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जब बेनज़ीर भुट्टो के घर से मिले एक पत्र ने उड़ा दिए मणिशंकर अय्यर के होश, जानिए क्या था पूरा मामला

बेनज़ीर के घर की तलाशी के दौरान एक पत्र मिला था, जिसमें एक 'विदेशी राजनयिक' द्वारा जिया सरकार के खिलाफ आंदोलन को बढ़ावा देने की बात लिखी थी।
Written by: एक्सप्लेन डेस्क | Edited By: Ankit Raj
नई दिल्ली | Updated: December 27, 2023 18:24 IST
जब बेनज़ीर भुट्टो के घर से मिले एक पत्र ने उड़ा दिए मणिशंकर अय्यर के होश  जानिए क्या था पूरा मामला
बाएं से- बेनज़ीर भुट्टो और मणिशंकर अय्यर (PC- IE)
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पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो की 27 दिसंबर, 2007 को हत्या कर दी गई थी। उन पर एक सेकंड में तीन गोलियां चलाई गई थीं। बेनज़ीर भुट्टो दो बार पाकिस्तान की प्रधानमंत्री रहीं थी। पहली बार 1988 से 1990 तक और दूसरी बार 1993 से 1996 तक।

बेनज़ीर के पिता ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह ने फांसी दे दी थी। वह पहले पिता को फांसी से बचाने के लिए, फिर उसका बदला लेने के लिए और अंततः अपनी पार्टी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (PPP) को बचाने के लिए राजनीति में आई थीं। बेनज़ीर के दोनों भाइयों ने पाकिस्तान छोड़ दिया था, इस तरह वही अपने पिता की राजनीतिक वारिस थीं।

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ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को फांसी दिए जाने के बाद 1981 में पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह ज़िया-उल-हक़ के खिलाफ विपक्षी दलों ने एक राजनीतिक आंदोलन (Movement for the Restoration of Democracy) शुरू किया था। बेनजीर भुट्टो इसकी अगुआ थीं।

जब यह आंदोलन चल रहा था, तब मणिशंकर अय्यर पाकिस्तान में नियुक्त थे। वर्तमान में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अय्यर पहले IFS (Indian Foreign Service) अफसर थे। वह 1978 से 1982 के बीच इंडिया के पहले काउंसिल जनरल के रूप में पाकिस्तान में भी रहे थे।

उन्हीं दिनों तलाशी अभियान के दौरान बेनज़ीर के घर से एक पत्र मिला, जिसमें एक 'विदेशी राजनयिक' द्वारा जिया सरकार के खिलाफ आंदोलन को बढ़ावा देने की बात लिखी थी। अय्यर को जब उनकी पत्नी सुनीत ने बेनज़ीर के घर से पत्र मिलने की खबर सुनाई तो वह सन्न रह गए।

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अय्यर को आया शहीद का कॉल

वरिष्ठ कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने जगरनॉट बुक्स से प्रकाशित आत्मकथा Memoirs of A Maverick : The First Fifty Years (1941–1991) में इस किस्से को लिखा है।

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अय्यर ने लिखा है कि साल 1980 में उन्हें 'शहीद' नाम के एक व्यक्ति का बार-बार कॉल आता था। वह अय्यर से मिलना चाहता था। लेकिन अय्यर उसे कई बार स्पष्ट कर चुके थे कि शहीद कोई नाम नहीं होता। अगर वह अपना असली नाम और मिलने की वजह नहीं बताएगा, तो वह उससे बात नहीं करेंगे।

25 दिसंबर, 1980 को मणिशंकर अय्यर के घर के दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजे पर एक लड़का खड़ा था, जिसने मुस्कुराते हुए अपना नाम शहीद बताया। अब अय्यर के पास उससे बात करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। उन्होंने उसे घर के भीतर बुलाया और बैठने को कहा।

शहीद ने पहले अपने नाम का मतलब बताया। उसने कहा कि वह 'शहीद भुट्टो' (ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो) का अनुयायी है। भुट्टो की मौत के बाद उसने अपना असली नाम त्याग दिया था और खुद को 'शहीद' कहने लगा था।

शहीद ने अय्यर को बताया कि उसने अपने साथी पीपीपी कार्यकर्ताओं से उनके बारे में और बेनजीर व बेगम नुसरत सहित कई पीपीपी नेताओं के साथ उनकी व्यक्तिगत दोस्ती के बारे में बहुत कुछ सुना है।

अय्यर लिखते है, "शहीद के सहयोगी 4 जनवरी, भुट्टो के जन्मदिन पर एक समारोह की योजना बना रहे थे और मुझे चीफ गेस्ट के तौर पर आमंत्रित करना चाहते थे।" अय्यर ने निमंत्रण के लिए धन्यवाद कहा लेकिन समारोह में नहीं शामिल होने को लेकर असमर्थता जताई।

इसके बाद शहीद ने टॉपिक चेंज करते हुए अय्यर से पूछा कि बेनज़ीर ने जो आंदोलन शुरू किया है, उसके बारे में आप क्या सोचते हैं, क्या वह सफल होगा?

