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Women Reservation Bill: किसी ने माइक्रोफोन उखाड़ा, तो कोई सभापति की मेज पर ही चढ़ गया... जानिए 27 साल से संसद में क्यों लटका है महिला आरक्षण बिल

साल 1996 से लगभग हर सरकार ने महिला आरक्षण बिल को पास करवाने की कोशिश की है।
Written by: Ankit Raj | Edited By: Ankit Raj
Updated: September 19, 2023 15:01 IST
women reservation bill  किसी ने माइक्रोफोन उखाड़ा  तो कोई सभापति की मेज पर ही चढ़ गया    जानिए 27 साल से संसद में क्यों लटका है महिला आरक्षण बिल
संसद में महिलाओं के लिए सीट आरक्षित करने की मांग करती प्रदर्शनकारी महिलाएं (Express Archive)
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एक बार फिर महिला आरक्षण बिल (Women Reservation Bill) चर्चा में है। यह बिल पिछले 27 साल से संसद में लटका है। महिलाओं के संसद में सीट आरक्षित करने का सबसे पहला प्रयास एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली सरकार ने सितंबर 1996 में किया था।

तब से लगभग हर सरकार ने इसे आगे बढ़ाने की कोशिश की है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार 2010 में इसे राज्यसभा में पारित कराने में भी कामयाब रही थी। लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति और आम सहमति की कमी के कारण यह कदम सफल नहीं हो सका।

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पहला प्रयास: संयुक्त मोर्चा सरकार

13 पार्टियों की गठबंधन वाली संयुक्त मोर्चा सरकार के कानून राज्य मंत्री रमाकांत डी खलप ने 12 सितंबर, 1996 को पहली बार महिला आरक्षण बिल लोकसभा में पेश किया था। यह एक आश्चर्यजनक कदम था। जनता दल के कई नेता और सत्तारूढ़ गठबंधन के अन्य घटक इसके पक्ष में नहीं थे। अगले दिन विधेयक को सीपीआई की गीता मुखर्जी की अध्यक्षता वाली एक संयुक्त समिति को भेजा गया।

संसदीय पैनल के 31 सदस्यों में (तत्कालीन सांसद) ममता बनर्जी , मीरा कुमार, सुमित्रा महाजन, नीतीश कुमार , शरद पवार, विजय भास्कर रेड्डी, सुषमा स्वराज, उमा भारती, गिरिजा व्यास, राम गोपाल यादव, सुशील कुमार शिंदे और हन्नान मोल्ला थे।

पैनल ने सात प्रमुख सुझाव दिए। पैनल के सदस्यों ने यह माना कि महिलाओं को एक तिहाई से कम आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। पैनल ने यह भी सुझाव दिया कि राज्यसभा और विधान परिषदों में भी महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण होना चाहिए।

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समिति की सिफारिश के मुताबिक, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण शुरू में 15 साल के लिए होना चाहिए। इस अवधि के बाद उसकी समीक्षा की जाएगी ताकि यह तय किया जा सके कि आरक्षण दिया जाए या नहीं। इसमें यह भी सुझाव दिया गया कि एंग्लो-इंडियन समुदाय से नामित सदस्यों में से एक सदस्य बारी-बारी से महिला होंगी।

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पैनल ने उन राज्यों के बारे में भी बात की जहां अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए 'तीन से कम सीटों' पर मौजूदा आरक्षण था। ऐसे मामले में समिति ने एक रोटेशन नीति का सुझाव दिया: पहले कार्यकाल में महिलाओं के लिए एक सीट आरक्षित और दूसरे कार्यकाल में दूसरी सीट आरक्षित, तीसरे कार्यकाल में सीटें अनारक्षित होंगी।

समिति ने दिसंबर 1996 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। लेकिन इसका जोरदार विरोध हुआ। इसमें बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी शामिल थे, जिन्होंने ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षण की बात कही थी।

कुमार ने अपनी असहमति नोट में कहा, "यह विधेयक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं को आरक्षण प्रदान करता है। मेरी राय है कि ओबीसी की महिलाओं को भी उचित सम्मान मिलना चाहिए। इसलिए मैं चाहता हूं कि एक तिहाई आरक्षण में ओबीसी से संबंधित महिलाओं को शामिल किया जाना चाहिए… आरक्षण ओबीसी की आबादी के अनुपात में होना चाहिए।" मोल्ला, यादव और द्रमुक के पीएन शिवा की ओर से भी इसी तरह के असहमति वाले नोट थे।

