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जाति जनगणना के आंकड़ों से बिहार में क्या-क्या बदलने वाला है? जानिए 70 के दशक के बाद 'जाति की राजनीति' ने राज्य में कैसे बदला पावर इक्वेशन

ऐतिहासिक रूप से देखें तो भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और लाला (कायस्थ) एक साथ बिहार की राजनीतिक और जातीय धरातल पर हावी रहे हैं। यह बिहार के प्रमुख ज़मींदार थे। 1970 के दशक तक, उनके प्रभुत्व को काफी हद तक चुनौती नहीं दी गई थी।
Written by: एक्सप्लेन डेस्क | Edited By: Ankit Raj
Updated: October 07, 2023 17:06 IST
जाति जनगणना के आंकड़ों से बिहार में क्या क्या बदलने वाला है  जानिए 70 के दशक के बाद  जाति की राजनीति  ने राज्य में कैसे बदला पावर इक्वेशन
पटना में 3 अक्टूबर को ऑल पार्टी मीटिंग के दौरान बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता विजय कुमार सिन्हा और अन्य नेता। (PTI Photo)
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बिहार सरकार ने गांधी जयंती (2 अक्टूबर) के मौके पर राज्य के जातियों के आंकड़े जारी किए। बिहार सरकार के जातिगत सर्वे से पता चला है कि अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की संख्या राज्य की कुल जनसंख्या में 63 प्रतिशत है। तथाकथित 'अगड़ी' जातियां 15.5 प्रतिशत हैं।

माना जा रहा है कि बिहार के जाति विभाजन पर प्रकाश डालने वाले इन आंकड़ों के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। अर्थशास्त्री एमआर शरण ने द इंडियन एक्सप्रेस से बिहार में जाति, जाति की राजनीति, उसके इतिहास और हालिया जातिगत सर्वेक्षण पर बात की है। उन्होंने यह बताया है कि जाति सर्वे से नीति निर्माण और राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।

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यहां से आगे एमआर शरण के विचार पढ़ें:

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ऐतिहासिक रूप से देखें तो भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और लाला (कायस्थ) एक साथ बिहार की राजनीतिक और जातीय धरातल पर हावी रहे हैं। यह बिहार के प्रमुख ज़मींदार थे। 1970 के दशक तक, उनके प्रभुत्व को काफी हद तक चुनौती नहीं दी गई थी। तब तक के अधिकांश प्रमुख बिहारी नेता या तो इन चार जातियों से होते थे या 'शक्तिशाली पिछड़ी जातियों से, जिनमें यादव, कोइरी (कुशवाहा) और कुर्मी शामिल हैं। ये पिछड़ी जातियां संख्यात्मक रूप से बड़ी रही हैं।

1970 के दशक के अंत में क्या बदलाव आया?

सबसे पहली घटना तो यह हुई की पिछड़ी जाति (नाई) से आने वाले कर्पूरी ठाकुर (1924-88) जून 1977 में मुख्यमंत्री बन गए। वह 1970-71 में भी कुछ महीने को लिए इस पद पर रहे थे। इसे एक की परिणति के रूप में देखा जा सकता है। यह प्रक्रिया 1960 के दशक के अंत में शुरू हुई, जब पहली बार बड़ी संख्या में पिछड़ी जाति के सदस्यों ने बिहार विधानसभा में प्रवेश किया।

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1978 में कर्पूरी ठाकुर ने पहली बार लेयर्ड रिजर्वेशन का एक मॉडल लागू किया। इसके तहत 26 प्रतिशत कोटा को चार भागों में बांट दिया गया। 12 प्रतिशत पिछड़ा समुदाय को मिला। 8 प्रतिशत पिछड़ा समुदाय के गरीबों को मिला। 3 प्रतिशत महिलाओं को मिला और शेष 3 प्रतिशत गरीब अपर कास्ट के हिस्से गया। ठाकुर को लालू प्रसाद और नीतीश कुमार का गुरु माना जाता है

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दूसरी बड़ी घटना थी जेपी आंदोलन। जयप्रकाश नारायण (1902-79) के नेतृत्व वाले आंदोलन ने लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, सुशील कुमार मोदी और रविशंकर प्रसाद जैसे करिश्माई छात्र नेताओं को राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। इन नेताओं ने आगे चलकर 90 के दशक में बिहार की राजनीति को आकार दिया।

बिहार में जाति की कहानी में लालू की भूमिका?

