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फिलिस्तीन के रामल्ला जाने वाले पहले भारतीय PM हैं नरेंद्र मोदी, फिर भी बीते कुछ सालों में इजरायल के साथ क्यों बढ़ी है नजदीकी?

इजरायल की स्थापना के बाद भारत का दृष्टिकोण कुछ बदला। भारत ने 1950 में इज़रायल को मान्यता दी। लेकिन गौर करने वाली बात यह भी है कि भारत ने 1992 तक इजरायल से कोई राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किया।
Written by: एक्सप्लेन डेस्क | Edited By: Ankit Raj
Updated: October 12, 2023 10:48 IST
फिलिस्तीन के रामल्ला जाने वाले पहले भारतीय pm हैं नरेंद्र मोदी  फिर भी बीते कुछ सालों में इजरायल के साथ क्यों बढ़ी है नजदीकी
फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास के साथ पीएम मोदी (PMO India/Twitter)
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चिन्मय घरेखान

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से कहा है कि "भारत के लोग इस कठिन समय में इजरायल के साथ एकजुटता से खड़े हैं।" शनिवार को हमास का हमला शुरू होने के तुरंत बाद, मोदी ने उसे 'आतंकवादी हमला' बताते हुए गहरा दुख व्यक्त किया। भारत के अब तक के किसी भी बयान में फिलिस्तीनियों का जिक्र नहीं आया है।

शुरुआती वर्षों में भारत की कूटनीतिक नीति फिलिस्तीन की ओर क्यों झुकी हुई थी?

भारत ने 1947 में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव 181 (II) के खिलाफ वोट किया था, क्योंकि प्रस्ताव फिलिस्तीन की धरती को यहूदियों और फिलिस्तीनी अरबों के बीच बाँटने का था। यानी जमीन एक राष्ट्र दो। लेकिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसके बजाय एक फेडरल स्टेट चाहते थे, जिसमें अरबों और यहूदियों को जितना संभव हो सके स्वायत्तता मिल। साथ ही यरूशलेम को विशेष दर्जा दिया जाए।

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नेहरू को यह दृष्टिकोण महात्मा गांधी से विरासत में मिला था। गांधी भी ऐतिहासिक उत्पीड़न के लिए यहूदी लोगों के प्रति गहरी सहानुभूति तो रखते थे, लेकिन फिलिस्तीन में यहूदी देश के निर्माण के विरोधी थे। उनका मानना ​​था कि यह उन 600,000 अरबों के प्रति अन्याय होगा जो पहले से ही वहां रहते थे। नेहरू ने फिलिस्तीन की समस्या के लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद को भी ज़िम्मेदार ठहराया था।

इजरायल की स्थापना के बाद भारत का दृष्टिकोण कुछ बदला। भारत ने 1950 में इज़रायल को मान्यता दी। लेकिन गौर करने वाली बात यह भी है कि भारत ने 1992 तक इजरायल से कोई राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किया। भारत एक बड़ी मुस्लिम आबादी का घर था। विभाजन के बाद भारतीय नेता अपनी राय के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील थे। भारत के नेता यह जानते थे कि भारतीय मुसलमान भी बड़े पैमाने पर अरबों के प्रति सहानुभूति रखते है। इसके अलावा भारतीय नेता अरब देशों को अलग-थलग भी नहीं करना चाहते थे, पाकिस्तान दृढ़ता से फिलिस्तीन के समर्थन में था और भारत को भी उस रुख के अनुरूप होना था।

क्या इजरायल के साथ राजनयिक संबंधों की स्थापना से फिलिस्तीनियों के लिए भारत के समर्थन में बदलाव आया?

1992 तक इजरायल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने में भारत की अनिच्छा को शीत युद्ध के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। शीत युद्ध के दौरान, पश्चिम, विशेष रूप से अमेरिकी, दृढ़ता से इजरायल के पीछे खड़ा थे और इस प्रकार सोवियत संघ अरबों के समर्थन में सामने आया था। भारत ने अपने लिए गुटनिरपेक्ष की नीति अपनाई थी, बावजूद इसके वह खुद को सोवियत संघ की ओर झुका हुआ पाता था। उस स्थिति में भारत ने बस यही सोचा कि उसके पास अपने फिलिस्तीन समर्थक रुख को जारी रखने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं हैं।

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शीत युद्ध की समाप्ति के बाद ही पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने अरब देशों के साथ मतभेदों की परवाह किए बिना, अंततः इज़रायल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने का बेहद साहसिक निर्णय लिया। हालांकि, प्रधानमंत्री राव ने भी फिलिस्तीनियों के लिए मुखर समर्थन दिखाना जारी रखा - उन्होंने किसी भी तरह से फिलिस्तीनी मुद्दे का समर्थन करने की भारत की सैद्धांतिक नीति को नहीं छोड़ा।

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क्या हाल ही में भारत ने फिलिस्तीनियों को नजरअंदाज कर इजरायल का समर्थन किया है?

