे हैं और हिंदू-मुस्लिम एकता की कांग्रेस की नीति को नष्ट कर रहे हैं।

7 और 8 अप्रैल, 1984 को दिल्ली के विज्ञान भवन में आरएसएस से संबद्ध विश्व हिंदू परिषद की धर्म संसद में राम जन्मभूमि की 'मुक्ति' के लिए एक आंदोलन शुरू करने की घोषणा की गई। पूर्व अंतरिम प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा ने धर्म संसद का समर्थन किया और दाऊ दयाल खन्ना अयोध्या की "मुक्ति" के लिए राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के संयोजक बने।

आडवाणी की रथ यात्रा से पहले भी निकली गई थी एक यात्रा- 1984

पुंज ने अपनी पुस्तक में कहा है कि 1 जुलाई, 1984 को विहिप ने अयोध्या में एक बैठक में मंदिर आंदोलन के बारे में जन जागरूकता पैदा करने का निर्णय लिया। इसके परिणामस्वरूप राम जानकी यात्रा शुरू हुई, जो 25 सितंबर 1984 को बिहार के सीतामढी से शुरू हुई और 6 अक्टूबर को अयोध्या में समाप्त हुई।

जज ने बंदर देखकर मस्जिद का ताला खोलने का दिया फैसला!- 1986

2 फरवरी 1986 को विहिप ने अयोध्या में एक सार्वजनिक बैठक की, जिसमें सरकार से अयोध्या में एक भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए एक ट्रस्ट बनाने की मांग की गई।

फरवरी 1986 के मध्य में ऑल-इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड ने दिल्ली में बैठक की और राजनीतिक दलों से बाबरी मस्जिद को मुसलमानों को सौंपने की उनकी मांग का समर्थन करने का आग्रह किया।

3 फरवरी, 1986 को हाशिम अंसारी फैजाबाद जिला अदालत के आदेश के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चले गए। कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दे दिया। (अंसारी उन मूल वादियों में से एक थे, जिन्होंने 18 दिसंबर, 1961 को बाबरी मस्जिद पर कब्जा पाने के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से एक रिट याचिका दायर की थी।)

6 फरवरी 1986 को लखनऊ में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया गया।

दिसंबर, 1986 में फैजाबाद जिला न्यायाधीश केएम पांडे ने बाबरी मस्जिद के ताले खोलने का आदेश दिया और हिंदुओं को वहां प्रार्थना करने की अनुमति दी। जज ने बाद में अपनी किताब वॉयस ऑफ कॉन्शियस में दावा किया कि जब सुनवाई चल रही थी तो एक काला बंदर अदालत कक्ष की छत पर बैठा था। जब उन्होंने फैसला सुनाया और घर गए, तो उन्होंने अपने लॉन में "उसी बंदर" को देखा और "उसे कोई दिव्य शक्ति मानकर" उसे प्रणाम किया।

मंदिर आंदोलन के 200 साल के इतिहास का पार्ट-2

23-24 दिसंबर, 1986 को अखिल भारतीय बाबरी मस्जिद सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इस सम्मेलन से बाबरी मस्जिद आंदोलन समन्वय समिति (बीएमएमसीसी) के गठन का विचार आया। 30 मार्च 1987 को बाबरी मस्जिद आंदोलन समन्वय समिति ने दिल्ली में एक रैली भी की। मुस्लिम पक्ष की तरफ हुए कार्यक्रमों को देखते हुए वीएचपी ने अपने आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए राम मंदिर शिलान्या की घोषणा कर दी। कांग्रेस ने इसकी अनुमति भी दे दी। 9 नवंबर, 1989 को शिलान्यास समारोह आयोजित किया गया और दलित समुदाय के कामेश्वर चौपाल ने पहली राम शिला रखी। (विस्तार से पढ़ने के लिए फोटो पर क्लिक करें)

Ram Mandir
रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर जनपथ मार्केट (दिल्ली) की सजावट (PTI Photo/Shahbaz Khan)
Advertisement
Tags :
Advertisement
tlbr_img1 राष्ट्रीय tlbr_img2 ऑडियो tlbr_img3 गैलरी tlbr_img4 वीडियो