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चीन में कैसे आया कम्युनिस्ट शासन, एक भारतीय नेता की भी मानी जाती है भूमिका, जानिए इतिहास

चीनी किसानों के एक ग्रुप को विदेशी लोग 'बॉक्सर' कहा करते थे क्योंकि वे एक विशेष तरह का मार्शल आर्ट जानते थे।
Written by: न्यूज डेस्क | Edited By: Ankit Raj
Updated: October 03, 2023 07:49 IST
चीन में कैसे आया कम्युनिस्ट शासन  एक भारतीय नेता की भी मानी जाती है भूमिका  जानिए इतिहास
चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन माओत्से तुंग (PC- chineseposters.net)
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ऋषिका सिंह

चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के नेता माओत्से तुंग ने 1 अक्टूबर, 1949 को आधुनिक चाइनीज स्टेट की स्थापना की घोषणा की थी। CCP आज भी चीन की सरकार और सेना को आकार देने वाली केंद्रीय शक्ति बनी हुई है। सवाल यह है कि साम्यवाद (Communism) की विचारधारा चीन में कैसे आई और इतनी ज्यादा प्रचलित क्यों हुई? यहां हम चीन के इतिहास के बारे में जानेंगे। चीन, साम्यवाद तक क्रांति और आंतरिक युद्धों के रास्ता पर चलकर पहुंचा है। इसमें एक भारतीय नेता की भी अपनी भूमिका है।

साम्यवाद क्यों?

20वीं सदी में कई देश औपनिवेशिक शासन और प्रभाव से मुक्त हो गए। उन्हें अपने लिए आर्थिक और राजनीतिक रास्ता चुनना पड़ा। द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45) के आसपास, पूंजीवादी अमेरिका और साम्यवादी USSR का बोलबाला था। दोनों के बीच लंबे समय तक वैचारिक और आर्थिक वर्चस्व के लिए प्रतिद्वंद्विता चली, जिसे शीत युद्ध के नाम से जाना गया। इस युद्ध में दोनों देश एक दूसरे से सीधे न भिड़कर, अलग-अलग देशों को प्रभावित कर अपने साथ लाने की कोशिश कर रहे थे।

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साम्यवाद के रास्ते पर क्यों चल पड़ा चीन?

एक उथल-पुथल भरे दौर के बाद 1900 के दशक की शुरुआत में चीन में एक राजनीतिक व्यवस्था की तलाश शुरू हुई। चीन के सामने कई चुनौतियां थीं:

1. आंतरिक समस्याएं: 2,000 से अधिक वर्षों तक चीन में स्थानीय राजाओं द्वारा शासित कई युद्धरत राज्य थे। 221 ईसा पूर्व की शुरुआत में चीन जैसे विशाल क्षेत्र पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया गया। सफलता हासिल करने वाले पहले व्यक्ति किन राजवंश के राजा शी हुआंग थे। कुछ राजवंशों ने लंबे समय तक शासन किया, अन्य तेज़ी से छोटे राज्यों में टूट गए। किंग राजवंश की शुरुआत 17वीं सदी के मध्य में हुई। 19वीं शताब्दी तक भ्रष्टाचार और कुशासन की आंतरिक समस्याओं और विदेशी लोगों की बढ़ती उपस्थिति के कारण शासन कमजोर होने लगा।

2. विदेशी उपस्थिति: उस समय ब्रिटेन चीन में उगाई जाने वाली चाय बड़ी मात्रा खरीद रहा था, लेकिन इसके बदले उसे अपना बहुत सारा संसाधन खर्च करना पड़ता था। अपने संसाधन को बचाने के लिए ब्रिटेन ने चीनियों को अफीम उपलब्ध कराना शुरू किया। इससे चीनी लोगों को ब्रिटेन से अफीम खरीदने के लिए अपना संसाधन खर्च करने को मजबूर होना पड़ा।

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अफीम की आमद रोकने के चीन के प्रयास विफल होने के बाद, 1839 में पहला अफीम युद्ध शुरू हुआ। चीन हार गया और उसे हांगकांग से अलग होना पड़ा और ब्रिटिश व्यापारियों को अधिक व्यापार रियायतें देनी पड़ीं। विदेशी शक्तियों के पास अब चीन के विभिन्न क्षेत्रों में अपने-अपने "प्रभाव क्षेत्र" थे।

