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अंग्रेजों ने 4600 रुपये के लिए चार क्रांतिकारियों को दे दी थी फांसी, मुश्किल से बचे थे चंद्रशेखर आज़ाद

क्रांतिकारियों ने ट्रेन को अपने दो उद्देश्यों को पूरा करने के लिए लूटा था। पहला उद्देश्य था- अपने संगठन एचआरए के लिए फंट जुटाना। दूसरा उद्देश्य था- अपने काम और मिशन की तरफ जनता का ध्यान आकर्षित करना।
Written by: एक्सप्लेन डेस्क | Edited By: Ankit Raj
Updated: December 19, 2023 18:34 IST
अंग्रेजों ने 4600 रुपये के लिए चार क्रांतिकारियों को दे दी थी फांसी  मुश्किल से बचे थे चंद्रशेखर आज़ाद
काकोरी कांड के चार शहीदों की तस्वीर: (बाएं से) राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, अशफाकउल्ला खान, राम प्रसाद बिस्मिल और ठाकुर रोशन सिंह (Wikimedia Commons)
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अर्जुन सेनगुप्ता

साल 1927 के दिसंबर माह में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के चार क्रांतिकारियों को फांसी हुई थी। 17 दिसंबर को राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और 19 दिसंबर को अशफाकउल्ला खान, रामप्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह को फांसी दी गई थी। क्रांतिकारियों को फांसी 'काकोरी ट्रेन डकैती' के दो साल बाद दी गई थी। उस डकैती में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के सदस्यों ने ब्रिटिश खजाने के लिए धन ले जाने वाली एक ट्रेन को लूट लिया था।

घटना के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने गहन तलाशी अभियान चलाया, जिसके परिणामस्वरूप HRA के कई सदस्यों की गिरफ्तारी हुई थी। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास इस घटना और इन क्रांतिकारियों की चर्चा के बिना अधूरा लगता है।

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हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना

साल 1920 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की घोषणा की थी। इस आंदोलन के माध्यम से गांधी ने देशवासियों से हर उस चीज का विरोध करने का आह्वान किया था, जिससे भारत में ब्रिटिश सरकार और उसकी अर्थव्यवस्था को मदद मिलती हो। महात्मा गांधी ने आंदोलन को अहिसंक रखने की अपील की थी।

हालांकि, 1922 में एक घटना ने आंदोलन की दिशा बदल दी। वर्तमान उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा कस्बे में पुलिस गोलीबारी में तीन प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई। इसके बाद गुस्साई भीड़ ने पुलिस स्टेशन में आग लगा दी। 22 पुलिसकर्मी जलकर मर गए। जवाहरलाल नेहरू अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि इस घटना के कारण असहयोग आंदोलन "अचानक" समाप्त हो गया। गांधीजी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर आंतरिक असहमति के बावजूद इसे वापस ले लिया।

इस प्रकार एचआरए की स्थापना उन युवाओं के एक समूह द्वारा की गई थी जिनका गांधी की रणनीति से मोहभंग हो गया था। राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्ला खान, दोनों को कविता का शौक था। वे दोनों समूह के संस्थापकों में से थे। अन्य लोगों में सचिन्द्र नाथ बख्शी और ट्रेड यूनियनिस्ट जोगेश चंद्र चटर्जी शामिल थे। बाद में चन्द्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह जैसी शख्सियतें भी एचआरए में शामिल हुईं। 1 जनवरी, 1925 को एचआरए ने अपना घोषणापत्र जारी किया, जिसका शीर्षक था- क्रांतिकारी।

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काकोरी ट्रेन एक्शन क्या था?

