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भारत ही नहीं अंग्रेजों ने फिलिस्तीन के बंटवारे का भी बनाया था प्लान, UN यहूदियों को दे रहा था 55% जमीन, पढ़िए कब्जे की कहानी का पार्ट-2

अंग्रेज भारत की तरह फिलिस्तीन का भी बंटवारा करना चाहते थे। जब दोनों पक्ष समहम नहीं हुए तो ब्रिटेन 'फिलिस्तीन' को संयुक्त राष्ट्र के हवाले कर, वहां से निकल गया।
Written by: एक्सप्लेन डेस्क | Edited By: Ankit Raj
Updated: October 18, 2023 19:55 IST
भारत ही नहीं अंग्रेजों ने फिलिस्तीन के बंटवारे का भी बनाया था प्लान  un यहूदियों को दे रहा था 55  जमीन  पढ़िए कब्जे की कहानी का पार्ट 2
बाएं से- यूएन जनरल असेंबली और प्रस्तावित पार्टीशन प्लान (PC- Wikipedia)
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यशी

यहूदियों के पलायन के इतिहास के पार्ट-1 में हमने जाना था कि फिलिस्तीन से यहूदियों का धार्मिक संबंध क्या है? किस तरह दुनिया के कई देशों में समृद्ध अल्पसंख्य समुदाय होने के बावजूद यहूदियों को भेदभाव का समाना करना पड़ा?

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कैसे उन्होंने अपने लिए अलग देश के मुद्दे को आंदोलन का रूप दिया? क्यों युगांडा और अर्जेंटीना के नाम पर चर्चा कर रहे यहूदियों ने बसने के लिए फिलिस्तीन को चुना और कैसे पलायन का सिलसिला प्रथम विश्व युद्ध के बहुत पहले एक रणनीति के तहत शुरू हुआ?

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प्रथम विश्व युद्ध में यहूदियों का समर्थन पाने के लिए ब्रिटिश अधिकारी आर्थर जेम्स बालफोर ने प्रभावशाली यहूदी बैरन लियोनेल वाल्टर रोथ्सचाइल्ड को पत्र लिखकर फिलिस्तीन में यहूदी राष्ट्र बनाने में मदद करने का वादा किया और यही टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। विस्तार से पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें- युगांडा और अर्जेंटीना को अपना देश बनाने वाले थे यहूदी, फिर रणनीति के तहत फिलिस्तीन में किया पलायन, पढ़िए कब्जे की कहानी का पार्ट-1

पार्ट-1 का फीचर इमेज

अब यहां से पार्टी-2

प्रथम विश्व युद्ध में ऑटोमन एंपायर की हार के बाद, ब्रिटेन और फ्रांस ने उसे आपस में बांट लिया। फिलिस्तीन ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया। इसके बाद तीन दशकों तक फिलिस्तीन के मुद्दे को हल करने के लिए कई आयोग बने, स्वेत पत्र लाए गए, यहां तक की हिंसा भी भड़की और हजारों लोगों की जान भी गई।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद अरब हताश थे और खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे। उन्होंने कई मौकों पर यहूदी बस्तियों पर हमला किया। रेल की पटरियां उखाड़ दी। वे यह मानते हुए अंग्रेजों का भी विरोध कर रहे थे कि 'यहूदी समस्या' को हल करने के लिए अंग्रेजों से आज़ादी आवश्यक है।

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इस दौरान यहूदियों ने अपनी कुशल खुफिया एजेंसी और प्रशिक्षित सेना तैयार कर ली। कुछ उदारवादी यहूदी, जो अरब लोगों के अधिकारों की वकालत कर रहे थे, उन्हें साइड लाइन कर दिया गया। जल्द ही समुदाय के भीतर उन्होंने अपना प्रभाव खो दिया।

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अरब की तरह से मोटे तौर पर दो प्रतिद्वंद्वी गुट उभरे। पहला गुट था यरूशलेम के प्रमुख मुफ्ती मोहम्मद अमीन अल-हुसैनी का और दूसरा था प्रभावशाली नशाशिबी परिवार का। सशस्त्र प्रतिरोध करने वाले ग्रुप राजनीतिक गुटों से अलग काम कर रहे थे।

उस दौरान भी यहूदियों और अरबों के बीच बातचीत के कुछ प्रयास हुए। इसमें 1919 का समझौता महत्वपूर्ण। हालांकि वह समझौता जल्द ही विफल हो गया था।

द्वितीय विश्व युद्ध, यहूदी नरसंहार और सहानुभूति की लहर

द्वितीय विश्व युद्ध और यहूदी नरसंहार ने यहूदियों के प्रति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहानुभूति की लहर ला दी। इधर ब्रिटिश सैनिकों के साथ प्रशिक्षण से यहूदी सशस्त्र समूह बहुत घातक हो चुके थे।

