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मायावती की बसपा पतन की ओर, 424 में से एक भी उम्मीदवार नहीं जीता; मुस्लिम-दलित फैक्टर भी नहीं आया काम

Uttar Pradesh Lok Sabha Elections Results: यूपी में बीएसपी का वोट शेयर घटकर 9.38 प्रतिशत रह गया। यह 2022 के विधानसभा चुनाव के 12.88 प्रतिशत वोट शेयर की तुलना में 3 प्रतिशत से अधिक की गिरावट।
Written by: लालमनी वर्मा
Updated: June 04, 2024 22:04 IST
मायावती की बसपा पतन की ओर  424 में से एक भी उम्मीदवार नहीं जीता  मुस्लिम दलित फैक्टर भी नहीं आया काम
Lok Sabha Elections Results: बसपा चीफ मायावती। (PTI)
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Uttar Pradesh Lok Sabha Elections Results: उत्तर प्रदेश और देश के राजनीतिक परिदृश्य में मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का पतन इस लोकसभा चुनाव में भी जारी रहा, क्योंकि पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। बसपा ने देश भर में 424 लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें उत्तर प्रदेश की 79 सीटें भी शामिल थीं।

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उत्तर प्रदेश में, जहां पिछले लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के साथ गठबंधन में उसने 10 सीटें जीती थीं, पार्टी अधिकांश सीटों पर तीसरे या चौथे स्थान पर रही। शाम 6 बजे, राष्ट्रीय स्तर पर बीएसपी का वोट शेयर लगभग 2 प्रतिशत था, जो 2019 के वोट शेयर का लगभग आधा था।

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यूपी में बीएसपी का वोट शेयर घटकर 9.38 प्रतिशत रह गया। यह 2022 के विधानसभा चुनाव के 12.88 प्रतिशत वोट शेयर की तुलना में 3 प्रतिशत से अधिक की गिरावट। पार्टी ने केवल एक विधानसभा सीट जीती थी।

पिछले तीन दशक में यह दूसरा मौका है जब बीएसपी को लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली है। 2014 में भी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। बीएसपी ने 2009 में 21 सीटें, 2004 में 19 सीटें, 1999 में 14 सीटें, 1998 में पांच सीटें और 1996 में 11 सीटें जीती थीं।

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बसपा मुस्लिम वोट पाने में फिर विफल

यह दूसरी बार भी है जब मुस्लिम और दलितों का वोट बैंक समीकरण साधने की बीएसपी की कोशिश नाकाम रही है। 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में बीएसपी ने सबसे ज़्यादा मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उनमें से एक भी जीत नहीं पाया। उस साल पार्टी सिर्फ़ एक विधानसभा सीट जीत पाई थी।

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इस लोकसभा चुनाव में बीएसपी ने एक बार फिर यूपी में सबसे ज़्यादा 35 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं थे, ताकि दलितों और मुस्लिम वोटों को मिलाकर अपना समर्थन आधार बढ़ाया जा सके। राज्य में मुस्लिमों की आबादी की बात करें तो यहां करीब 20 प्रतिशत है, जबकि दलितों की आबादी 21 प्रतिशत है।

हालांकि, इसके कारण समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के विपक्षी गठबंधन ने बसपा पर सत्तारूढ़ भाजपा की "बी-टीम" होने का आरोप लगाया, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर मायावती भारतीय जनता पार्टी के वोट शेयर में सेंध लगा देंगी, जिससे भाजपा को फायदा होगा।

लेकिन रुझानों से पता चलता है कि पार्टी एक बार फिर मुस्लिम वोट हासिल करने में विफल रही और दलित वोटों का एक हिस्सा भी बीएसपी से दूर चला गया। बीएसपी के लगभग सभी मुस्लिम उम्मीदवार अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में तीसरे स्थान पर रहे।

अभियान की शुरुआत और असफलता

पिछले दो महीनों में बीएसपी प्रमुख मायावती ने देश भर में 40 से ज़्यादा रैलियां कीं, जिनमें से करीब 30 रैलियां यूपी में कीं। उन्होंने अपने भतीजे आकाश आनंद को भी प्रचार के लिए लगाया, जिन्हें उन्होंने पार्टी में अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था और उन्हें मीडिया से बातचीत करने की अनुमति दी।

लेकिन पिछले महीने पार्टी के अभियान को तब झटका लगा जब सीतापुर में अपने भाषण में "शत्रुता को बढ़ावा देने" के आरोप में आकाश पर मामला दर्ज होने के कुछ दिनों बाद मायावती ने उन्हें पार्टी के राष्ट्रीय समन्वयक और उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी के पद से हटा दिया। अपनी रैलियों में बीजेपी पर हमला करने वाले आकाश ने अपने प्रचार की योजना को छोटा कर दिया और फिलहाल राजनीतिक रूप से निष्क्रिय हैं।

आगे की चुनौती

इस लोकसभा चुनाव में बीएसपी का खराब प्रदर्शन उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के लिए बड़ा झटका है। सपा के तीन दर्जन से ज़्यादा लोकसभा सीटें जीतने के साथ ही वह राज्य में एकमात्र राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है, जो बीजेपी को चुनौती दे सकती है। इसलिए मुस्लिम, दलित और ओबीसी से बीजेपी विरोधी वोट हासिल करने की बीएसपी की कोई भी कोशिश काफी चुनौतीपूर्ण होगी।

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