1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव का राजनीति में आना कास्ट रिलेशन के संदर्भ एक मौलिक क्षण था। उन्होंने चार "उच्च" जातियों की राजनीतिक शक्ति को सीधे चुनौती दी। उन्होंने उकसाने वाला एक नारा दिया था- "भूरा बाल (भूमिहार-राजपूत-ब्राह्मण-लाला) साफ करो"

मानवविज्ञानी जेफरी एल विटसो तर्क देते हैं कि लालू ने नौकरशाही समेत सभी एलिट डोमेन में उच्च जातियों के पावर को चुनौती दी। इसके साथ ही उन्होंने स्थानीय नेताओं को सशक्त बनाकर, जो अक्सर पिछड़ी जातियों से होते थे या मुसलमान होते थे। इस चीज ने पूरे कास्ट इक्वेशन को बदल डाला।

लालू यादव के शासन काल में सामाजिक संबंधों में ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला। कई जगहों पर पिछड़ी और ऊंची जातियों के बीच सोशल रिलेशन बदल गए। हालांकि, उन्होंने "राज्य में विकास की जगह लोकतंत्र को लाने में प्राथमिकता दी", विट्सो कहते हैं कि इसका मतलब यह है कि समग्र रूप से राज्य को कुछ मायनों में नुकसान हुआ।

1990 के दशक में कानून-व्यवस्था ध्वस्त हो गई और बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ। जबकि ठीक इसी वक्त देश के बाकी हिस्सों में तेजी से विकास हो रहा था। लालू यादव का शासनकाल वह आग थी जिसने बिहार के कास्ट सोसाइटी को झुलसा दिया। हालांकि कोई यह तर्क दे सकता है कि इस आग ने जंगल के कुछ हिस्सों को भी जला दिया।

मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने से क्या बदला?

बिहार में आज भी और 40 साल पहले भी, सरकारी नौकरी अधिकांश परिवारों के लिए प्रोग्रेस की लॉटरी थी। यह आशा की गई थी कि आरक्षण कई लोगों के जीवन को मौलिक रूप से बदल देगा।

मंडल की सिफारिशों ने ओबीसी के बीच पहले से ही मजबूत जाति चेतना को और मजबूत किया। कर्पूरी ठाकुर जैसा मंडल की चर्चा शुरू होने से बहुत पहले ही एक बड़े नेता थे। मंडल के आने तक पिछड़ी जातियों के छात्र नेता पहले से ही प्रभावशाली थे। मंडल जो करने में कामयाब रहे, वह ऊंची जातियों के बीच संबंधों को मजबूत करना था क्योंकि वे आरक्षण का विरोध करने के लिए एक साथ आ गए।

नीतीश कुमार के आने पर क्या बदला?

नीतीश समझ गए कि यादव और मुस्लिम मजबूती से लालू के साथ हैं, लेकिन ऊंची जातियों, दलितों और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) को वोट को अपनी तरफ किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने ईबीसी और दलितों के एक वर्ग को साधने के लिए नीतियां लाईं। उदाहरण के लिए बिहार के इतिहास में पहली बार लोकल पॉलिटिकल पोजीशन पर आरक्षण लागू किया हुआ। नीतीश कुमार ने न सिर्फ महिलाओं और दलितों के लिए बल्कि ईबीसी के लिए भी आरक्षण लागू किया। इस समूह के ध्यान में रखकर नीतियां बनाई।

उन्होंने यह भी समझा कि अनुसूचित जाति समूहों के भीतर, कुछ बाकियों की तुलना में बेहतर स्थिति में थे। उदाहरण के लिए, पासवान ऐतिहासिक रूप से शक्तिशाली जमींदारों के अंगरक्षक थे और सामंती शक्तियों के साथ उनके काफी अच्छे संबंध थे। लेकिन निम्न दलित जैसे माझी या डोम के साथ ऐसा नहीं था। इसलिए उन्होंने दलितों से अलग एक 'महादलित' समुदाय की पहचान की। 2007 में एक महादलित विकास मिशन बनाया। महादलित समुदाय को फायदा पहुंचाने वाली नीतियों का एक अलग सेट आगे बढ़ाया।

जब उत्तराधिकारी चुनने की बात आई, तो नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जेडीयू ने 2014-15 में नौ महीने के लिए बिहार के पहले महादलित मुख्यमंत्री के रूप में जीतन राम मांझी को चुना।

ईबीसी, ओबीसी से कैसे अलग हैं?

