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सपा से मिल रही 7 सीटों के बजाय BJP के कम सीटों के ऑफर में RLD को क्यों दिखाई दे रहा फायदा? 

RLD BJP Alliance News: कयास लगाए जा रहे हैं कि जयंत चौधरी एनडीए में शामिल हो सकते हैं। पिछले दो लोकसभा चुनावों में उन्हें एक भी सीट हासिल नहीं हुई थी।
Written by: Yashveer Singh
Updated: February 07, 2024 13:45 IST
सपा से मिल रही 7 सीटों के बजाय bjp के कम सीटों के ऑफर में rld को क्यों दिखाई दे रहा फायदा  
क्या बीजेपी से गठबंधन करेंगे जयंत चौधरी? (File Photo - Express/Vishal Srivastav)
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Western UP Politics: लोकसभा चुनाव के ऐलान में अभी मामूली वक्त बाकी है लेकिन देश के दोनों बड़े दलों बीजेपी और कांग्रेस ने इसके लिए काफी पहले से तैयारी शुरू कर दी हैं। एक तरफ जहां कांग्रेस ने एनडीए को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए इंडिया गठबंधन की रचना की तो वहीं दूसरी तरफ बीजेपी ने इस विपक्षी गठबंधन को ही तोड़ने पर काम शुरू कर दिया। इंडिया गठबंधन के आइडिया को क्रिएट करने वाले नीतीश कुमार को एनडीए में शामिल करने के बाद अब खबर है कि पश्चिमी यूपी के जयंत चौधरी भी एनडीए में शामिल हो सकते हैं।

कहा जा रहा है कि जयंत चौधरी ने बीजेपी से पांच सीटों की डिमांड की है और बीजेपी रालोद को तीन से चार सीटें देने के लिए राजी भी है... लेकिन अब ये सवाल उठ रहा है कि जब सपा रालोद को सात सीटें देने की घोषणा कर चुकी है तो जयंत चौधरी को बीजेपी से मिलने वाली तीन से पांच सीटों में फायदा क्यों नजर आ रहा है?

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प्राप्त जानकारी के अनुसार, सपा ने रालोद को सात सीटें देने की घोषणा तो की लेकिन वो इनमें से दो से तीन सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारना चाहती है। सपा रालोद को बागपत, कैराना, मुजफ्फरनगर, मथुरा और हाथरस देने के लिए तो राजी है। इसके अलावा बिजनौर और कैराना लोकसभा सीट पर भी सपा रालोद के सिंबल पर अपना प्रत्याशी लड़ाना चाहती है। मुजफ्फरनगर सीट पर भी दोनों दलों में बात बनती नजर नहीं आ रही है। कहा जा रहा है कि सपा चाहती है कि इस सीट पर रालोद उसके नेता हरेंद्र मलिक को चुनाव लड़वाए लेकिन RLD के लोकल नेता इसके खिलाफ हैं। ऐसे में असल में रालोद के पास सिर्फ चार सीटें ही जाती दिखाई दे रही हैं और उनपर भी पार्टी को जीत मिल जाए, इसपर खुद रालोद के नेताओं को भी संशय है।

क्यों BJP के साथ RLD को दिखाई दे रहा फायदा?

मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि बीजेपी जयंत चौधरी को बागपत, अमरोहा, कैराना और मथुरा सीटें देने के लिए राजी है। अब ऐसा क्या है कि जयंत चौधरी को सपा की सात सीटों के बजाय बीजेपी से मिलने वाली तीन से पांच सीटों में फायदा नजर आ रहा है, आइए आपको बताते हैं।

दरअसल साल 2014 और साल 2019 में हुए दोनों लोकसभा चुनाव को में रालोद कुल 11 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ी और उनका प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा।2014 के चुनाव में रालोद का कांग्रेस से गठबंधन था। उसने 8 लोकसभा सीटों - बागपत, अमरोहा, बिजनौर, बुलंदशहर, फतेहपुर सीकरी, हाथरस, बुलंदशहर, कैराना पर प्रत्याशी उतारे लेकिन रिजल्ट जीरो रहा। रालोद चीफ अजित सिंह बागपत से चुनाव हार गए, इसी तरह मथुरा से जयंत चौधरी को 3 लाख से ज्यादा वोटों से हार का सामना करना पड़ा।

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2019 के लोकसभा चुनाव में रालोद सपा-बसपा गठबंधन का हिस्सा थी। अखिलेश यादव ने रालोद को तीन सीटें- बागपत, मुजफ्फरनगर और मथुरा दीं। बागपत से जयंत चौधरी, मुजफ्फरनगर से अजित सिंह और मथुरा से कुंवर नरेंद्र सिंह चुनाव लड़े। इस बार भी रालोद लोकसभा चुनाव में खाता खोलने में असफल रही। अजित सिंह बीजेपी के संजीव बालियान से चुनाव हार गए, जयंत चौधरी को बागपत से हार का सामना करना पड़ा। यह लगातार दूसरा ऐसा चुनाव था,  जब चौधरी परिवार को भी सदस्य लोकसभा नहीं पहुंच पाया।

राम मंदिर के बाद जमीन पर और भी बदले हालात

लोकसभा चुनाव 2019 में मुजफ्फरनगर में अजित सिंह तब चुनाव हार गए थे, जब उसके साथ सपा और बसपा दोनों दल थे। पूरा मुस्लिम वोट बीजेपी के विरोध में रालोद को मिला लेकिन बावजूद इसके अजित सिंह चुनाव हार गए। जयंत चौधरी पिछले दो लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद यह तो समझ गए हैं कि जाट मतदाता पूरी तरह उनके साथ नहीं है। इस बार मायावती भी अपना प्रत्याशी उतारने का ऐलान कर चुकी हैं, ऐसे में उनकी जीत की संभावनाएं और कम ही होंगी।

ये दो फैक्टर भी जयंत के माइंड में हैं

जयंत और अखिलेश के बीच अभी तक अच्छी केमिस्ट्री दिखाई दी है लेकिन रालोद का गिरता वोट शेयर उसके लिए चिंता का विषय है। रालोद के सामने राज्य स्तर की पार्टी का स्टेटस छिनने का भी खतरा है। अगर वह बीजेपी के साथ लड़ती है तो न सिर्फ उसके जीतने की संभावना ज्यादा है बल्कि उसका वोट शेयर भी बढ़ना तय है। इसके अलावा रालोद का परंपरागत वोट 2014 से बीजेपी की तरफ झुकता नजर आ रहा है। जाटों के वोट बंटने से बीजेपी से ज्यादा जयंत का नुकसान है और ऐसे में गठबंधन दोनों के लिए फायदा का सौदा है।

बीजेपी के लिए जयंत क्यों जरूरी?

बीजेपी लगातार लोकसभा में 400+ की बात कर रही है। यह नंबर हासिल करने के लिए जरूरी है कि वो यूपी की पूरी तरह स्वीप करे, पिछले चुनाव में यूपी वेस्ट में उसे सपा और बसपा ने मिलकर आठ सीटों पर फतह हासिल की थी। अगर जयंत बीजेपी के साथ आते हैं और सपा-बसपा अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो ये बीजेपी के लिए फायदे की डील साबित होगी। यूपी में जाटों की करीब 18 फीसदी आबादी है, बीजपी मेरठ, मुजफ्फरनगर सहित तीन सीटों पर मामूली अंतर से जीती थी। जयंत के साथ आने पर यहां राहें आसान हो जाएगी। कहा जा रहा है कि बीजेपी रालोद को कैराना, बागपत, मथुरा और अमरोहा के अलावा एक राज्यसभा सीट भी दे सकती है।

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