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Jamia Foundation Day: जर्मन यहूदी महिला ने जामिया के निर्माण में निभाई थी महत्वपूर्ण भूमिका, उन्हें जेल में भी सताती थी अपने स्टूडेंट्स की चिंता

Gerda Philipsborn Profile: दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मन होने की वजह से अंग्रेजों ने गेर्डा फिलिप्सबोर्न को कुछ समय के लिए जेल में डाल दिया था। उन्हें अहमदनगर जेल में रखा गया था। बताया जाता है कि उन्हें जेल में भी अपने स्कूल के बच्चों की ही चिंता होती थी।
Written by: एक्सप्लेन डेस्क | Edited By: Ankit Raj
Updated: October 29, 2023 19:47 IST
jamia foundation day  जर्मन यहूदी महिला ने जामिया के निर्माण में निभाई थी महत्वपूर्ण भूमिका  उन्हें जेल में भी सताती थी अपने स्टूडेंट्स की चिंता
गेर्डा फिलिप्सबोर्न को जामिया की आपा कहा जाता है।
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दिल्ली स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय 'जामिया मिल्लिया इस्लामिया' 29 अक्टूबर को अपनी स्थापना दिवस मनाता है। जामिया का अर्थ 'विश्वविद्यालय' और मिल्लिया का मतलब 'राष्ट्रीय' होता है। शुरुआती वर्षों में जामिया सिर्फ एक शैक्षणिक संस्थान से ज्यादा एक आंदोलन था। औपनिवेशिक काल में राष्ट्रीय आंदोलन से निकले इस विश्वविद्यालय के कई छात्र-छात्राओं ने दुनिया भर में भारत का नाम रोशन किया है।

हालांकि आज हम जिस जामिया मिल्लिया इस्लामिया को देखते हैं, वह कई व्यक्तियों के अथक और निस्वार्थ प्रयासों का परिणाम है। अक्सर जामिया को बनाने और संवारने वालों में मोहनदास करमचंद गांधी (महात्मा गांधी), जाकिर हुसैन, मौलाना मोहम्मद अली जौहर, हकीम अजमल खान, डॉ मुख्तार अहमद अंसारी, अब्दुल मजीद ख्वाजा और कई अन्य राष्ट्रवादी नेताओं का नाम तो लिया जाता है। लेकिन उन महिलाओं का नाम भुला दिया जाता है जिन्होंने जामिया की नींव में खुद को लगा दिया। ऐसी ही एक जर्मन यहूदी महिला थीं गेर्डा फिलिप्सबोर्न।

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जामिया की आपा

गेर्डा फिलिप्सबोर्न को जामिया की आपा (बड़ी बहन) कहा जाता है। वह 1 जनवरी, 1933 को जामिया में शामिल हुईं और अपने जीवन के अंतिम दिन, 14 अप्रैल, 1943 तक संस्थान की सेवा करती रहीं। नाज़ियों के सत्ता में आने और एडॉल्फ हिटलर के चांसलर बनने से कुछ महीने पहले ही वह अपने मूल देश जर्मनी से भागकर भारत आई थीं। वह 21 दिसंबर, 1932 को बंबई पहुंचीं, जहां उनके दोस्त और जामिया के तत्कालीन कुलपति जाकिर हुसैन ने उनका स्वागत किया।

वह जाकिर हुसैन के साथ दिल्ली आईं। उन्हें 1 जनवरी, 1933 को आधिकारिक तौर पर जामिया के स्टाफ सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया था। जामिया की वेबसाइट के अनुसार, फिलिप्सबोर्न 'अंजुमन-ए-जामिया मिल्लिया इस्लामिया' की भी सदस्य थी, यह जामिया के कर्मचारियों का एक अनोखा समूह था। इस समूह ने कम से कम 20 वर्षों तक जामिया में अधिकतम 150 रुपये प्रति माह के वेतन पर काम करने का वादा किया था। जामिया के आजीवन सदस्यों की सूची में 26 लोगों का नाम है। इस सूची में फिलिप्सबोर्न एकमात्र गैर-भारतीय महिला आजीवन सदस्य हैं।

