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कौन बनाता है नोबेल प्राइज विजेताओं का पोट्रेट, क्यों काले और सुनहरे रंग का ही होता है इस्तेमाल, आर्टिस्ट को कितने देर पहले बताया जाता है नाम?

विजेताओं का चयन करने वाली समिति के सदस्यों के अलावा पोट्रेट बनाने वाला कलाकार ही दुनिया का वह इकलौता व्यक्ति हैं, जो यह दावा कर सकता है कि उसे घोषणा से पहले ही विनर्स के नाम मालूम थे।
Written by: एक्सप्लेन डेस्क | Edited By: Ankit Raj
Updated: October 06, 2023 16:43 IST
कौन बनाता है नोबेल प्राइज विजेताओं का पोट्रेट  क्यों काले और सुनहरे रंग का ही होता है इस्तेमाल  आर्टिस्ट को कितने देर पहले बताया जाता है नाम
नोबेल प्राइज विजेताओं के पोट्रेट के साथ Niklas Elmehed (Photo Credit - Instagram/niklaselmehed)
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अक्टूबर के महीने में नोबेल पुरस्कार विजेताओं के नाम के साथ-साथ एक खास तरह का पोट्रेट भी जारी किया जाता है। काले बॉर्डर के भीतर भरे सुनहरे रंग से बनी वह आकृतियां अब नोबेल प्राइज के पहचान से जुड़ गई हैं। हर साल विजेताओं के नाम के घोषणा के साथ ही नोबेल का आधिकारिक चित्र दुनिया भर के समाचार लेखों, न्यूज चैनलों, पत्रिकाओं और सोशल मीडिया पर बेतहाशा नजर आने लगता है।

नोबेल पुरस्कार विजेताओं के काले-सुनहरे पोट्रेट के साथ एक दिलचस्प बात और जुड़ी है। दरअसल विजेताओं का चयन करने वाली समिति के सदस्यों के अलावा पोट्रेट बनाने वाला कलाकार ही दुनिया का वह इकलौता व्यक्ति हैं, जो यह दावा कर सकता है कि उसे घोषणा से पहले ही विनर्स के नाम मालूम थे। तो आइए जानते है उसी कलाकार के बारे में:

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नोबेल प्राइज के लिए आधिकारिक पोट्रेट बनाने वाले स्वीडिश कलाकार का नाम है- निकलास एलमेहेड (Niklas Elmehed)। साल 2021 में नोबेल प्राइज के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल्स से यह जानकारी सार्वजनिक की गई थी।

एलमेहेड ने अपनी वेबसाइट पर बताया है, ''मुझे नोबेल मीडिया के कला निर्देशक के रूप में काम पर रखा गया था। साल 2012 से मैं सभी विजुअल कंटेंट की जिम्मेदारी संभाल रहा हूं।'' एलमेहेड को फुटबॉल और किक बॉक्सिंग बहुत पसंद है। वह शादीशुदा हैं। उनके तीन बच्चे हैं, एक बेटा और दो बेटी।

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पोट्रोट ही क्यों, फोटो क्यों नहीं?

फोटो के बजाय हाथ से बने पोट्रेट का विचार आवश्यकता से उपजा है। साल 2012 से पहले नोबेल पुरस्कार विजेताओं के नाम की घोषणा के साथ कैमरे से खींची गई सामान्य तस्वीर ही जारी की जाती थी। लेकिन तब कई समस्याएं आती थी। जैसे पुरस्कार पाने वाले कई वैज्ञानिकों की तस्वीर प्राप्त करना बहुत कठिन था।

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ज्यादातर वैज्ञानिकों की तस्वीर बेहद खराब क्वालिटी की मिलती थी क्योंकि उन तस्वीरों को किसी संस्थान के स्टाफ मेंबर वाली सूची से निकाला जाता था। कम-रिज़ॉल्यूशन वाली उन तस्वीरों में चेहरा पहचानना भी मुश्किल होता था। घोषणा से पहले विजेताओं को भी पता नहीं होता कि वह विजेता हैं, इसलिए ताजा फोटोग्राफ भी संभव नहीं था। उपलब्ध तस्वीरों के साथ कॉपीराइट का संकट भी जुड़ा रहता था।

साल 2012 में निकलास एलमेहेड ने नोबेल के लिए ब्लैक मार्कर से पहली बार पोट्रेट बनाया क्योंकि उन्हें विजेताओं की तस्वीर नहीं मिली। तब से ही फोटो की जगह पोट्रेट जारी किया जाने लगा। द हिंदू को दिए एक साक्षात्कार में एलमेहेड पोट्रेट की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए बताते हैं, ''मैं उनकी आंखों पर बहुत काम करता हूं - ऐसा लगता है कि वे सीधे दर्शक को देख रहे हैं। इसके पीछे की अवधारणा 'ब्रेकिंग न्यूज' की भावना को दर्शाना है। जब लोग इन छवियों को देखते हैं, तो वे तुरंत उन्हें नोबेल पुरस्कार की घोषणाओं से जोड़कर देखते हैं।''

पोट्रेट में होता है सोने का इस्तेमाल

एलमेहेड बताते हैं कि साल 2017 में तय किया गया कि नोबेल पुरस्कार विजेताओं के नाम की घोषणा में मुख्य रंग सुनहरा होगा। यहीं से उन्हें पोट्रेट में सोने की पन्नी के उपयोग का विचार आया है। पोट्रेट पर एक विशेष गोंद लगाकर ऊपर से सोने की पन्नी लगायी जाती है। सफेद बैकग्राउंड पर काले बॉर्डर के बीच में भरा सोना, चित्र को बेहद आकर्षक बनाता है। 2014 से 2017 तक पोट्रेट में नीले और पीले रंग का इस्तेमाल होता था।

पोट्रेट के लिए कितने देर पहले बताया जाता है नाम?

इस सवाल के जवाब में एलमेहेड कहते हैं, ''यह सबसे सामान्य प्रश्न है, जो मुझसे सबसे अधिक बार पूछा जाता है। लेकिन दुर्भाग्य से मैं यह नहीं बता सकता कि मुझे कितनी देर पहले बताया जाता है। मैं बहुत तेज काम करता हूं। कुछ घंटों में पोट्रेट को अंतिम रूप दे देता हूं। हालांकि इसके लिए पहले से बहुत तैयारी होती है - यह एक खेल के आयोजन की तरह है। आपको हफ्तों, यहां तक कि वर्षों तक प्रशिक्षण लेना होता है, फिर रेस में शामिल होना होता है।''

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