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3. बॉक्सर विद्रोह: चीन में गैर-बराबरी के आधार पर हो रही संधियों से नाराज होकर किसानों के कुछ समूह उभरे, जिन्हें विदेशियों ने 'बॉक्सर' कहा। ऐसा इसलिए क्योंकि वे एक प्रकार का मार्शल आर्ट जानते थे। किसान अपने देश में विदेशियों की मौजूदगी, सरकारी भ्रष्टाचार और पारंपरिक चीनी समाज पर ईसाई मिशनरी गतिविधियों के प्रभाव के खिलाफ थे। उन्हें चीन की महारानी का भी समर्थन मिला।

लेकिन, आठ सहयोगी देशों (ऑस्ट्रिया-हंगरी, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, रूस, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका) के सैनिकों ने सन् 1900 के बॉक्सर विद्रोह को कुचल दिया। इसके बाद चीन पर और अधिक मांगें थोप दी गईं।

समय के साथ राजा के खिलाफ आक्रोश बढ़ता गया। 1911 में एक प्रांत में सैनिकों के विद्रोह के साथ शिन्हाई क्रांति शुरू हुई। थोड़े समय में यह क्रांति फैल गई और अंततः सम्राट जुआनटोंग को पद छोड़ना पड़ा। क्रांतिकारियों ने 1912 में डॉक्टर से राजनेता बने सुन यात सेन को चीन का अस्थायी राष्ट्रपति बनाया।

चीन में साम्यवाद कैसे आया?

सुन वर्षों से राजाओं के शासन के खिलाफ थे। उन्होंने जो राजशाही विरोधी संगठन बनाया, उसे बाद में कुओमितांग या नेशनलिस्ट पार्टी के नाम से जाना गया। उन्हें 'आधुनिक चीन का जनक' भी कहा जाता है। उन्होंने आधुनिक राष्ट्र के लिए तीन सिद्धांत दिए: राष्ट्रीयता, लोकतंत्र और समाजवाद

लेकिन सुन का युआन शिकाई नाम के एक पूर्व प्रांतीय गवर्नर और जनरल के साथ मतभेद हो गया, जिसके साथ उन्होंने 1912 के बाद पावर शेयर करने की कोशिश की थी। फिर वह सहयोगियों की तलाश में विदेश चले गए। वह पहले अमेरिका में रह चुके थे। उन्होंने जापानियों से वित्तीय सहायता मांगी। कहीं से मदद न मिलने पर उन्होंने सोवियत संघ का रुख किया।

1917 में यूएसएसआर में क्रांति ने ज़ार को गद्दी से उतार दिया था और व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में एक साम्यवादी राज्य की स्थापना हो गई थी। जैसे ही सुन ने रूसियों के साथ बातचीत की। वह सहयोगी बनने को तैयार हो गए। उन्हें भी साथी की तलाश थी।

4 मई, 1919 को चीन में एक और आंदोलन हुआ, जिससे राजनीतिक समूहों को भी बढ़ावा मिला। छात्रों ने विदेशियों, विशेषकर जापानियों के निरंतर प्रभाव के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया। उन्होंने आगे चलकर महिलाओं के लिए खुलेपन, वैज्ञानिक, तर्क और समानता की मांग की। उनके लिए एक और चिंता लोकल वॉरलॉर्ड्स का बढ़ता प्रभाव था, जो एकीकृत राष्ट्र के लिए सुन की आशाओं के विपरीत था।

बढ़ती राष्ट्रवादी भावनाओं के कारण बीजिंग में वर्साय शांति सम्मेलन के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुआ। संधि के तहत चीन के शेडोंग प्रांत को चीन के बावजूद जापान को देने का फैसला किया गया था। तब इस क्षेत्र पर तब जर्मनी का कब्जा था। बढ़ते विरोध के कारण अंततः चीन ने संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया।

कुओमितांग और कम्युनिस्ट अलग कैसे हुए?