भारत आज इजरायल से पहले से भी ज्यादा करीब है। प्रधानमंत्री मोदी और नेतन्याहू व्यक्तिगत स्तर पर मित्र मालूम पड़ते हैं। भारत और इजरायल ने घनिष्ठ आर्थिक संबंध भी विकसित किए हैं, खासकर डिफेंस के क्षेत्र में, जहां भारत इजरायल के सबसे बड़े ग्राहकों में से एक है।

फिलिस्तीन के साथ भारत के संबंधों में जो बदलाव आया है, वह फिलिस्तीन के समर्थन में उसकी खुली बयानबाजी है। हाल के वर्षों में विशेषकर संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर, भारत ने निश्चित रूप से इसमें कमी लाई है।

ऐसी भावना है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत के फिलिस्तीन समर्थक रुख से राष्ट्रीय को कोई लाभ नहीं मिला है। आखिर अरब देशों ने कश्मीर को लेकर हमारे लिए क्या किया है? वास्तव में, फिलिस्तीन ने अक्सर कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान को समर्थन दिया है।

भारत के हाल ही में इजरायल को समर्थन देने में एक वैचारिक तत्व भी शामिल हो सकता है। भारत में कई लोग गाजा पट्टी पर इजरायल के हमले की सराहना करते हैं और उसकी व्याख्या इस्लाम विरोधी कार्रवाई के रूप में करते हैं। कई भारतीय इज़राइल को सीमा पार आतंकवादी हमलों से निपटने के लिए एक उदाहरण के रूप में मानते हैं। लेकिन यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि हमारी स्थितियां एक जैसी नहीं हैं - पाकिस्तान के विपरीत, इज़रायल एक बेहद कमजोर प्रतिद्वंद्वी से निपट रहा है। इजरायल एक मजबूत सैन्य शक्ति है और उसके पास परमाणु हथियार भी है।

बता दें कि भारत की औपचारिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। भारत टू-स्टेट सॉल्यूशन का समर्थन करता है, जिसमें इज़रायल और फिलिस्तीन अच्छे पड़ोसियों के रूप में साथ-साथ रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2018 में वेस्ट बैंक में रामल्ला का दौरा किया, ऐसा करने वाले वह पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं।

क्या भारत को इजरायल समर्थक रुख पर प्रतिक्रिया की चिंता करनी चाहिए?

फिलिस्तीनी खुश नहीं होंगे - वे कुछ समय से भारत की इजरायल के साथ बढ़ती निकटता से खुश नहीं हैं। लेकिन भारत को शेष अरब दुनिया से प्रतिक्रिया के बारे में चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।

अरब देशों की सरकारों की फिलिस्तीनी मुद्दे में रुचि नहीं रही है। सऊदी अरब जैसे देश इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करना चाहते हैं। हालांकि हमास का हमला अरब की सड़कों पर बातचीत में फिलिस्तीन के मुद्दे को वापस लाएगा और वास्तव में इस मुद्दे के लिए लोकप्रिय समर्थन को पुनर्जीवित कर सकता है। लेकिन इससे इन देशों के साथ भारत के संबंधों पर असर पड़ने की संभावना नहीं है। नई दिल्ली के इजरायल समर्थक रुख के कारण कोई भी अरब देश भारत के साथ व्यापार करना बंद नहीं करेगा, या अचानक दुश्मन नहीं बन जाएगा।

(चिन्मय घरेखान संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि थे। उन्हें संयुक्त राष्ट्र महासचिव द्वारा 1993 से 1999 तक मीडिल ईस्ट पीस प्रोसेस के लिए एक विशेष दूत के रूप में नियुक्त किया गया था। वह 2005 से 2009 तक मीडिल ईस्ट में भारत के विशेष दूत थे।)

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