अय्यर ने अपनी राय व्यक्त करते हुए आंदोलन की दो प्रमुख कमियों की तरफ ध्यान दिलाया। अय्यर ने कहा, पहली बात तो ये कि बेनज़ीर एक बिंदु पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय आंदोलन पर एक साथ कई एजेंडा थोपने की कोशिश कर रही हैं। उन्हें एक मुद्दा चुनना चाहिए वह है "लोकतंत्र की बहाली।" उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि वह उन्हीं राजनीतिक दलों से हाथ मिला रही हैं जो उनके पिता को हटाने के लिए एकजुट हुए थे। ज्यादा एजेंडा होने से अन्य कुछ दल आंदोलन से बाहर निकल सकते हैं। जबकि एक बिंदु पर ध्यान केंद्रित करने से उन्हें एकजुट रखने की अधिक संभावना होगी।

अय्यर आगे कहते हैं, दूसरा यह कि उन्हें अपने आंदोलन में सभी राजनीतिक दलों को शामिल करना चाहिए, क्योंकि अगर उन्होंने किसी को भी छोड़ दिया, तो ज़िया अपनी तानाशाही को जनता की सरकार बताने के लिए उन पार्टियों को अपनी तरफ कर लेगा।

अय्यर ने जमात-ए-इस्लामी को आंदोलन से बाहर रखने को गलती बताया। बाद में ज़िया ने जमात-ए-इस्लामी को अपनी तरफ कर ही लिया था। अय्यर की सलाह लेने के बाद शहीद ने बहुत विनम्रता और शालीनता से उन्हें धन्यवाद कहा और चला गया। अय्यर के लिए यह एक आम बातचीत थी। जो कुछ महीने बाद बहुत खास होने वाली थी।

जब अखबार में छप गई अय्यर की सलाह!

अय्यर अपनी किताब में लिखते हैं, "23 अप्रैल, 1981 को शेक्सपियर के जन्मदिन होता है। मैं स्नान कर रहा था। तभी सुनीत अंदर आई और कराची मॉर्निंग न्यूज़ में एक समाचार पढ़ा। न्यूज में बताया गया था कि बेनज़ीर की गिरफ्तारी के बाद उनके घर की तलाशी लेने वाली पुलिस को एक पत्र मिला है जिससे पता चलता है कि जिया सरकार के खिलाफ आंदोलन को बढ़ावा देने में एक 'विदेशी राजनयिक' का हाथ है।"

समाचार के मुताबिक, बेनज़ीर के लिए पत्र 25 दिसंबर, 1980 को लिखा गया था। पत्र को एक पीपीपी कार्यकर्ता सामी मुनीर (अय्यर के दोस्त ज़की के भाई) ने कराची सेंट्रल जेल से बेनज़ीर को भेजा गया था। पत्र में बेनजीर को सूचित किया गया कि शहीद राजनयिक के घर से सीधे कराची सेंट्रल जेल गया था और सामी से बेनजीर को तत्काल कुछ महत्वपूर्ण सलाह देने के लिए कहा था, जो उसने राजनयिक से हासिल की थी।
 
पत्र में राजनयिक का नाम था, लेकिन समाचार रिपोर्ट ने इसे नहीं छापा गया था। पत्र में कहा गया था कि संबंधित राजनयिक पाकिस्तान को अच्छी तरह से जानते हैं और उनकी सलाह को गंभीरता से लिया जाना चाहिए क्योंकि वह पाकिस्तानी राजनीति को इतना समझते हैं जितना कोई पाकिस्तानी नहीं समझता। कुल मिलाकर सलाह यह थी कि यदि आंदोलन को सफल बनाने के लिए एक सूत्री व सर्वदलीय कार्यक्रम होना चाहिए!

अय्यर लिखते हैं, "मैं यह समाचार सुनकर शॉवर में ही सन्न रह गया।"

अय्यर बताते हैं, "निस्संदेह इससे मेरा अंत तय हो गया। शहीद नामक भुट्टो का एक प्रशंसक वास्तव में एक समारोह में मुख्य अतिथि बनने के लिए मुझे आमंत्रित करने के लिए मुझसे मिलने आया था और हमने कुछ समय पाकिस्तानी राजनीति और भुट्टो के बारे में खुलकर बात की थी। आंदोलन पर मेरी सलाह की बारीकियों को समीर ने बेनज़ीर को बता दिया था।"

जिस रोज अखबार में खबर छपी, उसी दिन अय्यर को पर्सन नॉन ग्रांड घोषित कर दिया गया।

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