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Ayodhya Ram Mandir: कैसे होती है प्राण प्रतिष्ठा? जानिए मूर्ति को भगवान बनाए जाने की पूरी प्रक्रिया!

Pran Pratishtha At Ayodhya Ram Temple: द इंडियन एक्सप्रेस में यशी ने प्राण प्रतिष्ठा का पूरी प्रक्रिया बताई है। साथ ही यह भी बताया है कि क्या ऐसी कोई मूर्ति है जिसमें प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता न हो?
Written by: एक्सप्लेन डेस्क | Edited By: Ankit Raj
नई दिल्ली | Updated: January 10, 2024 19:27 IST
ayodhya ram mandir  कैसे होती है प्राण प्रतिष्ठा  जानिए मूर्ति को भगवान बनाए जाने की पूरी प्रक्रिया
अयोध्या का निर्माणाधीन राम मंदिर (PC-X/@ShriRamTeerth)
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Ayodhya Ram Mandir Pran Pratishtha: अयोध्या के राम मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा का दिन करीब आ रहा है। प्राण प्रतिष्ठा समारोह का आयोजन 22 जनवरी को किया जाएगा। हालांकि अनुष्ठानों की शुरुआत 16 जनवरी से ही जो जाएगी।

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सरल शब्दों में प्राण प्रतिष्ठा का मूल अर्थ है- मूर्ति को जीवन देना। प्राण प्रतिष्ठा समारोह में वेदों और पुराणों से लिए गए विभिन्न अनुष्ठान शामिल होते हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना महत्व होता है।

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आइए विस्तार से जानते हैं कि प्राण प्रतिष्ठा वास्तव में क्या है और इसे कैसे किया जाता है? उपासक अपने उपास्य को प्राण या जीवन कैसे प्रदान कर सकता है?

प्राण प्रतिष्ठा क्या है?

प्राण प्रतिष्ठा वह कार्य है जो एक मूर्ति को देवता में बदल देता है, उसे प्रार्थना स्वीकार करने और वरदान देने की क्षमता देता है। इसके लिए प्रतिमा को विभिन्न चरणों से गुजरना होता है। यहां हम कुछ प्रमुख चरणों के बारे में बताएंगे। प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में कितने चरण शामिल किए जाएंगे, यह इस बात पर निर्भर करता है कि समारोह कितने बड़े या छोटे पैमाने पर किया जा रहा है।

शोभा यात्रा

पहले चरणों में से एक शोभा यात्रा या मूर्ति का जुलूस निकाला जाता है। यह मंदिर के पड़ोस में ही निकाला जाता है। अयोध्या में राम की मूर्ति के लिए शोभायात्रा 17 जनवरी को है। इस यात्रा के दौरान, जब दर्शक मूर्ति का स्वागत करते हैं और उसकी जय-जयकार करते हैं, तो उनकी कुछ भक्ति उसमें स्थानांतरित हो जाती है, जिससे वह भक्ति और दिव्य शक्ति से भर जाती है। इस प्रकार भक्त ही एक मूर्ति को भगवान में बदलने की प्रक्रिया शुरू करता है।

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एक बार जब मूर्ति मंडप में वापस आ जाती है तो प्राण प्रतिष्ठा की रस्में शुरू हो जाती हैं। गुजरात के वापी में पाराशर ज्योतिषालय चलाने वाले डॉ दीपकभाई ज्योतिषाचार्य ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि प्राण प्रतिष्ठा चलित मूर्ति और स्थिर मूर्ति दोनों के लिए आयोजित की जा सकती है। चलित मूर्ति का अर्थ हुआ घरेलू मूर्तियां जिन्हें इधर-उधर ले जाया जा सकता है। वहीं स्थिर मूर्ति का अर्थ हुआ मंदिर की मूर्तियां जो एक बार स्थापित हो जाती हैं और वैसे ही रहती हैं।

