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जिस महर्षि वाल्मीकि के नाम पर रखा गया अयोध्या हवाई अड्डे का नाम, जानिए उनके बारे में पांच रोचक तथ्य

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को अयोध्या में महर्षि वाल्मीकि एयरपोर्ट का उद्घाटन किया। इस आर्टिकल में आप उस महान भारतीय ऋषि के बारे में जानेंगे, जिन्हें रामायण लिखने का श्रेय दिया जाता है।
Written by: एक्सप्लेन डेस्क | Edited By: Ankit Raj
नई दिल्ली | Updated: January 04, 2024 14:04 IST
जिस महर्षि वाल्मीकि के नाम पर रखा गया अयोध्या हवाई अड्डे का नाम  जानिए उनके बारे में पांच रोचक तथ्य
रामायण के उत्तरकांड के अनुसार महर्षि वाल्मीकि भगवान राम के जुड़वां बेटों लव और कुश के गुरु थे। (Wikimedia Commons)
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अर्जुन सेनगुप्ता

अयोध्या के निर्माणाधीन राम मंदिर के भव्य उद्घाटन में एक महीने से भी कम समय बचा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (30 दिसंबर) को अयोध्या के नवनिर्मित महर्षि वाल्मीकि हवाई अड्डे का उद्घाटन किया।

हवाई अड्डे का नाम महर्षि (महान ऋषि) वाल्मीकि के नाम पर रखा गया है, जिन्हें रामायण के सबसे पुराने संस्करण के लेखक के रूप में जाना जाता है। इस आर्टिकल में हम महान कवि-ऋषि के बारे में पांच रोचक तथ्य जानेंगे।

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  1. महर्षि वाल्मीकि को आदि कवि के नाम से भी जाना जाता है

वाल्मीकि को आदि कवि या संस्कृत का 'प्रथम/मौलिक कवि' भी कहा जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें रामायण की रचना करने का श्रेय दिया जाता है और रामायण को संस्कृत साहित्यिक परंपरा में पहला महाकाव्य माना जाता है। इतिहासकार रोमिला थापर ने अर्ली इंडिया (2002) में लिखा, "इसे अक्सर पहली सचेत साहित्यिक रचना, आदि-काव्य के रूप में वर्णित किया जाता है, जिसका वर्णन किसी अन्य महाकाव्य के लिए नहीं किया गया है।"

हालांकि, पाठ के साहित्यिक विश्लेषण से संकेत मिलता है कि महाभारत, जिसका श्रेय ऋषि व्यास को दिया जाता है, वास्तव में रामायण से ज्यादा पुराना हो सकता है। थापर ने लिखा, "रामायण की भाषा अधिक परिष्कृत है और इसकी अवधारणाएं बाद के समाज से अधिक संबंधित हैं, हालांकि पारंपरिक रूप से इसे महाभारत से पहला का माना जाता है।"

थापर रामायण का समय लगभग पहली शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य का बताती हैं, हालांकि रॉबर्ट गोल्डमैन जैसे विद्वान इसे आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व का बताते हैं।

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  1. वाल्मीकि स्वयं बाल और उत्तर काण्ड में प्रकट होते हैं

वाल्मीकि की रामायण को सात सर्गों या कांडों में विभाजित किया गया है, जिनमें से प्रत्येक भगवान राम की कहानी का एक अलग हिस्सा बताता है। वाल्मीकि स्वयं महाकाव्य के पहले और आखिरी अध्याय, बाल और उत्तर कांड में अपना जिक्र करते हैं।

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बाल कांड की शुरुआत वाल्मीकि द्वारा ऋषि नारद से यह पूछने से होती है कि क्या दुनिया में अभी भी कोई धर्मी व्यक्ति बचा है, जिस पर नारद राम का नाम लेकर जवाब देते हैं। इसके बाद वाल्मीकि ने अपनी कथा शुरू की है। उत्तर कांड में राम द्वारा अपनी पत्नी सीता को निर्वासित करने के बाद, उन्हें वाल्मीकि के आश्रम में शरण मिलती है। वहां उन्होंने जुड़वां बच्चों लव और कुश को जन्म दिया, जो बाद में उनके शिष्य बन गए। बाला कांड में रामायण की कहानी को वाल्मीकि द्वारा लव और कुश को सुनाए गए किस्से के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