विधेयक को 16 मई, 1997 को लोकसभा में चर्चा के लिए लाया गया लेकिन सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर से ही इसका कड़ा विरोध हुआ।
चर्चा के दौरान दिवंगत समाजवादी सांसद शरद यादव ने अपना विवादित बयान दिया। उन्होंने कहा, "कौन महिला है, कौन नहीं है, केवल बाल कटि महिलाओं भर नहीं रहने देंगे।"

उन्होंने तर्क दिया कि यदि विधेयक पारित हो गया तो छोटे बाल वाली महिलाएं (शिक्षित और 'आधुनिक' महिलाओं के लिए इस्तेमाल किया गया एक व्यंजना) का विधान मंडलों पर 'वर्चस्व' हो जाएगा।

यादव का बयान जल्द ही सुर्खियां बन गया। हिंदी पट्टी के नेताओं ने ओबीसी उप-कोटा की मांग के कारण विधेयक का विरोध किया। संयुक्त मोर्चा की सरकार विधेयक पारित नहीं कर सकी और लोकसभा के खत्म होने के समाप्त हो गया।

दूसरा प्रयास: एनडीए सरकार

1998 और 2004 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने इस विधेयक को कई बार पारित कराने की कोशिश की। 13 जुलाई 1998 को पहली बार लोकसभा में अराजक दृश्य देखने को मिला। जैसे ही तत्कालीन कानून मंत्री एम थंबी दुरई ने विधेयक पेश करने की कोशिश की, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसदों ने अपना विरोध दर्ज कराया। हंगामे के बीच, एक राजद सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने अध्यक्ष जीएमसी बालयोगी से विधेयक की प्रतियां छीन लीं और उन्हें फाड़ दिया।

अब बिहार सरकार में मंत्री, सुरेंद्र ने हाल ही में कहा कि उन्होंने विधेयक की एक प्रति फाड़ दी क्योंकि बीआर अंबेडकर उनके सपने में आए थे और उन्हें ऐसा करने के लिए कहा था।

विधेयक को अगले दिन भी पेश करने के लिए सूचीबद्ध किया गया था, लेकिन अध्यक्ष ने 'आम सहमति' संभव नहीं होने के कारण इसे टाल दिया। उस साल दिसंबर में भी ऐसे ही दृश्य सामने आए थे। 11 दिसंबर 1998 को, लोकसभा में सांसदों को बेकाबू होता देखा गया। ममता बनर्जी ने एसपी सांसद दरोगा प्रसाद सरोज को अध्यक्ष के आसन की ओर बढ़ने से रोकने की कोशिश की।

सपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा,  बहुजन समाज पार्टी (BSP) और मुस्लिम लीग के सदस्यों के विरोध के बावजूद अंततः विधेयक 23 दिसंबर 1998 को पेश किया गया। इसे लेकर एनडीए के सहयोगियों में भी मतभेद थे।

बिल का विरोध करने वाले नीतीश तब रेल मंत्री थे। हालांकि, अप्रैल 1999 में वाजपेयी सरकार के पतन के बाद सदन भंग हो जाने के कारण विधेयक समाप्त हो गया।

वाजपेयी सरकार ने फिर कोशिश की

वाजपेयी के नेतृत्व में दोबारा एनडीए सरकार बनाने के बाद 23 दिसंबर 1999 को तत्कालीन कानून मंत्री राम जेठमलानी ने यह विधेयक पेश किया था। एक बार फिर सपा, बसपा और राजद के सदस्यों ने इसका विरोध किया।

वाजपेयी सरकार ने उसके बाद तीन बार - 2000, 2002 और 2003 में विधेयक को आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन उस समय मुख्य विपक्षी दलों जैसे- कांग्रेस और वाम दलों के समर्थन के बावजूद वह सफल नहीं हो सकी। लाई 2003 में तत्कालीन अध्यक्ष मनोहर जोशी ने आम सहमति बनाने की कोशिश के लिए एक सर्वदलीय बैठक बुलाई लेकिन असफल रहे।