हाल के सर्वेक्षण के अनुसार, अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) बिहार में सबसे अधिक आबादी वाला जाति समूह है। उसकी आबादी 36% है। ईबीसी और पावरफुल ओबीसी के बीच बुनियादी असमानता भूमि स्वामित्व (जमीन पर मालिकाना हक) को लेकर है।

2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) में संपत्ति स्वामित्व के मामले में नीचे की सभी जातियां दलित हैं, लेकिन उनके ठीक ऊपर की कई जातियां ईबीसी हैं। इसलिए ईबीसी न केवल भूमि-स्वामित्व और जाति पदानुक्रम में अन्य ओबीसी से नीचे हैं, बल्कि धन पदानुक्रम में भी, वे सबसे निचले पायदान पर हैं।

चूंकि ओबीसी आरक्षण एक सिंगल कैटेगरी है, इसलिए इसका अधिकांश लाभ शक्तिशाली पिछड़ों को मिलता है, जो सर्वेक्षण के अनुसार, राज्य की आबादी में 27% हैं। जाहिर है ये संख्या ईबीसी आबादी से काफी कम है। नीतीश और कर्पूरी ठाकुर ने ईबीसी को पहचाना और उनके लिए नीतियां बनाई। अब उनके आकलन का समर्थन करने के लिए नंबर भी आ गए हैं।

यदि ओबीसी के भीतर की परतें 1970 के दशक से पता हैं, तो अब केवल संख्या मालूम चल जाने से ईबीसी को मदद कैसे मिलेगी?

ईबीसी मूल रूप से शक्तिशाली पिछड़ों से अलग हैं। उन्हें ओबीसी कैटेगरी में डालने से उनका बड़ा नुकसान होता है क्योंकि वे पदानुक्रम में सबसे नीचे बने रहते हैं। दलितों और महादलितों के साथ भी ऐसा ही है। यदि कुछ समूहों को दूसरों की तुलना में अधिक सहायता की आवश्यकता होती है, तो उनका डेटा होना महत्वपूर्ण है। इससे कम से कम उन समूहों को अपने लिए वैध दावे करने में मदद मिलती है।

बिहार में 130 मिलियन से अधिक लोग रहते हैं और यदि यह एक देश होता, तो यह दुनिया का 10वां सबसे बड़ा देश होता। पिछड़े और ईबीसी इस विशाल जनसमूह का 27% और 36% हैं। अकेले बिहार में ईबीसी स्वीडन की आबादी से चार गुना अधिक है। इसके अलावा, सर्वेक्षण हमें यह समझने में भी मदद कर सकता है कि मुस्लिम समाज के भीतर जाति कैसे काम करती है।

डेटा होने से नीतियां बेहतर कैसे होंगी?

पंचायत स्तर के उदाहरण से समझते हैं। राज्य सरकार ने पंचायत के मुखिया के पद पर दलितों के लिए आरक्षण लागू कर रखा है। आरक्षण तय करने का एक तरीका है। किस ब्लॉक के कितने ग्राम पंचायत के मुखिया दलित होंगे, यह उस ब्लॉक में दलितों की आबादी पर निर्भर करता है। मान लीजिए कि एक ब्लॉक में 15 ग्राम पंचायत हैं और पूरे ब्लॉक में दलितों की आबादी 20 प्रतिशत है, तो ब्लॉक के 20 प्रतिशत मुखिया दलित बनेंगे। यानी 15 ग्राम पंचायत मुखिया में से 3 दलित होंगे।

पंचायत स्तर पर इसी तरह का आरक्षण ईबीसी के लिए भी है। लेकिन किस ब्लॉक में ईबीसी की कितनी आबादी है यह पता नहीं थी। इसलिए सरकार ने यह नियम बना दिया कि 20 प्रतिशत तक सीटें ईबीसी के लिए आरक्षित की जा सकती हैं।
 
हालांकि अब सरकार के पास भौगोलिक स्तर पर विस्तृत जाति डेटा है। तो सरकार तय कर सकती है कि ईबीसी के लिए कितनी सीटें आरक्षित करनी हैं। इस तरह जाति सर्वेक्षण नीतियों को तर्कसंगत बना सकता है। ऐसी नीतियां आगे चलकर शासन व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव डाल सकती हैं।

आंकड़ों से तुरंत क्या बदलने वाला है?

तुरंत की बात करें तो कुछ राजनीतिक दल अधिक आरक्षण की मांग कर सकते हैं। अल्पावधि में बहुत कुछ बदलने की संभावना नहीं है। इससे पहले कि ज़मीन पर बेहतर कार्यक्रम देखने को मिले, सरकार को संख्या-संकलन और नीतियां तैयार करने में समय लगाना होगा। अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले किसी बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए ।

साथ ही, यह सब डेटा के अच्छे होने पर निर्भर है और हमें अभी तक इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। सरकार के पास राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक शक्ति है। डेटा कैसे एकत्र किया गया और तर्कसंगत बनाया गया इसे लेकर विशेष जानकारी नहीं है।

