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उत्तर प्रदेश: मिले मुलायम कांशीराम…नारे का गवाह है मैनपुरी का क्रिश्चियन मैदान

कांशीराम की इटावा से जीत के बाद उत्तर प्रदेश में मुलायम और कांशीराम के साथ उनकी जुगलबंदी शुरू हुई। इसका लाभ उत्तर प्रदेश में 1995 में मुलायम सिंह यादव को हुआ। लेकिन 2 जून 1995 को हुए गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा-बसपा के बीच बढ़ी तकरार इस कदर हावी हो गई कि दोनों दल एक दूसरे को खत्म करने पर आमादा हो गए। लेकिन 2019 में एक बार फिर संसदीय चुनाव में सपा-बसपा साथ आए। मन माफिक नतीजा सामने न आने के कारण दोनों दलों के बीच फिर अलगाव हो गया।
Written by: दिनेश शाक्य | Edited By: Bishwa Nath Jha
नई दिल्ली | Updated: May 01, 2024 12:28 IST
उत्तर प्रदेश  मिले मुलायम कांशीराम…नारे का गवाह है मैनपुरी का क्रिश्चियन मैदान
मुलायम सिंह|कांशीराम। फोटो -(इंडियन एक्सप्रेस)।
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करीब तीन दशक पहले उत्तर प्रदेश में मैनपुरी संसदीय सीट का ऐतिहासिक क्रिश्चियन मैदान बहुचर्चित नारे…..मिले मुलायम कांशीराम हवा में उड़ गए जय श्री राम ……का गवाह बन गया था। इस नारे को कांशीराम के पुराने वफादार और 1991 के चुनाव प्रभारी रहे बसपा नेता खादिम अब्बास ने दिया था।

बसपा के पुराने नेता खादिम अब्बास बताते है कि 1992 मे मैनपुरी के ऐतिहासिक क्रिश्चियन मैदान में हुई एक सभा मे जब बोलने के लिए वे मंच पर आए तो अचानक यह नारा मुंह से सामने आया जो बाद मे पूरे देश मे गूंज उठा। खादिम अब्बास के पास कांशीराम से जुडी हुई ऐसी तस्वीरे हैं जो उनके प्रति प्रेम आज भी उजागर करती हैं। एक तस्वीर वह है जिसमे कांशीराम नामाकंन भर रहे हैं और दूसरी एक रोजअफतार समारोह मे जाने से पहले की है। दोनों तस्वीरों मे खादिम अब्बास कांशीराम के पास ही हैं।

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खादिम बताते है कि कांशीराम मुलायम सिंह के बीच हुए समझौते के तहत कांशीराम ने अपने लोगों से ऊपर का वोट हाथी और नीचे का वोट हलधर किसान चिन्ह के सामने देने के लिए कह दिया था। विवादित ढांचा टूट चुका था, ऐसे मे इस नारे ने काफी कुछ राजनीतिक माहौल बना दिया था। खादिम अब्बास की माने तो कांशीराम ने अपनी शर्ताें के अनुरूप मुलायम सिंह यादव से खुद की पार्टी यानी समाजवादी पार्टी गठन करवाया और तालमेल किया ।

चुनावी बिसात पर नारों का खासा महत्त्व माना जाता है। इस नारे ने राजनीतिक बिसात मे खासा परिवर्तन किया। अनजाने मे जन्मे इस नारे ने देश और प्रदेश की राजनीति मे बडा परिवर्तन किया। इस नारे का सजृन करने वाले खादिम अब्बास आज भले ही बसपा की मुख्यधारा में ना हो लेकिन वे आज भी कांशीराम से खासे प्रभावित हैं। खादिम अब्बास विधानसभा से चुनाव से लेकर नगर निगम के कई दफा चुनाव लड चुके हैं लेकिन उनको आज तक कामयाबी नही मिल पाई है । जवानी से लेकर बुढापे की दहलीज पर आ चुके खादिम अब्बास की साइकिल आज भी उनका साथ यहां से वहां तक जाने में साथ दे रही है ।

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इटावा जिले से ही समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के सहयोग की बदौलत कांशीराम ने पहली बार संसद का रुख किया था। यही वह वक्त था जब बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की हाथीनुमा साइकिल मुलायम के घर इटावा में दौड़ी थी। वे न सिर्फ सांसद बने थे, बल्कि मुलायम सिंह का राजनीतिक आधार बनाने में भी उनकी मदद की थी।

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1991 के आम चुनाव मे इटावा में जबरदस्त हिंसा के बाद पूरे जिले के चुनाव को दोबारा कराया गया था। इस चुनाव में कांशीराम खुद संसदीय चुनाव में उतरे । मुलायम सिंह यादव ने समय की नब्ज को समझा और कांशीराम की मदद की जिसके एवज मे कांशीराम ने बसपा से कोई प्रत्याशी मुलायम सिंह यादव के लिए जसवंतनगर विधानसभा से नहीं उतारा जबकि जिले की हर विधानसभा से बसपा ने अपने प्रत्याशी उतारे थे। कांशीराम को नीला रंग सबसे अधिक पंसद था। इसी वजह से उन्होंने अपनी कंटेसा गाडी को नीले रंग से ही पुतवा दिया था । पूरे चुनाव प्रचार मे कांशीराम ने सिर्फ इसी गाडी से प्रचार किया ।

इटावा ने पहली बार कांशीराम को 1991 में संसद पहुंचाया था। इसी वजह से कांशीराम को इटावा से खासा लगाव भी रहा है । 1991 में हुए इटावा लोकसभा के उपचुनाव में बसपा प्रत्याशी कांशीराम समेत कुल 48 मैदान में थे। चुनाव में कांशीराम को एक लाख 44 हजार 290 मत मिले और उनके समकक्ष भाजपा प्रत्याशी लाल सिंह वर्मा को 1 लाख 21 हजार 824 मत मिले थे। जबकि मुलायम सिंह यादव की जनता पार्टी से लडे रामसिंह शाक्य को मात्र 82624 मत पर सिमट गए।

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