यूपीए ने विधेयक पर जोर दिया

मई 2004 में सत्ता संभालने वाली प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली सरकार ने कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की घोषणा की। तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने 2004 में संसद में अपने पहले संयुक्त संबोधन में सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। लेकिन यह आसान नहीं था, क्योंकि यूपीए के कुछ प्रमुख घटक दल जैसे राजद इसके पक्ष में नहीं थी। तब राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री थे।

यूपीए सरकार ने अंततः 6 मई, 2008 को विधेयक पेश किया और जैसा कि हमेशा से होता आ रहा था, संसद में नाटकीय दृश्य देखने को मिले। इससे पहले कि कानून मंत्री एचआर भारद्वाज उठ पाते, सपा सांसद अबू आजमी विधेयक की प्रति छीनने के लिए उनकी ओर बढ़े, जबकि तत्कालीन महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने कुछ अन्य कांग्रेस सांसदों के साथ मिलकर उन्हें रोकने और भारद्वाज को घेरने की कोशिश की। एक अन्य सपा सांसद ने सदन के वेल में फटे हुए कागज के टुकड़े फेंके।

कांग्रेस सांसदों द्वारा अपने चारों ओर सुरक्षा घेरा बनाए जाने के बाद, भारद्वाज ने अंततः विधेयक पेश किया, जिसे बाद में संसद की स्थायी समिति को भेजा गया।

विधेयक में महिलाओं के लिए लोकसभा और विधानसभा की यथासंभव एक तिहाई सीटें आरक्षित करने और लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की एक तिहाई संख्या महिलाओं के लिए प्रदान करने की मांग की गई है।

समिति, जिसने दिसंबर 2009 में संसद को अपनी रिपोर्ट सौंपी। समिति ने सिफारिश की कि विधेयक को उसके वर्तमान स्वरूप में बिना किसी देरी के पारित किया जाए। 31 सदस्यीय पैनल के दो सदस्यों, सपा नेता वीरेंद्र भाटिया और शैलेन्द्र कुमार ने अपनी असहमति दर्ज कराई। मुखर्जी पैनल की तरह इसने भी सुझाव दिया कि सरकार को उचित समय पर ओबीसी महिलाओं और कुछ अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग पर विचार करना चाहिए।

9 मार्च, 2010: राज्यसभा में सरकार को मिली सफलता

2010 में एक सफलता मिली। राजद तब यूपीए सरकार का हिस्सा नहीं रही और उसने सपा के साथ मिलकर बाहर से समर्थन दिया था। आश्चर्यजनक रूप से नीतीश कुमार ने यू-टर्न लिया और विधेयक का समर्थन किया, इससे उनके वरिष्ठ पार्टी सहयोगी शरद यादव को शर्मिंदा होना पड़ा।

दो दिनों की उत्साहपूर्ण चर्चा के बाद, 9 मार्च, 2010 को राज्यसभा ने विधेयक को दो-तिहाई बहुमत से पारित कर दिया - भाजपा और वामपंथी, जो विपक्ष में थे, उन्होंने भी इसका समर्थन किया। पक्ष में 186 वोट पड़े थे और विरोध में सिर्फ एक वोट किसान नेता शरद जोशी का था।

बिल पास होने से एक दिन पहले राज्यसभा में अराजक दृश्य देखने को मिला था। सपा के नंद किशोर यादव और कमाल अख्तर तत्कालीन सभापति हामिद अंसारी की मेज पर चढ़ गए। नंद किशोर ने माइक्रोफोन भी उखाड़ दिया और राजद के राजनीति प्रसाद ने विधेयक की एक प्रति फाड़कर सभापति पर फेंक दी। सपा के वीरपाल सिंह यादव, निर्दलीय एजाज अली, लोक जनशक्ति पार्टी के साबिर अली और राजद के सुभाष यादव ने भी चर्चा रोकने की कोशिश की।

जिस दिन विधेयक पारित हुआ, उन सभी सातों को 'अनियंत्रित' आचरण के लिए निलंबित कर दिया गया और मार्शलों की मदद से बाहर निकाल दिया गया। जहां बसपा ने वॉकआउट किया, वहीं तृणमूल कांग्रेस ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया।

हालांकि, यूपीए सरकार ने भाजपा और वाम दलों के समर्थन के बावजूद विधेयक को लोकसभा में पारित कराने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई। 2011 में अध्यक्ष मीरा कुमार ने गतिरोध को तोड़ने के लिए एक सर्वदलीय बैठक बुलाई, लेकिन वह भी व्यर्थ रहा।

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