11 साल तक जामिया में सेवा करने के बाद, मात्र 47 साल की उम्र में फिलिप्सबोर्न की कैंसर से मौत हो गई। उनके शरीर को जामिया कब्रिस्तान में दफनाया गया। द वायर में प्रकाशित महताब आलम के लेख के मुताबिक, फिलिप्सबोर्न की इच्छा थी कि उन्हें उनके मुस्लिम सहयोगियों और साथियों के बीच वहीं दफनाया जाए।

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जामिया की आपा को 'खातून ए अव्वल' यानी 'जामिया की प्रथम महिला' भी कहा जाता है। आज जामिया में गेर्डा फिलिप्सबोर्न के नाम पर पूरा का पूरा डे केयर सेंटर और एक हॉस्टल भी है।

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जामिया आने से पहले कैसी थी 'खातून ए अव्वल' की जिंदगी?

गेर्डा फिलिप्सबोर्न का जन्म जर्मनी के एक जाने माने यहूदी परिवार में 30 अप्रैल, 1895 को हुआ था। परिवार संपन्न था, इसलिए फिलिप्सबोर्न लालन-पालन तमाम सुख-सुविधाओं के बीच हुआ। वह अपने चार भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं। औपचारिक शिक्षा के बाद उन्होंने ओपेरा गायिका के रूप में प्रशिक्षण लिया। उन्होंने ओपेरा के प्रसिद्ध कंडक्टर ब्रूनो वाल्टर से संगीत की तालीम ली थी।

फिलिप्सबोर्न ने जर्मनी के म्यूनिख और रॉस्टॉक जैसे जर्मनी के बड़े शहरों में परफॉर्म भी किया था। लेकिन जल्द ही उनका इससे मन बुझ गया। वह दुनिया को बेहतर बनाने के लिए कुछ करना चाहती थीं। लोगों की मदद करना चाहती थीं। खासकर वह किसी तरह से विक्षिप्त बच्चों के लिए काम करना चाहती थीं। उनकी रुचि साहित्य, कला और संगीत में थी लेकिन सबसे अधिक रुचि अध्यापन में थी। शिक्षा के माध्यम से सामाजिक कार्यों में उनकी सक्रिय भूमिका उनके प्रारंभिक जीवन से ही दिखाई देती है। बर्लिन में अपना स्वयं का किंडरगार्डन शुरू किया था।

फिलिप्सबोर्न ने बेन शेमेन यूथ विलेज प्रोजेक्ट को भी सपोर्ट किया थे। इसे 1927 में अल्फ्रेड लेम और सिगफ्राइड लेहमैन द्वारा शुरू किया गया था। बेन शेमेन यूथ विलेज प्रोजेक्ट में फिलिस्तीन में एक कृषि बोर्डिंग स्कूल खोलना भी शामिल था। फिलिप्सबोर्न ने प्रोजेक्ट के लिए न सिर्फ धन जुटाया बल्कि 1932 में स्कूल में पढ़ाया भी। इसके अलावा वह बर्लिन में शरणार्थी बच्चों के लिए करने वाले एक संगठन से भी जुड़ी थीं।

जामिया से कैसे जुड़ा दिल?

बात उन दिनों की है जब जामिया के संस्थापकों में से एक जाकिर हुसैन उच्च शिक्षा के लिए बर्लिन (जर्मनी) गए थे। वहीं उनकी मुलाकात, आबिद हुसैन और मोहम्मद मुजीब से हुई। यूट्यूब चैनल Nous Network को दिए एक इंटरव्यू में प्लानिंग कमीशन ऑफ़ इंडिया की पूर्व सदस्य डॉ. सईदा हमीद बताती हैं कि "तब बर्लिन में एक भारतीय दंपती रहा करता था। उन्होंने एक शाम स्टूडेंट्स के लिए पार्टी रखी, जिसमें तीन भारतीय छात्रों को भी आमंत्रित किया गया था। ये छात्र थे, जाकिर हुसैन, आबिद हुसैन और मोहम्मद मुजीब।"