अगस्त 1925 में काकोरी में ट्रेन डकैती की घटना एचआरए की पहली बड़ी कार्रवाई थी। आठ नंबर डाउन ट्रेन शाहजहांपुर और लखनऊ के बीच चलती थी। इस ट्रेन से अंग्रेजों का खजाना भरने के लिए धन जाया करता था। क्रांतिकारियों ने इस धन को लूटने की योजना बनाई। उनका मानना था कि जो धन अंग्रेज अपने खजाने में भर रहे हैं, वह भारतीयों का ही है। क्रांतिकारियों का उद्देश्य एचआरए के लिए फंड जुटाना और अपने काम और मिशन की तरफ जनता का ध्यान आकर्षित करना था।

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9 अगस्त, 1925 को जब ट्रेन लखनऊ से लगभग 15 किमी पहले काकोरी स्टेशन से गुजर रही थी, तभी एचआरए के सदस्य राजेंद्रनाथ लाहिड़ी ने चेन खींचकर ट्रेन रोक दी। लाहिड़ी पहले से ही ट्रेन के अंदर थे। ट्रेन रुकने के बाद, राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला खान सहित लगभग दस क्रांतिकारी ट्रेन में घुसे। गार्ड को अपने कब्जे में ले लिया और राजकोष के बैग (जिनमें लगभग 4,600 रुपये थे) लूट लिए। घटना को अंजाम देने के बाद सभी लखनऊ भाग गए।

माउजर बंदूक के ठीक से काम न करने और मिस फायर की वजह से एक यात्री (अहमद अली नामक एक वकील) की मौत हो गई। इसकी वजह से घटना के बाद क्रांतिकारियों को उस तरह का जनसमर्थन नहीं मिला, जिसकी उन्हें उम्मीद थी।

दूसरी तरफ क्रांतिकारियों के इस कदम से अंग्रेज अधिकारी आग बबूला हो गए। उन्होंने हिंसक कार्रवाई की और जल्द ही एचआरए के कई सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया। बिस्मिल को अक्टूबर में गिरफ्तार किया गया, माना जाता है कि एचआरए के दो सदस्यों ने उन्हें धोखा दिया था। अशफाकुल्लाह नेपाल और फिर डाल्टनगंज (वर्तमान झारखंड में) भाग गए। हालांकि एक साल बाद उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया जाएगा। अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार किए गए चालीस लोगों में से चार को मौत की सजा दी गई, जबकि अन्य को लंबे समय तक जेल में में डाल दिया गया। उस दौर में HRA के एकमात्र प्रमुख नेता जो गिरफ्तारी से बचने में कामयाब रहे थे, वे चंद्रशेखर आज़ाद थे।

इसके बाद एचआरए का क्या हुआ?

काकोरी षड्यंत्र के आरोपियों की फांसी के एक साल बाद, एचआरए का पंजाब, बिहार और बंगाल में उभरे कई अन्य क्रांतिकारी समूहों में विलय हो गया और संगठन का नाम हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRSA) हो गया। धीरे-धीरे संगठन ने अपने मार्क्सवादी झुकाव को और अधिक स्पष्ट किया और कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के साथ मिलकर काम किया।

1930 के दशक तक एचएसआरए कमजोर हो गया। इसके कई प्रमुख नेता या तो मार दिए गए या जेल में डाल दिए गए। हालांकि, 1920 के दशक के उत्तरार्ध में समूह ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध के विभिन्न घटनाओं को अंजाम दिया। इसमें सहायक पुलिस आयुक्त जे.पी. सॉन्डर्स की हत्या और वायसराय इरविन की ट्रेन पर बमबारी में घटना महत्वपूर्ण है। 1930 के दशक में HRSA विभिन्न क्षेत्रीय गुटों में बंट गया।

काकोरी कांड पर इतनी तीखी प्रतिक्रिया क्यों हुई?

काकोरी एक्शन के बाद ब्रिटिश अधिकारियों की कड़ी प्रतिक्रिया कुछ हद तक आश्चर्यजनक थी। किसी ने नहीं सोचा था कि क्रांतिकारियों को मौत की सज़ा दे दी जाएगी। लूट की राशि मामूली थी। क्रांतिकारियों ने खजाने के अलावा और किसी चीज़ को हाथ नहीं लगाया था। लेकिन घटना अनोखी थी। शायद ही कभी भारत में ब्रिटिश खजाने को इस तरह लूट गया था। माना जाता है कि काकोरी पर ब्रिटिश राज की कड़ी प्रतिक्रिया भविष्य के क्रांतिकारियों के लिए एक संदेश था।

भारतीयों द्वारा काकोरी की घटना को कई क्रांतिकारी गतिविधियों में से एक के रूप में याद किया जाता है, जो निस्संदेह बहादुर भरी थीं लेकिन समाप्त त्रासदी से हुई।

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