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CineGram: वो तवायफ जो बनी हिंदी सिनेमा की पहली महिला फिल्म प्रोड्यूसर, संजय दत्त से है गहरा नाता

CineGram: नरगिस की मां और संजय दत्त की नानी जद्दनबाई इलाहाबाद की मशहूर तवायफ हुआ करती थीं। लेकिन जब अंग्रेजों ने उनके कोठे उजाड़े तो वह फिल्मों की तरफ आईं और इंडस्ट्री में बड़ा नाम कमाया।
Written by: एंटरटेनमेंट डेस्‍क | Edited By: Gunjan Sharma
नई दिल्ली | May 21, 2024 11:51 IST
cinegram  वो तवायफ जो बनी हिंदी सिनेमा की पहली महिला फिल्म प्रोड्यूसर  संजय दत्त से है गहरा नाता
तवायफ थीं नरगिस की मां (फोटो-IE)

संजय लीला भंसाली की वेब सीरीज 'हीरामंडी' की रिलीज के बाद से तवायफों को लेकर रोज नई-नई कहानियां सामने आ रही हैं। हिंदी सिनेमा जगत की कई एक्ट्रेसेस के नाम निकलकर सामने आए, जो तवायफों के खानदान से ताल्लुक रखती हैं। इनमें नीतू सिंह, सायरा बानो और नरगिस का नाम शामिल है। बॉलीवुड में कई ऐसे स्टार्स हैं, जिनकी मां या किसी की नानी तवायफ रही है, लेकिन आज हम सिनेमा जगत के ऐसे बड़े नाम के बारे में बात करने जा रहे हैं, जो खुद इस पेशे से निकलकर आईं और पहली महिला फिल्म प्रोड्यूसर बनीं।

हम बात कर रहे हैं संजय दत्त की नानी यानी नरगिस की मां की। जो पेशे से एक तवायफ थीं। नरगिस की मां ही नहीं उनकी नानी भी तवायफ थीं। उनके सफर के बारे में हम आपको विस्तार से बताने वाले हैं। तवायफ शब्द को लोग गलत तरीके से सोचते हैं, लेकिन इस पेशे का असली मतलब कला से जुड़ा होता था। तवायफें नवाबों और अमीर खानदान के मर्दों को तहजीब, शायरी आदि सिखाया करती थीं। इन तवायफों में एक नाम जद्दनबाई का भी है, जो इलाहाबाद के एक कोठे पर पैदा हुई थीं। उनकी मां एक तवायफ थीं, जिनका नाम था दलीपाबाई। जद्दनबाई अपनी गायकी के लिए मशहूर थीं। लेकिन किस्मत ने उनके लिए और कुछ अच्छा लिखा था, वो इस पेशे से निकलकर हिंदी सिनेमा की पहली महिला प्रोड्यूसर बनीं।

बात साल 1857 की है, जब अंग्रेजों ने लखनऊ, आगरा, दिल्ली और लाहौर में अपने पैर जमा लिए थे और तभी से तवायफों का बुरा वक्त शुरू हो गया था। तवायफों को नाचने वाली कहा जाने लगा। कुछ साल बीते और 1890 में इन्हें प्रॉस्टिट्यूट घोषित कर दिया। उनके कोठे बदनाम होने लगे और जो हुनर वाले थे वो अपने लिए काम खोजने लगे।

जद्दनबाई की गायकी खूब मशहूर थी, वह कोलंबिया ग्रामोफोन कंपनी के साथ गजलें रिकॉर्ड कर चुकी थीं। वह अलग-अलग जगह जाकर शाही महफिलों में परफॉर्म करने लगीं। फिर साल 1933 में कुछ यूं हुआ कि जद्दनबाई की किस्मत बदल गई। उनके हुनर के कद्रदान मिल गए और उन्हें फिल्म 'राजा गोपीचंद' में काम करने का मौका मिला।

इस फिल्म में जद्दनबाई ने मां का किरदार निभाया था, इसके बाद उन्होंने 'प्रेम परीक्षा' और 'सेवा सदन' में काम किया। ऐसे ही उन्होंने इंडस्ट्री में पैर जमाए और फिर अपना प्रोडक्शन हाउस शुरू किया, जिसका नाम था 'संगीत फिल्म्स'। इसके साथ ही वो म्यूजिक कंपोजर भी बन गईं।

जद्दनबाई ने ही बेटी को बनाया था एक्ट्रेस

बता दें कि नरगिस को फिल्म इंडस्ट्री में लाने वाली कोई और नहीं जद्दनबाई ही थीं। उन्होंने अपनी निमृत फिल्म 'तलाश-ए-इश्क' में नरगिस से बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम करवाया था। इसके साथ ही नरगिस का फिल्मी सफर शुरू हुआ था।

जद्दनबाई के बेटे भी बने हीरो

बता दें कि नरगिस मां यानी जद्दनबाई ने तीन शादियां की थीं। इतना ही नहीं उनके लिए दो लोगों ने इस्लाम अपनाया था। पहली शादी गुजराती बिजनेसमैन नरोत्तमदास खत्री से की थी, जिन्होंने जद्दनबाई के लिए इस्लाम धर्म अपनाया। दोनों का एक बेटा हुआ, जिसका नाम अख्तर हुसैन रखा। वो भी फिल्म प्रोड्यूसर बने। जद्दनबाई ने दूसरी शादी अपने साथ हारमोनियम बजाने वाले उस्ताद जी से की, उनसे भी उन्हें एक बेटा हुआ, जो बड़ा होकर एक्टर बना। इसके बाद जद्दनबाई ने तीसरी शादी भी की और इस बार उनके पति का नाम उत्तमचंद त्यागी था, जिन्होंने इस्लाम कबूल किया और उनके साथ जद्दनबाई की बेटी हुई, जो थीं नरगिस।

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