बाद में इन तीनों की दोस्ती गेर्डा फिलिप्सबोर्न से हुई। वो इन तीनों लोगों से उम्र में थोड़ी छोटी थीं। बाद में प्रोफेसर मुजीब ने लिखा कि "कोई इस दोस्ती की गहराई का अंदाजा नहीं लगा सकता था।" जाकिर हुसैन, आबिद हुसैन और मोहम्मद मुजीब अक्सर फिलिप्सबोर्न से से इस बारे में चर्चा करते थे कि वे भारत जाकर क्या करने वाले हैं। इसमें शिक्षा के क्षेत्र में काम करना भी शामिल था। ये सब जानकर फिलिप्सबोर्न को बहुत अच्छा लगता था। वह गांधी से प्रभावित थीं और भारत में काम करना चाहती थीं। जाकिर हुसैन उन्हें बताते थे कि भारत में उनके लिए रहना आसान नहीं होगा। वहां जीवनशैली, आचार-व्यवहार सब यहां (जर्मनी) से बहुत अलग है।    

खैर, हकीम अजमल खान से ऑस्ट्रिया में मुलाकात के बाद तीनों दोस्त भारत आ गए और जामिया के लिए काम करने लगे। 1932 में जाकिर हुसैन जामिया के वाइस चांसलर बन गए। एक सुबह उन्हें फिलिप्सबोर्न का टेलीग्राम मिला। इसमें फिलिप्सबोर्न के बॉम्बे आने की सूचना थी। यह जर्मनी में हिटलर के आतंक का समय था। यहूदियों पर अत्याचार का समय था। यहूदी बड़े पैमाने पर जान बचाकर जर्मनी छोड़ भाग रहे थे।

फिलिप्सबोर्न अपनी जान बचाने के लिए दुनिया के किसी और देश में भी जा सकती थीं लेकिन उन्होंने भारत आना चुना। वह गांधीवादी असहयोग आंदोलन से निकलने और 29 अक्टूबर, 1920 को स्थापित हुए जामिया के लिए काम करना चाहती थीं। तब जामिया अलीगढ़ से निकलकर दिल्ली के करोल बाग में आ चुका था। तब जामिया संसाधनों की किल्लत से जूझ रहा था। वहां न बिजली की पर्याप्त सुविधा थी, न पानी की। सफाई और अन्य सुविधाओं की बात ही क्या करें। इन परिस्थितियों में गेर्डा फिलिप्सबोर्न जामिया आईं और उसका हिस्सा बनीं।

उन्हें किंडरगार्टन शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया। नियुक्ति के साथ ही  उन्होंने बच्चों को पढ़ाने, धन जुटाने और संस्था-निर्माण में सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू कर दिया। वह पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों के स्वास्थ्य और खेलकूद का भी ध्यान रखती थीं। अगर किसी बच्चे को टाइफाइड हो जाए तो उसे कई हफ्तों तक अपने बेडरूम में रखकर इलाज करती थीं।

इस काम के साथ-साथ वह एक जर्मन फर्म में टाइपिंग का पार्ट टाइम भी काम करती थीं। वहां से मिलने वाली सैलरी को वह जामिया को दे दिया करती थीं। जल्द ही वह जामिया की आपा के नाम से जाने लगीं।

बच्चों की पढ़ाई और देखभाल से आगे बढ़कर वह यह सुनिश्चित करने में भी लग गईं कि जामिया की एक्टिविटी में महिलाओं की भागीदारी कैसे बढ़े। जामिया के लिए पैसा जुटाने की खातिर उन्होंने देश भर की यात्रा की। वह ट्रेन के तीसरे दर्जे में यात्रा करती थीं। गर्मियों के दौरान मैदानी इलाकों की चिलचिलाती गर्मी से बचने के लिए उन्हें पहाड़ों में जाने के लिए कहा गया, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया, क्योंकि उन्हें छुट्टियों में भी जरूरी काम करना होता था।

अंग्रेजों ने जेल में डाल दिया

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मन होने की वजह से अंग्रेजों ने गेर्डा फिलिप्सबोर्न को कुछ समय के लिए जेल में डाल दिया था। उन्हें अहमदनगर जेल में रखा गया था। बताया जाता है कि उन्हें जेल में भी अपने स्कूल के बच्चों की ही चिंता होती थी।

समय के साथ गेर्डा का स्वास्थ्य खराब रहने लगा। जामिया के सदस्यों को उनकी चिंता होने लगी। उन्हें दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनके कैंसर से ग्रस्त होने की जानकारी मिली। सभी उन्हें इलाज के लिए यूरोप भेजना चाहते थे। लेकिन वह नहीं मानीं। उन्होंने अपने जीवन के आखिरी समय तक जामिया में रहना चुना।

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