4 मई के आंदोलन में भावी चीनी राष्ट्रपति माओ ज़ेडॉन्ग और प्रीमियर झोउ एनलाई जैसे लोगों की भागीदारी देखी गई। 1921 में इन दोनों नेताओं ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में केंद्रीय भूमिका निभाई। सीसीपी को कम्युनिस्ट इंटरनेशनल द्वारा भेजे गए लोगों की सहायता प्राप्त थी। यह विश्व स्तर पर अपनी राजनीतिक विचारधारा फैलाने के लिए रूसी कम्युनिस्टों द्वारा स्थापित एक संगठन था। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के अनुसार, 1921 में कम्युनिस्ट पार्टी के 50 सदस्य थे, जो 1925 तक बढ़कर 1,500 हो गए। इसके विपरीत 1923 में कुओमितांग के 50,000 सदस्य थे।

कुओमितांगने सोवियत और सीसीपी के समर्थन से 1925 में सरकार बनाई। उसी वर्ष सुन यात सेन की मृत्यु हो गई, जिससे नेशनलिस्ट पार्टी में विभाजन हो गया। उनके शिष्य चियांग काई शेक इसके दक्षिणपंथी गुट के नेता बन गए। उन्हें कम्युनिस्टों पर संदेह होने लगा।

1927 में भारतीय कम्युनिस्ट नेता एमएन रॉय को 1927 में अन्य कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के सदस्यों के साथ यह देखने के लिए चीन भेजा गया था कि परिवर्तन कैसे हो रहा है। रॉय ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) की स्थापना भी की थी। रॉय का विचार था कि कृषि क्रांति का समर्थन करना एक सच्चे कम्युनिस्ट राज्य की स्थापना में महत्वपूर्ण कदम होगा। रॉय ने लिखा था, "चीनी क्रांति या तो कृषि क्रांति के रूप में जीतेगी या नहीं, यह बिल्कुल भी नहीं जीतेगी।" लेकिन रूसियों को इस बात पर आपत्ति थी, वह कुओमितांग का समर्थन करने पर आमादा थे और उनके विचारों पर ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे थे।

जल्द ही, चियांग ने अपने सोवियत सलाहकारों को बर्खास्त कर दिया और कम्युनिस्टों और वामपंथी कुओमिन्तांग नेताओं को हटा दिया, जिससे सोवियत-कुओमिन्तांग समझौता समाप्त हो गया।

इसके बाद कम्युनिस्ट ठिकानों पर हमलों शुरू हो गए। सीसीपी ने एक लॉन्ग मार्च (1934-35) शुरू किया, जिसमें सदस्यों ने दक्षिण-पूर्वी से उत्तर-पश्चिमी चीन में शिफ्ट होने के लिए 10,000 किलोमीटर की यात्रा की। कठिन इलाके में यात्रा के दौरान हजारों लोगों मर गए। लेकिन उन्होंने इसे पूरा किया और अपनी विचारधारा को चीन के गांवों में फैलाया, जिससे माओ का उदय हुआ। उनकी गुरिल्ला युद्ध रणनीतियों को अधिक संसाधन-संपन्न राष्ट्रवादियों से लड़ने के लिए अपनाया गया। संसाधन-संपन्न राष्ट्रवादियों को अमेरिका का समर्थन हासिल था। यही राष्ट्रवादी देश को साम्यवाद अपनाने के खिलाफ एकजुट कर रहे थे।

जापानी आक्रमण और गृह युद्ध

1930 के दशक में जब जापानी सेना ने चीन पर हमला किया तो यह लड़ाई रुक गई। दोनों दलों ने संयुक्त मोर्चे के तहत जापान से युद्ध लड़ा। 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद गृहयुद्ध फिर शुरू हो गया। राष्ट्रवादी पार्टी के पास न सिर्फ बहुत अच्छी सेना थी बल्कि चीन के बड़े क्षेत्र पर नियंत्रण भी था। फिर भी राष्ट्रवादी सेनाओं द्वारा की गई गलतियों और कम्युनिस्ट पार्टी के सैन्य नेताओं की बेहतर चाल ने बाजी को पलट दी। कम्युनिस्ट पार्टी की जीत हुई। सीसीपी की जीत के बाद कुओमिन्तांग ताइवान भाग गए। वहां चियांग काई शेक ने 1975 में अपनी मृत्यु तक राष्ट्रपति के रूप में शासन किया और इस बात पर जोर दिया कि ताइवान ही 'असली' चीन है।

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