1936 से 1938 के वर्षों में भारी रक्तपात हुआ। फिलिस्तीनियों ने यहूदियों और अंग्रेजों पर हमला किया। जवाबी हमले में अंग्रेजों ने कई फिलिस्तीनी गांवों को खाक कर दिया। यहूदियों ने भी जमकर हत्याएं की। फिलिस्तीनी उस दौर को 'अल-थवरा अल-कुबरा' या महान विद्रोह कहते हैं। सशस्त्र समूहों में से एक को ब्लैक हैंड कहा जाता था, जिसका नेतृत्व इज़्ज़ेदीन अल-क़सम ने किया था। हमास की सैन्य शाखा को आज भी अल-क़सम ब्रिगेड कहा जाता है।

लगभग इसी समय अंग्रेजों द्वारा गठित पील कमीशन ने समस्या के एकमात्र समाधान के रूप में विभाजन का प्रस्ताव रखा। यहूदी पक्ष ने अपनी शर्त मनवाने के लिए बातचीत की। लेकिन फिलिस्तीनी पक्ष ने सुझाव यानी विभाजन का ही बहिष्कार किया।

मई 1939 में ब्रिटिश शासन द्वारा जारी एक श्वेत पत्र फिलिस्तीनी पक्ष के अधिक अनुकूल था। लेकिन विभाजित फिलिस्तीनी नेतृत्व ने मौके का फायदा नहीं उठाया।

विभाजन की नीति विफल होने पर फिलिस्तीन से निकले अंग्रेज

अंतत: अंग्रेजों ने वही किया जो उन्होंने भारत के साथ किया था। अंग्रेजों के विभाजन की नीति ने हिंसा को तो बढ़ाया ही, समस्या को और बढ़ा दिया। 1947 में जब कोई भी पक्ष विभाजन या किसी अन्य समाधान पर सहमत नहीं था और अविश्वास व शत्रुता चरम पर थी, अंग्रेजों ने घोषणा किया कि वे फिलिस्तीन से जा रहे हैं। उन्होंने फिलिस्तीन के सवाल को संयुक्त राष्ट्र के हवाले कर दिया।

इस पूरी अवधि में एक बात जो स्पष्ट थी - वह था यहूदियों का लड़ने और जीतने का दृढ़ संकल्प। यहूदी अल्पसंख्यक थे, लेकिन जब भी हिंसा भड़कती थी, वे हावी हो जाते थे। इसके पीछे एक महत्वपूर्ण कारक यह भी था कि उनके पास इलाज की बेहतर सुविधाएं थी। दूसरी तरफ फिलिस्तीनी थे, जिनके लिए मामूली चोट का मतलब भी आपदा था।

एक आखिरी कोशिश और स्वतंत्र इजरायल की घोषणा

29 नवंबर, 1947 को यूएन जनरल असेंबली में फिलिस्तीन को यहूदी और अरब राज्यों में विभाजित करने के लिए मतदान हआ। प्रस्ताव में यरूशलेम को संयुक्त राष्ट्र ने अपने नियंत्रण में रखा था।

ब्रिटिश पत्रकार इयान ब्लैक की किताब 'एनिमीज़ एंड नेबर्स' के अनुसार, "प्रस्तावित यहूदी देश में फिलिस्तीन की जमीन का 55 प्रतिशत हिस्सा शामिल होना था, जिसमें बड़े पैमाने नेगेव रेगिस्तान भी शामिल था जहां इंसानी बसाहट नहीं थी। यहूदी देश में 500,000 यहूदी और 400,000 अरब शामिल रहते। वहीं फिलिस्तीन के अरब निवासियों के हिस्से 44 प्रतिशत जमीन आनी थी, जिसमें 10,000 यहूदी रहते।" अरबों के हिस्से में वेस्ट बैंक और गाजा को भी रखा गया था।

United Nations Partition Plan for Palestine
यूएन पार्टीशन प्लान (PC- Wikipedia)

हालांकि नाराज फिलिस्तीनी पक्ष ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया। दूसरी ओर इजरायल ने 14 मई, 1948 को स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। इस पूरी अवधि में गृह युद्ध जारी था। इज़रायली सैन्य समूह बड़ी संख्या में फिलिस्तीनियों को बाहर निकालने में कामयाब रहे। फिलिस्तीनियों द्वारा इजरायल के निर्माण को नकबा या तबाही कहा जाता है। वह इसे उस दिन के रूप में देखते हैं जब उन्होंने अपनी मातृभूमि खो दी।

इजरायल की स्वतंत्रता की घोषणा के तुरंत बाद, मिस्र, जॉर्डन, इराक, सीरिया और लेबनान ने उस पर आक्रमण किया। हालांकि इजरायल, अमेरिका के हथियारों और धन के दम पर, उन्हें हराने में कामयाब रहा। इसके बाद कई और अरब-इजरायल युद्ध हुए, जिसमें इज़रायल जीतता गया और ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों पर कब्जा करता गया।

आज, संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से 139 फिलिस्तीन को मान्यता (बतौर राष्ट्र) देते हैं और 165 इजरायल को मान्यता देते हैं। गाजा और वेस्ट बैंक इजरायली सेना के नियंत्रण में हैं।

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