आलोचकों का कहना है कि सर्वेक्षण के नतीजे आरक्षण के लिए तीव्र संघर्ष और सामाजिक उथल-पुथल को बढ़ावा देंगे। हालांकि यदि डेटा कुछ जातियों जो हाशिए की आबादी के भीतर अतिरिक्त हाशिए पर हैं, अपने अधिकारों के लिए वैध दावे करने करती हैं, तो यह ठीक भी है।

मैं यह नहीं समझ पाता कि आरक्षण के लिए संघर्ष करना समाज के लिए बुरा कैसे है। बेसलाइन पर पहले से ही काफी धक्का-मुक्की हो रही है। यदि आरक्षण 50% का आंकड़ा पार कर जाता है (जैसा कि इंद्रा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित किया गया था), तो इसमें कोई बुराई नहीं है। तमिलनाडु में 70% आबादी के लिए आरक्षण है और इससे वहां कोई उथल-पुथल नहीं मची है।

राजनीति और निहितार्थ: इस सर्वेक्षण की क्या आवश्यकता थी?

सर्वेक्षण जद(यू) द्वारा प्रस्तावित किया गया था। नीतीश के पास कोई मजबूत जाति आधार नहीं है। यहां तक कि इस सर्वेक्षण से पता चलता है कि उनकी जाति कुर्मी की आबादी के 3% से कम है। उन्हें अपने पीछे और अधिक जातियों को एकजुट करने की आवश्यकता है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि यह सर्वेक्षण नीतीश की व्यक्तिगत राजनीति से पैदा हुआ।

लेकिन साथ ही सर्वेक्षण के प्रस्तावक नीतीश और लालू जेपी आंदोलन से उभरे है। उनकी राजनीति का पता राम मनोहर लोहिया के समाजवाद से लगाया जा सकता है। सामाजिक न्याय का उनका सिद्धांत बेहतर गणना पर आधारित था ताकि सभी जातियों के बेहतर प्रतिनिधित्व मिल सके।

राष्ट्रीय स्तर पर एकत्र किया गया SECC डेटा विभिन्न कारणों से जारी नहीं किया गया था। लेकिन भारत सरकार कम से कम तीन दशकों से स्थानीय स्तर पर जाति का डेटा प्राप्त करने पर विचार कर रही है।

यह बिहार में इसलिए संभव हो पाया क्योंकि लालू और नीतीश अब एक साथ हैं। शायद अगर नीतीश अभी भी बीजेपी के साथ होते तो चीजें अलग होतीं। इसके अलावा बिहार में राजनीति में शक्तिशाली पिछड़ों का एक इतिहास रहा है, जैसा कि यूपी में नहीं है।

बीजेपी सर्वे का विरोध क्यों कर रही है?

भाजपा 'हिंदू एकता' को बनाए रखने के अपने लक्ष्य को लेकर चलती है। वह हिंदुओं को विभाजित करने की क्षमता वाली किसी भी चीज़ का विरोध करेगी। नरेंद्र मोदी की चुनावी सफलता के पीछे एक कारण हिंदू वोटों का एकीकरण है। हालांकि यह रेखांकित करना महत्वपूर्ण है कि जाति सर्वेक्षण का विरोध भाजपा के सेंट्रल लेवल के नेता कर रहे हैं, पार्टी की बिहार इकाई विरोध में शामिल नहीं है। बिहार में भाजपा का आधार बहुत व्यापक है, पार्टी को कई ईबीसी और दलित भी समर्थन की पेशकश कर रहे हैं।

क्या यह मंडल 2.0 जैसा क्षण हो सकता है?

डेटा यदि यह सही है, तो पिछड़ों की राजनीति करने वाली पार्टियों की मांगों में वजन और ताकत जोड़ देगा। उन्हें अपने वोट बैंक के लिए नीतियां बनाने में मदद मिलेगी। इंडिया गठबंधन में अधिकांश दल पिछड़ों के लिए मांग करेंगे। और फिर भी यह गेम चेंजर नहीं हो सकता, खासकर आने वाले चुनावों के लिए।

कुछ जद (यू) और राजद नेताओं का दावा है कि यह मंडल 2.0 जैसा क्षण है। मंडय का यह आह्वान पूरी तरह से राजनीतिक है। लेकिन यह निश्चित रूप से आने वाले समय में शुरू होने वाली किसी बड़ी चीज का शुरुआती बिंदु हो सकता है।

(एमआर शरण असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। वह University of Maryland में अर्थशास्त्र पढ़ाते हैं। उनके रीसर्च का क्षेत्र बिहार रहा है। उन्होंने बिहार पर "Last Among Equals: Power, Caste and Politics in Bihar’s Villages" नाम से किताब भी लिखी है।)

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