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श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (नई दिल्ली) में वेद विभाग के प्रोफेसर डॉ. सुंदर नारायण झा ने कहा कि जब प्राण प्रतिष्ठा के लिए मंत्र का जाप किया जाता है, तो प्रार्थना मूर्ति को जीवन देने और जीवन त्यागने के लिए तैयार होने, दोनों के लिए होती है। झा समझाते हैं, "ऐसा इसलिए है, क्योंकि यदि वह विशेष मूर्ति क्षतिग्रस्त हो जाती है, तो उसके स्थान पर दूसरी मूर्ति स्थापित करनी होगी और क्षतिग्रस्त मूर्ति से नई मूर्ति में जीवन प्रवाहित होना चाहिए।"

अधिवास

प्राण प्रतिष्ठा के लिए मूर्ति तैयार करने के लिए कई अधिवास आयोजित किए जाते हैं, जिसमें मूर्ति को विभिन्न सामग्रियों में डुबोया जाता है। एक रात के लिए मूर्ति को पानी में रखा जाता है, जिसे जलाधिवास कहा जाता है। फिर इसे अनाज में डुबोया जाता है, जिसे धन्यधिवास कहा जाता है। झा ने बताया कि जब कोई मूर्ति बनाई जाती है, तो उस पर शिल्पकार के औजारों से कई तरह की चोटें आती हैं। ये अधिवास ऐसी सभी चोटों को ठीक करने के लिए हैं।

डॉ दीपकभाई ज्योतिषाचार्य ने बताया कि यह प्रक्रिया एक अन्य उद्देश्य को भी पूरा करती है। वह कहते, "यदि मूर्ति में कोई दोष है या यदि पत्थर अच्छी गुणवत्ता का नहीं है, तो इसका पता तब चलेगा जब इसे विभिन्न सामग्रियों में डुबोया जाएगा।"

अनुष्ठान स्नान

इसके बाद मूर्ति को आनुष्ठानिक स्नान कराया जाता है और समारोह के पैमाने के आधार पर विभिन्न सामग्रियों से उसका अभिषेक किया जाता है। बीएपीएस स्वामीनारायण संस्था के अनुसार, "इस संस्कार में 108 विभिन्न प्रकार की सामग्रियां शामिल हो सकती हैं, जैसे पंचामृत, विभिन्न सुगंधित फूलों और पत्तियों के सार वाला पानी, गाय के सींगों पर डाला गया पानी और गन्ने का रस।" सबसे महत्वपूर्ण समारोह देवता की आंखें खोलने का होता है।

आँखों का खुलना

अधिवास और आनुष्ठानिक स्नान कराने के बाद मूर्ति को जगाने का समय आता है। कई मंत्रों का जाप किया जाता है, जिसमें विभिन्न देवताओं से आने और मूर्ति के विभिन्न हिस्सों को चेतन करने (सक्रिय करने) के लिए कहा जाता है - जैसे कि सूर्य से आंखें, वायु से कान, चंद्र से मन, आदि।

फिर अंतिम चरण आता है, मूर्ति की आँखों के खोलने का। इस समारोह में सोने की सुई के से देवता की आंखों के चारों ओर काजल लगाया जाता है। यह प्रक्रिया पीछे से की जाती है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि यदि कोई भगवान की आंखें खुलते ही उनमें देख ले, आंखों में बहुत अधिक चमक जा सकती है।

झा ने बताते हैं, "माना जाता है कि काजल को ककुद पर्वत से लाया गया था। समारोह के लिए आवश्यक काला पाउडर बनाने के लिए पहाड़ पर पाए जाने वाले एक काले पत्थर को रगड़ा जाता है। लेकिन चूँकि वह पहाड़ अब चीन में है, हम घी और शहद से काम चलाते हैं।" एक बार जब काजल लग जाता है और देवता की आंखें खुल जाती हैं, तो मूर्ति में जीवन आ जाता है।

इन चरणों का उल्लेख कहाँ किया गया है?

प्राण प्रतिष्ठा की प्रक्रिया का उल्लेख वेदों में किया गया है। इसके अलावा विभिन्न पुराणों, जैसे मस्त्य पुराण, वामन पुराण, नारद पुराण आदि में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है।

क्या ऐसी कोई मूर्ति है जिसमें प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता न हो?

झा ने कहा कि दो दिव्य वस्तुएं - गंडकी नदी में पाए जाने वाले शालिग्राम और नर्मदा नदी में पाए जाने वाले शिवलिंग नर्मदेश्वर को प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे अपने भीतर दिव्यता रखते हैं।