विशेष रूप से ये दोनों अध्याय संभवतः महाकाव्य में बाद में जोड़े गए हैं। अर्शिया सत्तार ने Uttara: The Book of Answers (2017) में लिखा, "पहले और आखिरी अध्याय की भाषा और लहजे को देखते हुए स्पष्ट है कि ये बाद की भाषा है। अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें बाद के धार्मिक काल का जिक्र है, जब विष्णु एक देवता बन गए हैं।"

  1. तुलसीदास का रामचरितमानस कहीं अधिक लोकप्रिय है

पूरे भारत और विदेशों में रामायण के कई संस्करण हैं, जिनमें से प्रत्येक की अपनी विशिष्ट शैली और घटनाओं का संस्करण है। हालांकि अधिकांश लोग वाल्मीकि को भगवान राम की कहानी का मूल लेखक मानते हैं। लेकिन तुलसीदास का रामचरितमानस आज कहीं अधिक लोकप्रिय है।

16वीं शताब्दी के भक्ति कवि तुलसीदास का संस्करण शास्त्रीय संस्कृत के बजाय स्थानीय भाषा अवधी में रचा गया है। यह इसकी वर्तमान लोकप्रियता की कुंजी है। वास्तव में साहित्य का एक प्रभावशाली रचना होने के बावजूद वाल्मीकि की रामायण आम लोगों के बीच लोकप्रिय नहीं है। रामचरितमानस ने राम की कहानी को आम आदमी के लिए उपलब्ध कराया। इससे इसका नाटकीय रूपांतरण रामलीला भी आसान हो गया।

कुछ लोगों का मानना है कि तुलसीदास वास्तव में वाल्मीकि के अवतार थे।

  1. वाल्मीकि की जाति को लेकर बहस

ऋषि वाल्मीकि की जाति को लेकर एक विवादित बहस प्रचलित रही है। देश भर में कई अनुसूचित जातियां ऋषि से अपनी वंशावली जोड़ती हैं। साथ ही कुछ धार्मिक स्रोत उनकी पहचान एक ब्राह्मण के रूप में करते हैं।

2016 में कर्नाटक सरकार ने वाल्मीकि यारु नामक पुस्तक के बाद वाल्मीकि की जाति निर्धारित करने के लिए 14 सदस्यीय समिति का गठन किया था। कन्नड़ लेखक केएस नारायणाचार्य की किताब ने राज्य में तूफान ला दिया था। पुस्तक में नारायणाचार्य ने दावा किया कि वाल्मीकि एक ब्राह्मण थे, जिसकी नाविक समुदाय ने भारी आलोचना की, जो मानते हैं कि वाल्मीकि उनमें से एक थे।

अंततः वाल्मीकि की जाति और मूल का विवरण देने वाले कई प्रतिस्पर्धी संस्करण हैं। जैसा कि लेखक और सामाजिक टिप्पणीकार प्रियदर्शन ने 2016 में फॉरवर्ड प्रेस के लिए लिखा था, "जब आप वाल्मीकि की जाति की खोज करने निकलेंगे, तो आपका सामना ऐतिहासिक तथ्यों से नहीं, बल्कि किंवदंतियों और मिथकों से होगा।"

  1. डाकू से संत तक का सफर

वाल्मीकि की जातिगत पहचान पर विवाद के पीछे एक कारण उनकी लोकप्रिय कहानी है। ऋषि बनने से पहले, वाल्मीकि को रत्नाकर के नाम से जाना जाता था और वह एक खूंखार डाकू और शिकारी थे। जबकि कहानी के कुछ संस्करणों का दावा है कि वह वास्तव में जंगल में खो जाने से पहले एक ब्राह्मण के घर पैदा हुआ थे। बाद में उन्हें एक शिकारी जोड़े ने गोद लिया था। कहानी के अन्य संस्करणों का दावा है कि उनका जन्म एक भील राजा के यहाँ हुआ था। वह किसी ग्रामीणों और यात्रियों को लूटकर अपना जीवन यापन करता थे।

एक दिन उनकी मुलाकात नारद मुनि से हुई और उनका जीवन बदल गया। दूसरों के विपरीत नारद रत्नाकर से डरते नहीं दिखे, बल्कि उन्होंने उनसे बात की, जिससे उन्हें एहसास हुआ कि वह जो कर रहे थे वह गलत था और उन्हें अपने तरीके में सुधार करना चाहिए। रत्नाकर ने संत से प्रार्थना की कि वे उसे माफ कर दें और उसके दुष्कर्मों का प्रायश्चित करने में उसकी मदद करें। नारद ने रत्नाकर को राम का नाम जपने के लिए कहा।

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